लेखक परिचय

प्रमोद भार्गव

प्रमोद भार्गव

लेखक प्रिंट और इलेक्ट्रोनिक मीडिया से जुड़े वरिष्ठ पत्रकार है ।

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corruptionप्रमोद भार्गव

अंतरराष्ट्रीय पारदर्शिता संस्थान के ताजा सर्वे से खुलासा हुआ है कि देश भ्रष्टाचार में आकंठ डूबा हुआ है। राजनीतिक दलों और नौकरशाहों को यह एक चेतावनी है कि उनके प्रति लोगों में जबरदस्त नकारात्मक रुख है, इससे निपटने के यदि चीन की तरह कारगर उपाय नहीं तलाशे गए तो देश अराजकता के हवाले भी हो सकता है। देश में प्रत्येक दो में एक व्यकित घूस देने को लाचार है। ये लोग मानते हैं कि पिछले दो सालों में ज्यादा भ्रष्टाचार बढ़ा है। इसमें भी 71 प्रतिषत लोगों ने राय जतार्इ कि राजनीतिक भ्रष्टाचार में बेतहाशा इजाफा हुआ है।

भ्रष्टाचार के ये निष्कर्ष वैशिवक भ्रष्टाचार बेरोमीटर 2013 द्वारा निकाले गए हैं। इस नतीजे के लिए 107 देशों के 1.14 लाख लोगों से बातचीत की गर्इ। इससे निकले परिणामों ने भारत को 94 वें पायदान पर ला खड़ा किया है। पहले और दूसरे नंबर पर डेनमार्क व फिनलैंड जैसे देश हैं, जहां भ्रष्टाचार लगभग नहीं है। दुनिया भर के अनुभवों से साबित हुआ है कि यदि राजनैतिक दल व नेता र्इमानदार हों तो भ्रष्टाचार को एक हद तक काबू में लिया जा सकता है। लेकिन हमारे यहां दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति के चलते राजनीतिक भ्रष्टाचार ही सबसे ज्यादा बढ़ा है। 71 प्रतिषत लोगों ने इस स्थिति को कबूलने के साथ 68 फीसदी ने यह भी माना कि सरकार इस समस्या से निपटने के लिए कोर्इ दृढ़ इच्छाशक्ति नहीं जता रही। सूचना आयुक्त ने जब उन्हें सूचना के दायरे में लाने का बाध्यकारी आदेश जारी किया तो सभी दल लामबंद होकर अध्यादेश के जरिए इस कानून का समाप्त करने के लिए आमादा हो गए हैं। जबकि भाजपा नेता गोपीनाथ मुंडे ने हाल ही में एक सार्वजनिक मंच से स्वीकार चुके है कि उन्होंने अपने चुनाव में 8 करोड़ रुपए खर्च किए, जबकि चुनाव आयोग को महज 28 हजार चुनाव खर्च बताया।

जाहिर है, ये हालात जनप्रतिनिधि आधरित लोकतांत्रिक व्यवस्था को खतरे में डालने का काम कर रहे हैं। राख के भीतर अराजकता की चिंगारी सुलग रही है। इसे ज्वाला बनने के लिए मामूली हवा की जरुरत है। 2011 में अन्ना हजारे और बाबा रामदेव के आंदोलनो को जिस तरह से स्वप्रेरित जनसमर्थन मिला था, वह इस बात का संकेत है कि लोग मौजूदा भ्रष्टाचार से तंग आ चुके हैं। भ्रष्टाचार से निजात पाना चाहते हैं। ऐसा इसलिए भी संभव हुआ कि आर्थिक विकास के दौरान स्वयंसेवी संगठनों ने समाज को जागृत करने में अहम भूमिका निभार्इ। प्रशासन को बेहतर सेवाएं देने व जवाबदेही की प्रति चेताया। इन उपायों के चलते जन-समूह अपने अधिकारों के प्रति जागरुक हुए हैं और जन-आंदोलनों के लिए संवैधानिक हकों की मांगे उठा रहे हैं। लेकिन विंडबना है कि राजनीतिक दल इस जनभावना को नहीं समझ रहे। इसी का परिणाम है कि जन भावना और दलों के बीच दूरी बढ़ रही है। यही दूरी अराजक स्थिति के निर्माण के विस्फोटक हालात कभी भी पैदा कर सकती है। इन हालातों से जूझना न पड़े इसके लिए जरुरी है कि भ्रष्टाचार के खिलाफ जिस तरह से चीन में दण्ड का भय निर्मित है, वैसे ही वातावरण का निर्माण भारत में हो।

चीन में इसी जुलार्इ में पूर्व रेल मंत्री लिउ झिजुन को भ्रष्टाचार के आरोप में मौत की सजा सुनार्इ गर्इ है। उनकी सारी चल-अचल संपतित जब्त करने का आदेश दिया गया है और उन्हें सभी प्रकार के राजनीतिक अधिकारों व सुविधाओं से तत्काल प्रभाव से वंचित कर दिया है। चीन में भ्रष्टाचार और पद के दुरुपयोग पर फांसी का प्रावधान है। इसी तरह चीन में एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी वेन छियांग को 24 लाख अमेरिकी डालर की रिश्वत  लेने का आरोप सिद्ध होने पर मृत्युदण्ड दिया गया था। उनकी पत्नी को भी 8 साल का कठोर कारावास इसलिए दिया गया, क्योंकि वे छियांग को अनैतिक कदाचरण को उकसाती थीं। कानूनी प्रावधानों के र्इमानदार कि्रयान्वयन पर सख्ती से अमल होने की बाध्यता के कारण ही चीन संतुलित आर्थिक विकास के बूते 60 करोड़ लोगों को गरीबी से छुटकारा दिलाने में सफल रहा। चीन अपनी अर्थव्यवस्था को ऐसा रुप देना चाहता है, जो घरेलू खपत पर आधारित हो। चीन की कोशिश है कि धन का समान वितरण हो, जिससे गरीबी रेखा से नीचे रह रहे लोगों का जीवनस्तर उपर उठे और असमानता दूर हो। जीवनयापन की आधारभूत जरुरतों के अलावा स्वस्थ जीवन की अन्य जरुरतों, मसलन शिक्षा और स्वास्थ्य परियोजनाओं की गुणवत्ता वहां इसलिए बढ़ रही है, क्योंकि दण्ड का भय राजनीतिक और प्रशासनिक हलकों में व्याप्त है।

भारत में भ्रष्टाचार किस हद तक सर्वव्यापी बना हुआ है, इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि देश के 20 लाख करोड़ रुपए काले धन के रुप में विदेशीजेजे बैंकों में जमा हैं। क्लर्क से लेकर आला अधिकारी के यहां छापा डालने पर करोड़ों-अरबों की संपतित, पहली छापामार कार्रवार्इ में ही प्रगट हो जाती है। देश का पहला बड़ा बोफोर्स घोटाला आज तक तार्किक परिणति तक नहीं पहुंच पाया। मनमोहन सिंह सरकार के दूसरे कार्यकाल में तो जैसे घोटालों का सिलसिला एक विद्रूप नियति बन कर रह गर्इ। राष्ट्रमंडल खेल घोटाला, 2जी स्पेक्टम, कोयला, टाटा टक, हेलिकाप्टर और जेट-एतिहाद घोटालों ने मौजूदा केंद्र सरकार की छवि पर कालिख पोतकर रख दी है। भ्रष्टाचार ही एक वजह है, जो हमारी सीमाओं पर अवैध घुसपैठ जारी है और आतंकवाद पूरे देश में पैर पसारता जा रहा है। माओवाद-नक्सलवाद भी इसी भ्रष्टाचार की जड़ से उपजे हैं। उत्तराखण्ड में आर्इ प्राकृतिक आपदा की प्रमुख वजह भी भ्रष्टाचार है। वहां पर्यावरण सुरक्षा की अनदेखी कर राज्य सरकारें प्रति मेगावाट एक करोड़ की रिश्वत  लेकर विधुत परियोजनाएं स्थापित करने की खुली छूटी देती  रही हैं। नतीजतन  जंगलों का विनाश हुआ, पहाड़ खोद डाले और नदियों पर बांध बना दिए गए। इतनी बड़ी आपदा के बावजूद जानलेवा कथित आधुनिक विकास पर पुनर्विचार करने को विजय बहुगुणा सरकार तैयार नहीं है। कानूनों के उल्लंघन की यह स्थिति सभी राज्य सरकारों में कमोवेश एक जैसी है। शीर्ष पर बैठे हुक्मरान थोड़े बहुत भयभीत हैं भी तो इसलिए कि न्यायपालिका की सकि्रयता के चलते चंद नेता और नौकरशाह जेल की हवा खा आए हैं। लिहाजा भारत को भ्रष्टाचार मुक्त बनाने के लिए जरुरी है कि कानून का भय चीन की तरह हमारे देश में भी कायम रहे।

One Response to “भ्रष्टाचार का भय और चीन”

  1. mahendra gupta

    हम हमारी सरकार हमारे नेता केवल आलाप करते हैं,न तो हमारे में इसे मिटने की इच्छा शक्ति है.हमारा यह विश्वास हो गया है कि रिश्वत के बिना कोई काम हो ही नहीं सकता.ऐसे में इस से मुक्ति कैसे मिले?चीन में रेल मंत्री को फंसी की सजा मिलती है,हमारे रेल मंत्री को इस हेतु कठघरे में भी खड़े करने कि जरूरत नहीं समझि जाती,बल्कि उन्हें पहले से ही बचाने का प्रयास किया जाता है.अंजाम जो सी बी आई उन्हें दोषी करार देती है बाद में मुंह छिपा उन्हें क्लीन चिट दे देती है हमारे यहाँ सत्ता प्रतिष्ठान में भ्रस्टाचार ऊपर से ले नीचे तक रग रग में रम गया है, या कहिये खून में ही आ गया है इसलिए इस से मुक्ति की उम्मीद नहीं कि जा सकती.यह तो एक उदहारण है, बाकि हर मामले में यही हाल है.

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