लेखक परिचय

सारदा बनर्जी

सारदा बनर्जी

लेखिका कलकत्ता विश्वविद्यालय में शोध-छात्रा हैं।

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स्त्री की भाषा पुरुष की भाषा से स्वभावत: भिन्न होती है। स्त्री भाषा के मानदंड पुरुष भाषा के मानदंड से बिल्कुल अलग होते हैं। चाहे ‘पाठ’ के आधार पर कहें या बोलचाल की भाषा के आधार पर। स्त्री पाठ का यदि ठीक-ठीक विश्लेषण किया जाए तो यह स्पष्ट हो जाएगा कि इसकी प्रकृति पुरुष पाठ से भिन्न होती है। आम तौर पर पुरुष भाषा के मानदंड के आधार पर ही स्त्री भाषा को विश्लेषित किया गया और पुरुष की भाषा को ही स्त्री की भाषा का आदर्श बताया गया। लेकिन यह ज़रुरी है कि स्त्री कृतियों में स्त्री- भाषा को भिन्न भाषिक संरचना में विश्लेषित किया जाए। उसे पितृसत्ताक भाषा के आग्रहों और दबावों से मुक्त करके पढ़ा जाए।

यह माना जाता रहा है कि स्त्रियों की बोलचाल की भाषा झिझकभरी और अतार्किक होती है। स्त्रियां भावुक होकर बातें करती हैं। ये विमर्श पुरुषों के दिए हुए हैं। लेकिन तथ्य यह है कि ये नकारात्मक गुण पुरुषों में भी मिलेंगे। यदि स्त्रियों की बोलचाल की भाषा पर ध्यान दिया जाए तो मिलेगा कि वे बातचीत के दौरान पुरुषों की तरह पांडित्यपूर्ण या भारी-भरकम शब्दों का प्रयोग नहीं करतीं। सरल शब्दों और छोटे और संक्षिप्त वाक्यों में स्त्रियां अपनी बात रखती हैं लेकिन ये गंभीर और गहरे अर्थ को व्यंजित करने वाला होता है। साथ ही इन वाक्यों से स्त्री-जीवन के कटु अनुभवों के परत-दर-परत खुलते हैं। यदि स्त्री द्वारा कहे गए शब्दों पर गौर किया जाए तो अनेक छुपे हुए अर्थ निकल आते हैं जो स्त्री जीवन की उपेक्षा, उनके संघर्ष की वास्तविकता को उजागर करता है। इसलिए स्त्री भाषा अपनी प्रकृति और स्वभाव में पुरुष भाषा से भिन्न है।

स्त्री पाठ की भाषा पर जब भी हम विचार करें तो यह याद रखें कि वह पुरुष भाषा के मानकों को तोड़कर बनी है। प्रो. जगदीश्वर चतुर्वेदी के शब्दों में, “स्त्रीवादी पठन सैद्धांतिकी की दृष्टि से पाठ, अर्थ का घर नहीं है अपितु वह संवाद की जगह है। स्त्री-पाठ की भाषा को निश्चित भाषिक अर्थों में विश्लेषित नहीं करना चाहिए। अपितु पाठ में निहित अस्पष्ट अर्थों का खुलासा करना चाहिए। पाठ को समझने में इससे मदद मिलेगी।” अस्पष्ट अर्थों की प्राप्ति के लिए पाठ में निहित वर्तमान के साथ-साथ अतीत को भी समझने की ज़रुरत है। इसलिए स्त्री पाठ को विखंडित करके पढ़ा जाना चाहिए। इससे पाठ में निहित सांस्कृतिक और सामाजिक अतीत सामने आएगा। साथ ही स्त्री के अनुभवों और संघर्षों को वर्तमान के आलोक में देखना चाहिए।

इस संदर्भ में महत्वपूर्ण बात यह है कि स्त्री पाठ खुला होता है। वह पुरुष पाठ की तरह बंद नहीं होता। स्त्री पाठ अनंत और अंतहीन होता है। वह पुरुष पाठ की तरह खत्म नहीं हो जाता। स्त्री द्वारा लिखे गए किसी भी विषय पर लिखे आलेख में हर पैराग्राफ़ अलग परिप्रेक्ष्य पर ज़ोर देता दिखाई देगा हालांकि उसमें विषयांतर की भावना नहीं होती। इसके अतिरिक्त उसमें यह स्पेस होता है उस लेख में कुछ विषय बाहर से जोर दिए जाएं लेकिन पुरुष लेख में यह स्पेस नहीं होता कि आप बीच में कुछ अपनी ओर से जोड़ दें। स्त्री लेख बहुत छोटे वाक्यों और सरल शब्दों में लिखे जाते हैं। हालांकि पुरुष सख़्त शब्दों और लम्बे वाक्यों का अमूमन प्रयोग करते हैं। स्त्रीवादी वर्जीनीया वुल्फ़ ने पुरुष वाक्यों को क्रमानुवर्ती माना और उसे खारिज किया। उनके अनुसार पुरुष वाक्यों में मातहत बनाने का भाव होता है।यही वजह है कि स्वयं वुल्फ़ ने ऐसे शब्दों का प्रयोग किया जो मातहत नहीं बनाते और जो सामंजस्य के भाव से संपृक्त है।

स्त्री लेखन में ध्यान देने वाली बात यह है कि वह अपने जीवन और आसपास के माहौल का रुपायन अपने लेख में करती है। शब्द भी उसी माहौल से चुनती है। जगदीश्वर चतुर्वेदी के अनुसार, “19वीं और 20वीं शताब्दी के स्त्रियों के कथा साहित्य में स्त्री का कमरे, घर, ज़मीन या समुद्र से संबंध जोड़ा गया। यह ऐसा संबंध है जो पाठक/समीक्षक को प्लॉट के बाहर ले जाता है। असल में यह अपने करीबी जीवन एवं खुली जगह का रुपायन है।” यदि मध्ययुगीन कवयित्रियों और आधुनिककालीन कवयित्रियों के कृतियों में शब्दों को परखा जाए तो साफ़ हो जाएगा कि दोनों के माहौल में कितना फ़र्क है और माहौल किस तरह रचनाओं में अपना स्थान बनाता है।

जब स्त्री कहती है तो पहचान निर्मित करती है और जब लिखती है तो अस्मिता का निर्माण करती है। लेकिन इस संदर्भ में देखना होगा कि स्त्री किस भाषा में लिख रही है। क्या वो पुरुष भाषा का प्रयोग कर रही है जो स्त्री को मातहत रुप में संप्रेषित करता है या स्त्री भाषा का। यदि वह मर्द की भाषा में लिख रही है तो वह अपने को पुरुष की परंपरा में जोड़ती है। यह भी हो सकता है कि वह इस परंपरा को चुनौती देते हुए अपनी भाषा को बदले और अपने को स्त्रीवाद की परंपरा से जोड़े। देखा जाए तो स्त्रियों को अपनी भावनाओं और मनोदशाओं को अभिव्यक्त करने के लिए स्त्री भाषा का ही प्रयोग करना चाहिए क्यों ये अनुभूतियां एक स्त्री की है, पुरुष की नहीं। स्त्री की अनुभूति जब स्त्री भाषा में संप्रेषित होगी तो स्त्री अपनी अस्मिता का निर्माण करेगी।

3 Responses to “स्त्री-भाषा – सारदा बनर्जी”

  1. डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश'

    डॉ. पुरुषोत्तम 'निरंकुश'

    मैडम आप जो कुछ भी कहना चाहती हैं, उसकी दिशा अनिश्चित और दिग्भ्रमित नज़र आती है! लगता है कि आप बहुत जल्दी में हैं! अपने जीते जी स्त्री और पुरुष के बीच की; आपकी नज़रों में दिखने वाली, असमानता को आप हर हल में पाट देने के लिए तत्पर दिखती हैं! लेकिन इतनी जल्दबाजी ठीक नहीं! समय की धारा को और गति को अपने हिसाब से चलाया या मोड़ा नहीं जा सकता!

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