चार माह में CIL का रिकॉर्ड उत्पादन, रेलवे का रिकॉर्ड डिस्पैच.. फिर भी संकट क्यों?

*उत्तम मुखर्जी*
अभी कुछ दिनों से मीडिया की हेडलाइन्स बनने लगी है बिजली संकट की कहानी। मीडिया में  ख़बर क्या चली मरने के पहले ही पूरा देश भूत बन गया। कहा जाने लगा कि मात्र 2-4 दिनों का स्टॉक थर्मल पावर प्लांटों के पास है। फिर देश की बत्ती गुल। सबसे बड़े लोकतंत्र में विकास की बुनियाद भी राजनीति की शर्त्त पर रखी जाती है। अंदर की कहानी जाने बिना आईआईटीयन केजरीवाल ट्वीट करने लगे। पंजाब के नए चन्नी महाराज भी कोयले की कालिख में हाथ पोंछ लिए। आप देख लेंगे।चार दिन बाद आप और हममें से कई ज़िंदा रहेंगे लेकिन अंधेरा नहीं छाएगा। 145 प्लांटों में जो कोयला संकट दिखाया गया है वह कमी 100 मिलियन टन के आसपास है। ऐसा भी नहीं है कि कोल इंडिया 4-5 दिनों में इतना कोल प्रोडक्शन बढ़ा देगी।कोल इंडिया, बिजली प्लांटों और निजी कोल ब्लॉकों में झांकने पर सहज ही अनुमान लग जाता है कि कथित कोयला व बिजली संकट की कहानी या तो कोरी अफ़वाह है या बड़ी साज़िश का हिस्सा।
*बिजली का सच*
आईए, अब समझते हैं कि बिजली का सच क्या है? देश मे कुछ समय के लिए 2 लाख मेगावाट बिजली की ज़रूरत पड़ती है। गर्मी के समय पंखे चलते हैं तो बिजली की खपत बढ़ जाती है। अमूमन 1.5 लाख मेगावाट से काम चलता है। सरकारी आंकड़ों पर भरोसा करे तो हाइड्रेल और सोलर सेक्टर से हमें 90 हजार मेगावाट बिजली मिलती है। बाकी बिजली के लिए सालाना 500 टन कोयला काफी है, जबकि कोल इंडिया का कोल प्रोडक्शन 600 मिलियन टन सालाना है। इसके अलावा निजी सेक्टरों के पास कोल ब्लॉक्स हैं जिनमें JSW, जिंदल पावर, अडानी, हिंडाल्को, बालको आदि प्रमुख हैं। ये सभी बिजली और मेटल सेक्टर हैं। सरकार के दावे भी परस्पर विरोधी है। कोल इंडिया के एकाधिकार को कम करने तथा कोल प्रोडक्शन को बढ़ाने के लिए सरकार ने FDI अर्थात विदेशी निवेश के लिए कानून बनाया है, जबकि कई निजी घराने बड़े कोल ब्लॉकों पर कुंडली मारकर बैठे हैं। देश को कोयला नहीं दे पा रहे हैं निजी सेक्टर के प्लेयर । अभी कुछ दिन पहले कोयला मंत्री ने PRC में पिछड़ने के कारण इन निजी कम्पनियों को सख़्त चिट्ठी लिखी है।  2020-21 में देश में 24 घण्टे बिजली के लिए 718 मिलियन टन कोयले की ज़रूरत थी। अकेले CIL ने 600 मिलियन टन दिया तो फिर निजी सेक्टर की क्या उपलब्धि रही?आखिर उनका कोयला कहां जा रहा? यह बड़ा सवाल है।अब एक अन्य सरकारी आंकड़े पर गौर करें। देश को 200 गीगावाट बिजली की ज़रूरत है। सरकारी प्रचार में बताया गया 46 गीगावाट हाइड्रेल से,  44 GW सोलर से, 39 GW विंड से मिलती है तो 71 GW बिजली के लिए तो सरप्लस कोयला है। फिर संकट के पीछे क्या कहानी है?
*कोल इंडिया का प्रोडक्शन 6 माह में 315 मिलियन टन*
संयोग से कुछ समय पहले एक कार्यक्रम में कोल इंडिया CHAIRMAN प्रमोद अग्रवाल से मुलाक़ात हो गई थी। उन्होंने कहा कि चालू वर्ष में अप्रैल से सितम्बर के बीच CIL ने 315 मिलियन टन कोल प्रोडक्शन किया है। पिछले साल इस अवधि में कोयला उत्पादन 282 मिलियन टन हुआ था। अर्थात बिजली खपत बढ़ी तो कोल प्रोडक्शन भी बढ़ा। रेलवे का कहना है कि उसने रिकॉर्ड कोल ट्रांसपोर्ट किया है। फिर सच क्या है?वर्ष ‘ 2014 में भी  कहा गया था कि देश के ताप बिजली घरों  में मात्र दो दिनों का कोल स्टॉक है। तुरन्त देश अंधकार में डूब जाएगा। हालांकि तब से अब तक सात साल गुजर गए लेकिन ऐसा हुआ नहीं।फ्रंट पेज पर सच उगल कर आतंक फैलाने वाले उन चंद मीडिया हाउसों ने कभी अंदर के पन्नों में भी शर्मिंदगी महसूस नहीं की और न ही झूठ लिखने के लिए माफी मांगी। छोटे अख़बार या चैनल्स मज़बूरी में उनके रास्ते चलकर ख़बर परोसते हैं क्योंकि रीडर्स के बीच मार्केटिंग में उन चंद मीडिया घरानों की भूमिका अधिक होती है।
कोल मिनिस्ट्री का स्टैंड भी परस्परविरोधी है। कभी वह निजी कोल ब्लॉकों के फिसड्डी होने पर फटकार लगा रही तो कभी CIL के समानांतर निजी सेक्टर को खड़ा करने के लिए कानून बना रही है। खुद बिजली मंत्री आरके सिंह ने भी दबी जुबान से कह ही दिया कि बिजली का कथित संकट अफ़वाह है। गेल के बवाना प्लांट के साथ गैस समझौता समाप्त हो रहा।  दो दिनों के बाद गैस नहीं दे पाएंगे, चूंकि एग्रीमेंट समाप्त हो रहा है।यह प्रचार होने पर आतंक फैला। हालांकि एग्रीमेंट के विस्तार का प्रावधान है।
कोल इंडिया अध्यक्ष की बात माने तो अभी भी CIL 70 प्रतिशत बिजली के लिए कोयला उपलब्ध कराती है। इतना भ्रष्टाचार, कोयले की लूट, चोरी के आरोप लगने के बाद भी यह उपलब्धि राहत पहुंचाती है।अडानी, जिंदल जैसे दिग्गज कोल ब्लॉक लेकर भी फिसड्डी है। फिर भी निजीकरण की सरकारी सोच क्यों? यह प्रश्न अनुत्तरित है।सरकार ने कोल इम्पोर्ट घटा दिया है। कोल इंडिया ने 2024 तक 1000 मिलियन टन कोयले का दोहन करने का टार्गेट रखा है।BCCL को छोड़कर सभी PSU कोल कम्पनियां बहुत अधिक उत्पादन कर रही हैं। BCCL और ECL के भूमिगत खदानों को लाभकारी बनाने के लिए आधुनिकीकरण किया जा रहा है।CONTINUOUS MINER मशीन लगाकर कोयला निकाला जा रहा है।फिर कोयले में 100 प्रतिशत FDI की ज़रूरत क्यों पड़ी? ऐसे भी पूरी दुनिया में कोल रिज़र्व के मामले में भारत पांचवें स्थान पर है। अन्य देश कोल रिज़र्व को अगली पीढ़ी के लिए सुरक्षित रखकर साफ सुथरी एनर्जी की ओर कदम बढ़ा रहे हैं। कई मुल्कों ने क्लीन एनर्जी के फ्रांस समझौते पर दस्तख़त कर दिए हैं। वहां कोयला आख़िरी सांस गिन रहा है। 2030 तक वे कोयले को गुडबाई कर देंगे।सबसे अधिक कोयला पर निर्भर ब्रिटेन के थर्मल प्लांटों में धड़ाधड़ शटर गिर रहे हैं। ऑस्ट्रेलिया में अडानी के कारमाइकल कोल प्रोजेक्ट को इसलिए अदालत ने रोक रखा क्योंकि इससे भूगर्भ-जल की बर्बादी और फिंज पक्षी का अस्तित्व जुड़ा हुआ था। ऐसे में कई मुल्क भारत की कोल माइनिंग पर नज़र गड़ाकर रखे हैं। FDI हो गया है। अब कोल बीयरिंग एरियाज एक्युजेशन एंड डेवलपमेंट एक्ट ‘1957 में संशोधन बाकी है।देश में कोयले का बड़ा भंडार ट्राइबल स्टेट झारखण्ड, ओडिशा व छत्तीसगढ़ में है। इन राज्यों से कोयले का दोहन वह भी निजी सेक्टर के द्वारा बड़ी समस्या है। झारखण्ड समेत इन राज्यों में 40 कोल ब्लॉक की नीलामी होनी है।झारखण्ड के सीतानाला, नार्थ कर्णपुरा, चितरपुर, राजमहल, , उरमा पहाड़ी समेत 30 स्पॉटों पर बड़ा कोयले का भंडार है।इसी मकसद से धनबाद-चन्द्रपुरा DC रेल लाइन को भी बन्द किया गया था। यह रेल लाइन बंगाल , झारखण्ड, ओडिशा और दक्षिण के इलाकों को कनेक्ट करती है। हालांकि कुछ उद्यमियों को ऑस्ट्रेलिया में हरी झंडी मिलने के बाद DC लाइन पुनर्जीवित हो गई। खुद PMO ने DC लाइन को खतरनाक बताकर बन्द किया था। दो साल बाद बिना कुछ किए वही लाइन सुरक्षित कैसे हो गई, इस सवाल का भी जवाब नहीं मिला है। जानकार कह रहे हैं कि कोयले की कालिख को आंखों का शूरमा बनाने के लिए कोल बीयरिंग एक्ट  को उजाले में लाना ज़रूरी है। एक्ट में ‘उजाले’ के लिए ‘अंधेरे’ की कहानी ज़रूरी है। अंधेरे के सच को कोयले की कालिख से ही धोया जा सकता है। सो अशर्फी की लूट के लिए कोयले पर छाप जारी है।

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