डॉ. शैलेश शुक्ला
भारत एक विशाल लोकतांत्रिक राष्ट्र है, जहाँ सरकार का प्रत्येक निर्णय करोड़ों लोगों के जीवन को प्रभावित करता है। सरकार जनता के कर से चलती है और इसलिए सरकारी धन का प्रत्येक रुपया जनता की मेहनत, पसीने और विश्वास का प्रतीक होता है। जब देश का सामान्य नागरिक बढ़ती महँगाई, बेरोजगारी, शिक्षा और स्वास्थ्य जैसी मूलभूत समस्याओं से संघर्ष कर रहा हो, तब यह प्रश्न स्वाभाविक रूप से उठता है कि क्या सरकारों और प्रशासनिक तंत्र को भी अपने खर्चों में सादगी और संयम नहीं अपनाना चाहिए? लोकतंत्र केवल चुनाव जीतने का माध्यम नहीं है, बल्कि यह जनता के प्रति जवाबदेही और संवेदनशीलता का भी नाम है। यदि देश का आम नागरिक सीमित आय में अपना घर चलाने के लिए अनेक प्रकार की कटौतियाँ करता है, तो सरकारों को भी राष्ट्रहित में अनावश्यक खर्चों पर नियंत्रण लगाने की नैतिक जिम्मेदारी निभानी चाहिए। आज आवश्यकता इस बात की है कि सरकारी तंत्र में सादगी को केवल भाषणों तक सीमित न रखा जाए, बल्कि उसे व्यवहार और नीति का स्थायी हिस्सा बनाया जाए।
पिछले कुछ वर्षों में यह स्पष्ट रूप से देखा गया है कि सरकारी आयोजनों, प्रचार अभियानों, विशाल रैलियों, विदेशी दौरों, भव्य स्वागत समारोहों और अत्यधिक सुरक्षा व्यवस्थाओं पर अरबों रुपये खर्च किए जाते हैं। कई बार ये खर्च ऐसे समय में भी होते हैं जब देश के अनेक हिस्सों में किसान आर्थिक संकट से जूझ रहे होते हैं, युवा रोजगार के लिए भटक रहे होते हैं और सरकारी अस्पतालों में बुनियादी सुविधाओं का अभाव दिखाई देता है। जनता यह देखकर स्वाभाविक रूप से प्रश्न करती है कि क्या इन खर्चों में कुछ संयम नहीं बरता जा सकता? क्या लोकतंत्र की गरिमा बनाए रखने के लिए सादगी पर्याप्त नहीं है? यदि सरकारी कार्यक्रमों में अत्यधिक दिखावा कम कर दिया जाए, महंगे मंचों और सजावटों की जगह सरल आयोजन किए जाएँ, तो इससे न केवल सरकारी धन की बचत होगी बल्कि जनता के बीच यह संदेश भी जाएगा कि सरकार स्वयं भी त्याग और अनुशासन का पालन कर रही है।
भारतीय समाज में सादगी और मितव्ययिता की परंपरा सदियों पुरानी रही है। देश के स्वतंत्रता आंदोलन के अनेक नेताओं ने अत्यंत साधारण जीवन जीते हुए भी महान कार्य किए। उन्होंने यह सिद्ध किया कि राष्ट्र निर्माण के लिए वैभव नहीं, बल्कि विचार, ईमानदारी और सेवा भावना आवश्यक होती है। आज दुर्भाग्य से राजनीति और प्रशासन के कई क्षेत्रों में दिखावे की संस्कृति बढ़ती दिखाई देती है। बड़े-बड़े काफिले, महंगे होटल, विशेष विमानों का उपयोग, अत्यधिक प्रचार और स्वागत-सम्मान की परंपराएँ आम जनता और शासक वर्ग के बीच दूरी पैदा करती हैं। लोकतंत्र में शासक और जनता के बीच यह दूरी जितनी कम होगी, शासन उतना ही अधिक संवेदनशील और प्रभावी होगा। इसलिए समय की माँग है कि सादगी को फिर से राष्ट्रीय चरित्र का हिस्सा बनाया जाए।
सरकारी खर्चों में बचत का सबसे बड़ा लाभ यह होगा कि बचाया गया धन शिक्षा, स्वास्थ्य, ग्रामीण विकास, सिंचाई, रोजगार और वैज्ञानिक अनुसंधान जैसे क्षेत्रों में लगाया जा सकेगा। आज भी देश के अनेक सरकारी विद्यालयों में पर्याप्त शिक्षक नहीं हैं, कई अस्पतालों में दवाओं और उपकरणों की कमी है तथा गाँवों में मूलभूत सुविधाओं का अभाव है। यदि सरकारें प्रचार और दिखावे पर होने वाले खर्च का एक हिस्सा भी इन क्षेत्रों में लगा दें, तो करोड़ों लोगों का जीवन बेहतर बनाया जा सकता है। यह समझना आवश्यक है कि राष्ट्र की वास्तविक शक्ति उसके नागरिकों की शिक्षा, स्वास्थ्य और उत्पादक क्षमता में होती है, न कि सरकारी आयोजनों की भव्यता में।
डिजिटल तकनीक के इस युग में अनेक सरकारी कार्य अत्यंत कम लागत में किए जा सकते हैं। बैठकों, सम्मेलनों और प्रशिक्षण कार्यक्रमों को ऑनलाइन माध्यम से आयोजित कर यात्रा और आवास पर होने वाले बड़े खर्च को कम किया जा सकता है। सरकारी फाइलों को पूर्णतः डिजिटल बनाने से कागज, प्रिंटिंग और भंडारण पर होने वाला खर्च घटेगा। इसी प्रकार ऊर्जा संरक्षण की दिशा में गंभीर प्रयास किए जाएँ तो बिजली पर होने वाला खर्च भी कम किया जा सकता है। सरकारी भवनों में सौर ऊर्जा, वर्षा जल संचयन और ऊर्जा दक्ष उपकरणों का उपयोग केवल पर्यावरण संरक्षण ही नहीं करेगा, बल्कि दीर्घकाल में सरकारी खजाने पर पड़ने वाले बोझ को भी कम करेगा। यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि जिस देश में करोड़ों लोग बिजली और पानी बचाने का प्रयास करते हैं, उसी देश के अनेक सरकारी कार्यालयों में संसाधनों की भारी बर्बादी दिखाई देती है।
सरकारी योजनाओं और परियोजनाओं में पारदर्शिता की कमी भी अनावश्यक खर्च का एक बड़ा कारण है। कई परियोजनाएँ वर्षों तक अधूरी पड़ी रहती हैं, उनकी लागत कई गुना बढ़ जाती है और अंततः उसका बोझ जनता पर पड़ता है। यदि समयबद्ध निगरानी, तकनीकी पारदर्शिता और सामाजिक लेखा परीक्षण की व्यवस्था मजबूत हो, तो भ्रष्टाचार और अपव्यय दोनों पर नियंत्रण लगाया जा सकता है। जनता यह जानना चाहती है कि उसके द्वारा दिए गए कर का उपयोग कहाँ और कैसे हो रहा है। इसलिए सभी मंत्रालयों और विभागों के खर्च का नियमित सार्वजनिक विवरण जारी किया जाना चाहिए। जब जनता को पारदर्शिता दिखाई देगी, तब सरकार पर विश्वास भी मजबूत होगा।
यह भी आवश्यक है कि जनप्रतिनिधि स्वयं उदाहरण प्रस्तुत करें। यदि सांसद, विधायक और मंत्री सादगी अपनाएँ, अनावश्यक सुविधाओं का त्याग करें और सार्वजनिक जीवन में संयम का संदेश दें, तो उसका सकारात्मक प्रभाव पूरे समाज पर पड़ेगा। समाज में नैतिक नेतृत्व का महत्व बहुत बड़ा होता है। जब जनता अपने नेताओं को सादगी और अनुशासन का पालन करते हुए देखेगी, तब वह भी राष्ट्रहित में त्याग और सहयोग के लिए प्रेरित होगी। इसके विपरीत यदि जनता को यह लगे कि सरकार केवल जनता से बचत की अपेक्षा करती है जबकि स्वयं अपव्यय में लगी हुई है, तो लोकतांत्रिक विश्वास कमजोर होता जाएगा।
आज विश्व के अनेक देशों में शासन व्यवस्था को अधिक किफायती और उत्तरदायी बनाने के प्रयास किए जा रहे हैं। कई देशों ने सरकारी खर्चों की निगरानी के लिए आधुनिक तकनीक का उपयोग बढ़ाया है, जिससे भ्रष्टाचार और फिजूलखर्ची पर नियंत्रण पाया जा सका है। भारत जैसे विशाल देश में भी यह परिवर्तन संभव है, बशर्ते राजनीतिक इच्छाशक्ति मजबूत हो। सरकार यदि चाहे तो कुछ वर्षों के भीतर ही सरकारी खर्चों में हजारों करोड़ रुपये की बचत कर सकती है। यह बचत देश की आर्थिक स्थिति को मजबूत करने के साथ-साथ विकास परियोजनाओं को गति देने में भी सहायक होगी।
यह समझना चाहिए कि सादगी का अर्थ विकास विरोध नहीं है। सादगी का अर्थ केवल इतना है कि सार्वजनिक धन का उपयोग विवेकपूर्ण, जिम्मेदार और राष्ट्रहित में किया जाए। जहाँ खर्च आवश्यक हो, वहाँ अवश्य हो; लेकिन जहाँ केवल दिखावे और प्रचार के लिए खर्च किया जा रहा हो, वहाँ संयम अपनाना ही उचित है। लोकतंत्र में सरकार जनता की सेवक होती है, स्वामी नहीं। इसलिए सरकारी खर्चों की प्राथमिकता भी जनता की वास्तविक आवश्यकताओं के अनुसार तय होनी चाहिए।
आज भारत विश्व की बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में शामिल होने की दिशा में आगे बढ़ रहा है। देश वैज्ञानिक, तकनीकी और औद्योगिक क्षेत्रों में तेजी से प्रगति कर रहा है। लेकिन किसी भी राष्ट्र की वास्तविक महानता केवल आर्थिक आकार से नहीं मापी जाती, बल्कि इस बात से मापी जाती है कि वह अपने संसाधनों का कितना न्यायपूर्ण और जिम्मेदार उपयोग करता है। यदि भारत को वास्तव में एक शक्तिशाली, आत्मनिर्भर और विकसित राष्ट्र बनना है, तो सरकारी तंत्र में सादगी, पारदर्शिता और जवाबदेही को सर्वोच्च प्राथमिकता देनी होगी।
अंततः यह केवल सरकार की जिम्मेदारी नहीं है, बल्कि समाज और नागरिकों की भी जिम्मेदारी है कि वे सार्वजनिक धन के प्रति जागरूक रहें और अपव्यय के विरुद्ध आवाज उठाएँ। लोकतंत्र में जनता केवल मतदाता नहीं होती, बल्कि राष्ट्र की वास्तविक मालिक होती है। इसलिए जनता का यह अधिकार भी है और कर्तव्य भी कि वह सरकार से जवाबदेही और मितव्ययिता की अपेक्षा करे। यदि सरकार और जनता दोनों मिलकर सादगी और बचत की संस्कृति को अपनाएँ, तो भारत न केवल आर्थिक रूप से अधिक मजबूत बनेगा बल्कि नैतिक रूप से भी विश्व के सामने एक आदर्श प्रस्तुत करेगा। राष्ट्र निर्माण केवल बड़े भाषणों से नहीं, बल्कि छोटी-छोटी बचतों और जिम्मेदार निर्णयों से होता है। यही समय की सबसे बड़ी आवश्यकता है।