लेखक परिचय

सारदा बनर्जी

सारदा बनर्जी

लेखिका कलकत्ता विश्वविद्यालय में शोध-छात्रा हैं।

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क्या वजह है कि कोई स्त्री लेखिका जब पितृसत्ताक समाज के पुंसवादी रवैये की आलोचना करती हैं तो उन्हें पुरुषों की कटुक्ति का सामना करना पड़ता है? हमारा समाज अपने रवैये में बेहद पुंसवादी है और इस पुंसवाद के प्रभाव को स्त्रियां हर पल झेल रहीं हैं। लेकिन जब कोई स्त्री इन विषयों पर रौशनी डालती है या पुंसवाद की आलोचना पर लेख लिखती है तो उस पर इस तरह के कमेंट आते हैं, “लेख आपकी छोटी व कुंठित मानसिकता का परिचय देता है…” या फिर यह कहते हैं, “और एक ऐसी महिला का लेख लग रहा है… जो हर बुरी बात का श्रेय पुरुषों को देना चाहती हैं…।” यहां सवाल यह उठता है कि पुंसवादी समाज के डंक को तो स्त्रियां सदियों से झेल रही हैं और पितृसत्ताक मानसिकता की चक्की में वर्षों से पिस रही है लेकिन पुंसवाद की एक सामान्य सी जायज़ आलोचना पुरुष या कहें पुंसवादी मानसिकता के पुरुष क्यों नहीं ले पाते?

यह भी सर्वज्ञात है कि भले ही भारतीय संविधान प्रत्येक नागरिक के समान अधिकार की घोषणा करता हो लेकिन स्त्री आज भी पुरुषों के समकक्ष नहीं है। वे सभी अधिकार जो एक पुरुष को जीवन के प्रथम क्षण से मिलता है स्त्रियों को नहीं मिलता। जीवन के किसी न किसी मोड़ पर उसे यह अहसास करा दिया जाता है कि वह स्त्री है। जैसा कि सीमोन द बोउवार ‘द सेकेंड सेक्स’ में कहती हैं, “One is not born, but rather becomes, a woman.” आज इक्कीसवी सदी में भी स्त्रियों को स्त्री-पुरुष समानता की बातें हवाई लगती है क्योंकि वे जानती हैं कि हकीकत क्या है। उल्लेखनीय है कि यदि स्त्री-पुरुष समानता की हिमायत में कोई स्त्री लेख लिखती है तो उसे इस तरह के कमेंट्स को फ़ेस करना पड़ता है, “आम और नारंगी दोनों फल है, पर आम=नारंगी नहीं, न हो सकती है। नर=नारी नहीं है।” साथ ही इस तरह के पुंसवादी विचारों से लैस पुरुषों को स्त्री-पुरुष सामनता की बात पश्चिम से उधार ली गई लगती है। लिखते हैं, “ इन्हें समानता के लिए लड़वाने वाला पश्चिम आपस में वैर भाव जागृत कर कर, जन-मानस को ऐसा कलुषित कर चुका है, कि समानता की लड़ाई में परस्पर प्रेम का अंत हो रहा है, और कुटुंब संस्था नष्ट हो रही है।” ध्यानतलब है कि परस्पर प्रेम के अंत का दोष भी ठीक स्त्रियों के सिर ही मढ़ा जा रहा है हालांकि वे समानता यानि अपने हक के लिए लड़ रही होती हैं। स्त्री स्वतंत्रता पर इनकी टिप्पणी है, “स्त्री स्वतंत्रता के इन पश्चिम प्रेरित आन्दोलनों के प्रभाव से भारत की स्त्रियों का सम्मान बढना तो क्या था, उसे हर मंच पर निर्वस्त्र करने का काम ‘बोल्डनैस” के नाम पर हो रहा है। लीव इन रेलेशनशिप को बढावा देकर उसकी दशा वेश्याओं जैसी बनाने में कोई कसर नहीं रखी जा रही और यह सब हो रहा है, स्त्री की स्वतंत्रता व समानता के नाम पर।”

स्पष्ट होता है कि ‘स्त्री’ आज भी पुरुषों के लिए मूल्यहीन और चलताऊ है। स्त्रियों की समानता की बात पुरुषों को कितना डिस्टर्ब करता है। यदि कोई प्रगतिशील या स्त्री-मुक्ति के विचार जनसमक्ष रखे जाते हैं तो उसमें ये पुंसवादी मानसिकता के पुरुष पश्चिम का एफ़ेक्ट ढूँढ़ने लगते हैं। उससे भी बड़ी बात यह कि किसी स्त्री द्वारा लिखे गए सच को ऐकसेप्ट करना पुरुषों के लिए कितना कठिन है। यही कायदे से यह प्रूफ़ कर देता है कि भारतीय समाज मानसिकता और व्यवहार में घोर पुंसवादी है।

स्त्री अस्मिता की बात करते ही इन्हें पश्चिम दिखाई देता है। कमेंट पढ़ें, “लेखिका में लेखन की प्रतिभा तो है पर वे मैकालियन शिक्षा के प्रभाव में आकर भारतीय समाज की अच्छाईयों, स्त्रियों के गुणों में भी दोष ही दोष देखने की नकारात्मक मानसिकता की शिकार हो गयी हैं।” अब इन जनाबों को कोई समझाए कि स्त्री मुक्ति की बात भारत में स्त्री मुक्ति के पक्षधर वर्षों से करते आएं हैं लेकिन इन पक्षधरों की बात पुंसवादी कानों तक कभी नहीं पहुंची। इसलिए इन्हें स्त्री-मुक्ति की बातों में मैकालियन शिक्षा का प्रभाव दिख रहा है। साथ ही जिन क्षेत्रों में व्रतों के नाम पर स्त्रियों का शोषण होता आया है उस पर लिखना भी इनके हिसाब से स्त्रियों को दोष देना है। यानि इनके अनुसार चुपचाप पुरुषों की मंगलकामना के लिए व्रत करना स्त्रियोचित गुण है। इसकी आलोचना नहीं करनी चाहिए। लिखते हैं, “आपको किसने कहा की … स्त्रियों को व्रत आदि रखने की लिए विवश किया या उकसाया जाता है…?… यह सब वे अपने मर्ज़ी और ख़ुशी से करती हैं…।”

अगर आप स्त्रियों के आधुनिक आचरण और आधुनिक व्यवहार की बात करें तो उनका सवाल होता है, “आधुनिक व्यवहार और आधुनिक आचरण से आप क्या अर्थ करती है? उदाहरण दे, तो सही समझ पाए| इसके लिए, कोई पुस्तक पढ़नी होगी क्या?” या फिर “स्वच्छंदता और मुक्तता का अर्थ आप क्या करती है? इन दोनों में कोई अंतर है क्या ? हो, तो, उस अंतर को स्पष्ट करें|” तो महाशय इसका उत्तर पाना हो तो भारतीय संविधान को गौर से पढ़िए जहां इसकी बातें कही गई हैं। जायज़ है यह स्त्री-विरोधी मनोदशा है जो किसी तरह से स्त्री-मुक्ति का पक्षधर नहीं है। और सवाल करना भी बाकायदा मेल शोवेनिस्टिक मेंटैलिटी को दर्शाता है। आपको पुरुषों की स्वच्छंदता और मुक्तता अच्छी लगती है लेकिन जब स्त्रियों की बात की जाती है तो ढेरों सवाल उठ खड़े होते हैं। स्पष्ट है कि स्त्री-पुरुष समानता की बात इनकी समझ से परे है क्योंकि ये आदतन मजबूर हैं स्त्रियों को बैकवर्ड देखने और बनाए रखने में। प्रो. जगदीश्वर चतुर्वेदी के अनुसार, “स्त्री और पुरुष में समानता हासिल करना तब तक संभव नहीं है जब तक गैर-लिंगीय रुप में सोचते रहेंगे। दायित्वों एवं अधिकारों का प्रत्येक लिंग के लिए अलग-अलग विभाजन जब तक बना रहेगा वे भिन्न बने रहेंगे।” मूल बात हमारे दृष्टिकोण की है। इसलिए बदलाव हमारे सोच में लाना होगा। स्त्री के प्रति आधुनिक नज़रिया डेवलप नहीं करेंगे तो रुढिवादी बातें ही करते जाएंगे। समानता के कंसेप्ट को समझने के लिए लिंगीय रुप में सोचना होगा तभी स्त्री अस्मिता, स्त्री-स्वच्छंदता, स्त्री-मुक्तता, स्त्री-अस्तित्व की बात पुंसवादी समझ पाएंगे।

9 Responses to “पुसंवाद को कितना डिस्टर्ब करता है स्त्रीवादी सोच – सारदा बनर्जी”

  1. Bipin Kumar Sinha

    शारदाजी
    बहुत बहुत बधाई इस लेख के लिए. पुरुष का अहंकारी प्रवृत्ति उसे यह सोचने ही नहीं देता है कि वह भी उसी की तरह एक इन्सान है. उसे अपनी पाशविक शक्ति का ज्यादा अभिमान है. जब की यह उसकी पशु स्थिति का ही द्योतक है.कोमलता क्या चीज होती है यह वे नहीं समझ पाते.हमारे सारे धर्म ग्रन्थ शक्ति की ही बात करते है उसे ही प्रशंसनीय मानते है.उन्होंने नारी को भी स्थान दिया है उसी परिप्रेक्ष्य में. नमनीयता कितनी कठिन चीज है यह व्यहवार में लाने पर ही पता चलता है. स्त्री को कितना दबाया गया है कि वह अपने अस्तित्व को पहचानने में असमर्थ हो गयी है तभी तो पित्रसत्तात्मक समाज उसे उपभोग कि वस्तु से ज्यादा नहीं समझते विभिन्न रूपों इसे देखा जा सकता है. मनुष्य जब तक हिंसा से विरत नहीं होगा तब तक समाज में स्त्रियों की दोयम स्थिति नहीं बदल सकती .पुरुष का स्त्री के प्रति प्रेम भी वह अहसान समझ कर करता है दया मानता है. वह क्या यह सोचता है स्त्री का उसके प्रति प्रेम एक दान स्वरुप है. वह तो चाहता है स्त्री उसके प्रति समर्पित हो. समर्पण तो दासत्व का ही दूसरा नाम है.

    बिपिन कुमार सिन्हा

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  2. इक़बाल हिंदुस्तानी

    iqbalhindustani

    पुरूष और महिला को कुदरत ने समान नही बनाया है ये सच है लेकिन दोनों को इन्सान ही बनाया है ये भी सच है. ये जंगल की सोच है कि जो ज्यादा ताकतवर है वेह कमजोर को समान अधिकार नही देगा. इस सोच को बदलना ही होगा.

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  3. डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश'

    Dr. Purushottam 'Nirankush'

    “उससे भी बड़ी बात यह कि किसी स्त्री द्वारा लिखे गए सच को ऐकसेप्ट करना पुरुषों के लिए कितना कठिन है। यही कायदे से यह प्रूफ़ कर देता है कि भारतीय समाज मानसिकता और व्यवहार में घोर पुंसवादी है।”
    मैडम उक्त बात को सिद्ध करने की कहाँ जरूरत है! ये तो स्वयं सिद्ध है ही कि भारतीय समाज पुरुष प्रधान है! जिसे आपके शब्दों में “पुंसवादी” मानने में किसी को कोई आपत्ती नहीं होनी चाहिए! आप भी विवाह करेंगी तो आपको भी दुल्हन बनाकर किसी पुरुष के घर ही जाना होगा! सवाल महत्वपूर्ण ये है कि स्त्री और पुरुष की समानता के मायने क्या हैं? क्या स्त्री और पुरुष कभी सामान थे या कभी सामान हो सकते हैं? न कभी समान थे और न कभी समान हो सकते हैं! क्यों? क्योंकि पुरुष कभी स्त्री नहीं बन सकता और स्त्री कभी पुरुष नहीं बन सकती न ही ऐसा करने की कोई जरूरत है! स्त्री में जो स्त्रेण गुण या सामर्थ्य है, वही उसे अद्वितीय और अनुपम बनाती है! जिसे खोकर कोई स्त्री पुरुष बनना तो दूर स्त्री भी नहीं रह सकती!

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  4. Rtyagi

    सारदाजी ,

    फिर वोही बातें दोहराने में अच्छा नहीं लगता. वैसे आपके शोध का विषय क्या है ज़रूर बताइए… हम स्त्रियों का सम्मान करते हैं… तथा उनके खिलाफ कोई भी अन्याय का विरोध करते हैं… पर हर गलत-सही बात के लिए स्त्रीवादी झंडा लेकर खड़ी भीड़ से नफरत भी करते हैं…

    अच्छा कुछ सवाल मेरे भी हैं:

    १) मजाक नहीं, अगर स्त्रीवादी सोच मन से आती है तो आदमी के “डोले” कहाँ से आते हैं?
    २) प्रकृति ने जैसा बनाया है क्या उसके विरुद्ध आचरण सही है.. जैसे की स्त्री को सौम्य एवं पुरुष को कठोर?
    ३) अगर बराबरी और कंधे से कन्धा मिला कर चलने की बात आती है… जो बस ये ट्रेन की सीट पर आरक्षण क्यों? (क्योंकि जहाँ लाभ मिले वो हमारा हक़ है.?)
    ४) आज क्या कारण है की घर टूटने और विवाह-विच्छेदन की घटनाये आम हो गयी हैं…(क्योंकि, बराबरी के हक़ की लडाई, अब अहंकार में बदल गयी है) ?

    ज़रूरी नहीं की जिस चश्मे से आप दुनिया को देख रही हैं दुनिया वैसी है … कम से कम मेरे परिवार और मेरी नातेदारी और जानने वालों में तो नहीं हैं ..हमारे यहाँ स्त्रियों का पूरा सम्मान होता है.. और वे भी बराबरी का सम्मान देती हैं… उन्हें बलपूर्वक सम्मान करने को मजबूर नहीं किया जाता…

    आपके बारे में नहीं जानते… आप अपने चश्मे का नंबर या कलर बदल कर देखे… दुनिया अलग नज़र आयेगी.. अगर समय मिले तो मेरे उपरोक्त सवालों का जवाव भी किसी लेख में दे ही दें..

    जय भारतीय नारी

    धन्यवाद,

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  5. डॉ. मधुसूदन

    Dr Madhusudan

    सोनिका शर्मा जी– धन्यवाद. मैं फेस बुक का सदस्य नहीं हूँ, न बनना चाहता हूँ.
    यदि आप इसी जाल स्थल पर, हिंदी में मुझे उत्तर देना चाहती है, तो आप का स्वागत है.

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  6. डॉ. मधुसूदन

    डॉ. मधुसूदन उवाच

    Some facts from CIA वर्ल्ड बुक for comparison with US

    –Infant mortality rate
    India – 64.9 deaths/1,000 live births
    USA -6.76 deaths/1,000 live births

    –Life expectancy at birth
    India 62.5 years
    USA 77.26 years

    –Birth rate
    India – 24.79 births/1,000 population
    USA – 14.2 births/1,000 population

    –Death rate
    India -8.88 deaths/1,000 population USA – 8.7 deaths/1,000 population

    –Divorce rates
    US – 50%
    India – 1.1%

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  7. डॉ. मधुसूदन

    Dr Madhusudan

    सारदा जी,
    तटस्थ हो कर ही ऐसे विषयों पर चिंतन किया जाता है इसी प्रकार .विचार कर निम्न उत्तर दीजिए. नर या नारीत्व से ऊपर उठकर विचार किया जा सकता है. मैं मेरे नरत्व से ऊपर उठकर ही लिख रहा हूँ.
    (१)
    क्या नर और नारी, एक दूसरे के पूरक नहीं?
    (२)
    मैं पूरकता में सहकार सही मानता हूँ. स्पर्धा नहीं. आप ऐसा नहीं मानती?
    नर और नारी दोनों ने सहकार करते हुए ही कुटुंब का पालन पोषण करना होता है. स्पर्धा से नहीं.
    (3)
    आप बराबरी की बात यदि करना चाहती हैं, (मैं नहीं करूंगा) तो कभी अँधेरे में पुरुष की भाँती अकेले निकल कर देखिये. बराबर हो कर दिखाइये.अपवाद हो सकते हैं. सामान्यत: ऐसा नहीं होता..क्या उत्तर है, आपका?
    (4)
    अन्याय होता है मानता हूँ, और अन्याय नहीं होना चाहिए.
    पर नर और नारी को आपस में लड़ाना सही नहीं है. आप सहमत हैं?
    (५)
    पश्चिम ने, कुटुंब, इसी राह से, आगे बढ़ बढ़ कर तोड दिया है.
    यहां अमरिकामें महिलाएं विवाह करना चाहती है, पर उन्हें कोई उनके योग्य पुरुष, विवाह के लिए मिलता नहीं है. डेटिंग में महिलाएं स्पर्धा करती है. नर को जो बिना उत्तरदायित्व डेटिंग द्वारा मिल जाए, उसके लिए वह विवाह करके झंझट मोल नहीं लेना चाहता. घाटे में नारी ही दुःख झेलती है. क्या कहना है आपका? ज़रा बंधन मुक्त विवाह पढ़िए.
    (६)
    कभी ==>डब्ल्यू डबल्यु डबल्यु डॉट सी आय ए डॉट कॉम <== पर जाकर सांख्यिकी देखिये. और बादमें उसपर टिपण्णी दीजिए.
    (७)
    उत्तर देंगी आप? या मेरा समय व्यर्थ करेंगी? मैं अन्याय का विरोध हो, यह मानता हूँ. आप के सही सोच-विचार निश्चित स्वीकार करूँगा. उत्तर दें. या फिर दूसरा लेख लिखेंगी?
    (८)
    आपका पी एच डी का विषय और परामर्शक जान सकता हूँ?
    बिंदु क्रम से उत्तर देनें पर समय बचेगा–और चर्चा फैलेगी नहीं.

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