थोड़ा दूसरों के लिये भी सोचें

रामस्वरूप रावतसरे

नरेंद्रनाथ ने रामकृष्ण देव से कहा – ठाकुर ! मुझे एकांत में समाधि लगानी है । मुझे ऐसा करने में बहुत आन्नद आता है आप मुझे ऐसा ही करने का आशीर्वाद दें कि मैं ऐसा कर सकूं । ठाकुर श्री रामकृष्ण परमहंस बोले पागल ! कैसी छोटी छोटी बातें करता है तू ! मैं तुझे वटवृक्ष की तरह विशाल देखना चाहता हू । तेरी छाया में अनगिनत लोग विश्राम लेंगे । भगवान तुझसे बडा काम कराना चाहते है । तू वैसा ही बन , जैसा में कह रहा हू । नरेंद्रनाथ ने अपने गुरू श्रेष्ठ श्री रामकृष्ण परमहंस की प्रत्येक आज्ञा का पालन किया और वे संसार में विवेकानन्द के नाम से सुविख्यात हुए ।

ऐसे ही हमारे परम पुज्य गुरू भगवान चाहते है । कि हम उनका आशीर्वाद प्राप्त कर विशाल वट वृक्ष की तरह हों और लोगों के मार्गदर्शक बने , पर हम ऐसा नही करते है । हम उस विशाल वटवृक्ष की तरह नहीं बन कर, उस बेल की तरह बनना चाहते है जो वर्षा ऋतु आने पर एक बार तो वटवृक्ष से भी ऊपर चली जाती है । फिर चाहे वह कुछ समय बाद ही सूख कर जमीन पर आ पडे । ऐसा होता भी है । तत्काल अपनी गति से बढने वाली बेल चाहे कितनी ही ऊचीं चली जाय पर अन्त में गिरती वह जमीन पर ही है ।

इसी प्रकार हम भी सब कुछ तत्काल चाहते हैं गुरू महाराज हमें हमारी क्षमता के अनुसार देना चाहते है। इस तत्काल और क्षमता से अधिक लेने की प्रवृति के कारण हमारी भी बेल की सी स्थिति होती है । और हम जिस भाव व भाशा को अपनाना चाहते है उसके नजदीक भी नही रह पाते । जबकि गुरू महाराज हमारे बारे में पूर्ण रूप से समझते है कि हमें कब और कितना चाहिये । यदि हम उनके बताये मार्ग पर चल पडते है तो बहुत कुछ प्राप्त कर लेते है । नरेन्द्र नाथ ने ठाकुर श्री रामकृष्ण परमहंस की प्रत्येक आज्ञा का पालन किया तभी वे विवेकानन्द के नाम से आज भी श्रेष्ठता को धारण किये मानव जाति के लिये आदर्श पथ प्रदर्शक हैं ।

ठाकुर श्री रामकृष्ण परमहंस जी ने नरेन्द्र को अपने लिये समाधि लगाने से इसलिये रोका था कि उनमें ऐसी क्षमता थी कि वे समाधि सम्पूर्ण मानव जाति के कल्याण के लिये लगाये। क्योंकि अपने लिये तो हर कोर्इ कुछ ना कुछ करता है। करना तो वह है जो दुसरों के लिये होता है । ठाकुर श्री रामकृष्ण परमहंस जी ने नरेन्द्र से जो कुछ भी कराया उसमें कलुशित होती मानवता को किस प्रकार बचाया जा सकता है । भारतीय संस्कृति और धर्म ध्वजा की श्रेष्ठता को पुन: किस प्रकार स्थापित किया जा सकता है। पाश्चात्य संस्कृति के प्रभाव में आती भारतीय संस्कृति को किस प्रकार बचाया जा सकता है । मानव जाति को सही दिशा किस प्रकार मिल सकती है । यह सब पूरी मानव जाति के लिये था । ऐसा ही हमारे पुज्य गुरू महाराज चाहते है कि हम अपने लिये हरदम सोचते है ,कुछ दूसरों के लिये भी सोचें ।

जब तक देने का भाव मन दिमाग में नही आयेगा तब तक व्यापकता नही आ सकती । व्यापकता ही श्रेष्ठता के नजदीक ले जाती है। श्रेष्ठता उन सब आवष्यकताओं इच्छाओं को समतुल्य रखते हुए उस मार्ग की ओर अग्रसर करती है जो दूसरों को दिशा बोध देता हुआ परमपिता परमात्मा की ओर जाता है । जब हम इस ओर चल पडते है तक सभी प्रकार से जीना अपने लिये नहीं हो कर समस्त लोगों के लिये हो जाता है । यही गुरू महाराज हमसे चाहते है। कि हम में जो क्षमता भगवान ने भर रखी है उसका उपयोग जनहित के लिये हो ,लेकिन हम इस ओर ना बढ कर अपने तक ही सिमित रहते हैं । हमें इसे समझना चाहिये।

रामस्वरूप रावतसरे

 

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