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    Homeसाहित्‍यकविताकविता : तारीखें माफ़ करती नहीं

    कविता : तारीखें माफ़ करती नहीं

    मिलन सिन्हा

    povertyसोचनीय विषयों  पर

    सोचते नहीं

    वादा जो करते हैं

    वह करते नहीं

    अच्छे  लोगों को

    साथ रखते नहीं

    गलत करने वालों को

    रोकते नहीं

    बड़ी आबादी को

    खाना, कपडा तक नहीं

    गांववालों को

    शौचालय भी नहीं

    बच्चों को जरूरी

    शिक्षा व पोषण तक नहीं

    गरीब, शोषित के प्रति

    वाकई कोई संवेदना नहीं

    अपने  गुरूर में ही जीते हैं

    अपने जमीर की भी सुनते नहीं

    वक्त दस्तक देता है

    फिर भी चेतते नहीं

    सच कहते हैं गुणीजन

    ऐसे नेताओं को

    आम जनता भूलती नहीं

    ऐसे शासकों  को

    तारीखें  माफ़ करती नहीं !

    मिलन सिन्हा
    मिलन सिन्हाhttps://editor@pravakta
    स्वतंत्र लेखन अब तक धर्मयुग, दिनमान, कादम्बिनी, नवनीत, कहानीकार, समग्रता, जीवन साहित्य, अवकाश, हिंदी एक्सप्रेस, राष्ट्रधर्म, सरिता, मुक्त, स्वतंत्र भारत सुमन, अक्षर पर्व, योजना, नवभारत टाइम्स, हिन्दुस्तान, प्रभात खबर, जागरण, आज, प्रदीप, राष्ट्रदूत, नंदन सहित विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में अनेक रचनाएँ प्रकाशित ।

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