-अशोक “प्रवृद्ध”
भारत के पश्चिम तट पर प्रभास क्षेत्र में स्थित सोमनाथ केवल एक पाषाण निर्मित मंदिर मात्र नहीं है, अपितु यह आर्यावर्त की जिजीविषा, श्रद्धा और सांस्कृतिक अक्षुण्णता का जाज्वल्यमान प्रतीक है। काल के कपाल पर अंकित विरासत के 75 वर्ष का यह विजयगाथा केवल स्वाधीन भारत के नवनिर्माण का लेखा-जोखा नहीं है, वरन उस ऐतिहासिक संकल्प की सिद्धि है, जिसने सहस्रों वर्षों के ध्वंस और संघर्ष को अपनी आध्यात्मिक ऊर्जा से परास्त कर दिया। यह अमृतस्य पुत्रः की उस यात्रा का प्रतिफलन है, जहां ध्वंस के राख से सृजन का अंकुर फूटता है। सोमनाथ का मूल आधार ऋग्वैदिक ऋचाओं में सन्निहित है। सोम शब्द का अर्थ केवल चंद्र नहीं, अपितु वह दिव्य औषधि और आनंद का रस है, जो ब्रह्मांडीय चेतना को पुष्ट करता है। ऋग्वेद 9/1/1 के अनुसार सोम ही वह तत्व है जो देवत्व को जाग्रत करता है। सोमनाथ का प्राचीन नाम प्रभास है, जिसका अर्थ है प्रकृष्ट भास अर्थात- वह स्थान, जहां परम प्रकाश का साक्षात प्रकटीकरण हो। उपनिषदों के “अणोरणीयान् महतो महीयान्” के सिद्धांत के अनुरूप सोमनाथ का ज्योतिर्लिंग उस निराकार ब्रह्म का साकार स्तंभ है, जो काल की सीमाओं से परे है। यहां सोम (उमा सहित शिव) का स्वरूप शक्ति और शिव के सामंजस्य को दर्शाता है। स्कंद पुराण के प्रभात खंड में सोमनाथ की महिमा का विस्तृत वर्णन मिलता है। पौराणिक आख्यान के अनुसार दक्ष प्रजापति के शाप से क्षय रोग से ग्रस्त चंद्रमा ने इसी सरस्वती-हिरण्या-कपिला के त्रिवेणी संगम पर तपस्या कर पुनर्जीवन प्राप्त किया था। इस स्थल में सृजन और ध्वंस का चक्र निरंतर चलता रहा है। पौराणिक कथा क्रम के अनुसार यहां सतयुग में सोमराज (चंद्रमा) द्वारा स्वर्ण निर्मित मंदिर था। त्रेतायुग में रावण द्वारा रजत (चांदी) निर्मित मंदिर था। द्वापरयुग में भगवान श्रीकृष्ण द्वारा काष्ठ (चन्दन) निर्मित मंदिर था। और अभी कलियुग में भीमदेव और कुमारपाल द्वारा पाषाण निर्मित मंदिर है। यह क्रम यह सिद्ध करता है कि सोमनाथ का अस्तित्व भौतिक पदार्थों पर नहीं, बल्कि लोक मानस की अटल आस्था पर टिका है। लुटेरों ने मंदिर की देह को तोड़ा, किंतु उसकी आत्मा सदैव अभेद्य रही।
ऐतिहासिक विवरणियों के अनुसार 1947 में भारत की स्वतंत्रता के पश्चात लौह पुरुष सरदार वल्लभभाई पटेल ने प्रभास की पावन भूमि पर जो संकल्प लिया, वह आधुनिक भारत के सांस्कृतिक स्वाभिमान का सूर्योदय था। 13 नवंबर 1947 को सरदार पटेल द्वारा मंदिर के पुनर्निर्माण की घोषणा की गई। मोहनदास करमचंद गांधी ने सुझाव दिया कि मंदिर का निर्माण सरकारी धन से नहीं, अपितु जन सहयोग (लोक पुंजी) से होना चाहिए। जय सोमनाथ के उद्घोष के साथ कन्हैयालाल माणिकलाल मुंशी ने भारतीय विद्या भवन के माध्यम से सोमनाथ के गौरव को वैश्विक पटल पर रखा। 11 मई 1951 को भारत के प्रथम राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद द्वारा ज्योतिर्लिंग की प्राण प्रतिष्ठा की गई। विगत 75 वर्षों में सोमनाथ ने एक स्मृति शेष ढांचे से उठकर एक जीवंत सांस्कृतिक केंद्र के रूप में स्वयं को स्थापित किया है। यह कालखंड केवल जीर्णोद्धार का नहीं, बल्कि स्व के बोध का उत्सव है। यह शाश्वत्त सत्य है कि सोमनाथ का विनाशकारी इतिहास विदेशी आक्रांताओं की कुंठा का प्रतीक था, जबकि इसका पुनर्निर्माण भारतीय मेधा की विजय का। सोमनाथ का बाण स्तंभ इस तथ्य का वैज्ञानिक प्रमाण है कि यहां से दक्षिण ध्रुव तक जल के मध्य कोई भूमि अवरोध नहीं है। यह हमारे पूर्वजों के खगोलीय और भौगोलिक ज्ञान की पराकाष्ठा है। वास्तव में सोमनाथ राष्ट्रीय एकता का सूत्रधार है। यह मंदिर अध्यात्म और विज्ञान के समन्वय का केंद्र है। और 75 वर्षों की यह यात्रा सांस्कृतिक दासता से मुक्ति का घोषणापत्र है। आज सोमनाथ केवल एक तीर्थ नहीं, बल्कि आधुनिक भारत के निर्माण की प्रेरणा है। यह हमें सिखाता है कि जो राष्ट्र अपनी जड़ों और विरासत का सम्मान करता है, उसे काल का प्रवाह कभी विस्मृत नहीं कर सकता। विरासत के 75 वर्ष इस बात का साक्षी हैं कि सोमनाथ पुनः अपने उस वैभव को प्राप्त कर चुका है, जिसकी आभा से संपूर्ण विश्व आलोकित है। वस्तुतः सोमनाथ की वैभवगाथा भारत के आत्मसम्मान के पुनरुत्थान की गाथा है।
वैदिक मतानुसार सोम केवल एक वनस्पति या चंद्र का पर्याय नहीं, अपितु वह ऋत अर्थात ब्रह्मांडीय सत्य का संवाहक है। ऋग्वेद के नवम मंडल में सोम की स्तुति पवमान के रूप में की गई है। प्रभास क्षेत्र का उल्लेख प्राचीनतम सरस्वती नदी के विसर्जन स्थल के रूप में मिलता है। भूगर्भ शास्त्रीय शोध बताते हैं कि सरस्वती का लुप्त मार्ग इसी क्षेत्र के निकट अरब सागर में मिलता था, जो इसे वैदिक काल की प्रधान ऊर्जा स्थली सिद्ध करता है। श्वेताश्वतरोपनिषद के अनुसार “तमीश्वराणां परमं महेश्वरं”, अर्थात- वह ईश्वरों का भी परम ईश्वर है। सोमनाथ का ज्योतिर्लिंग उसी अनंत प्रकाश स्तंभ का प्रतीक है, जिसका न आदि है न अंत। यहां का दर्शन अद्वैत पर आधारित है। सोम (चंद्र) जो मन का प्रतीक है, जब शिव (परम चेतना) में विलीन होता है, तब सोमनाथ का प्राकट्य होता है। यह स्थान जीवात्मा के परमात्मा में विलय की आध्यात्मिक प्रयोगशाला है। स्कंद पुराण और महाभारत के अनुसार इस स्थल में भगवान श्रीकृष्ण ने अपनी देह त्याग कर स्वधाम प्रस्थान किया था। भालका तीर्थ और देहोत्सर्ग की यह भूमि सोमनाथ को केवल एक मंदिर नहीं, बल्कि मोक्ष द्वार के रूप में प्रतिष्ठित करती है। पौराणिक मान्यतानुसार जब-जब धर्म की ग्लानि हुई, सोमनाथ के स्वरूप ने नवीन कलेवर धारण किया। यह मंदिर भारतीय वास्तुकला के मारु गुर्जर शैली का सर्वोत्कृष्ट उदाहरण रहा है। 1947 में जब जूनागढ़ रियासत का भारत में विलय हुआ, तब वह केवल भौगोलिक विजय नहीं थी, बल्कि सांस्कृतिक विजय का प्रथम चरण था। सरदार पटेल ने प्रभास की लहरों को साक्षी मानकर जो संकल्प लिया, वह तत्कालीन भारत की अस्मिता का शंखनाद था। सोमनाथ का पुनर्निर्माण इस सत्य का उद्घोष था कि स्वतंत्र भारत अपनी जड़ों को विस्मृत नहीं करेगा। विगत 75 वर्षों में सोमनाथ ट्रस्ट ने जिस पारदर्शी पद्धति से इस धरोहर को संजोया है, वह विश्व के लिए एक प्रतिमान है। मंदिर का दक्षिण की ओर मुख और बाण स्तंभ की अवस्थिति यह दर्शाती है कि भारत प्राचीन काल से ही समुद्र विज्ञान और खगोल शास्त्र में अग्रणी था। सोमनाथ का इतिहास विनाश और सृजन के मध्य का द्वंद्व है। आक्रांताओं ने इसे नष्ट करने का प्रयास कर अपनी संकीर्णता का परिचय दिया, जबकि भारत ने इसके पुनर्निर्माण से अपनी उदारता और सनातनता को सिद्ध किया। आज 75 वर्षों की यह विरासत हमें यह संदेश देती है कि सत्य को दबाया जा सकता है, किंतु उसे परास्त नहीं किया जा सकता।
वैदिक मतानुसार सोम शब्द का अर्थ है- स-उमा अर्थात शक्ति के साथ शिव। ऋग्वेद के नवम मण्डल के पवमान सूक्त में जिस दिव्य रस की चर्चा है, सोमनाथ उसी का भू सांस्कृतिक केंद्र है। औपनिषदिक दृष्टि से यह मंदिर छान्दोग्य उपनिषद के उस सत्य को प्रतिपादित करता है, जहां सूर्य और सोम के मिलन से ब्रह्मांडीय ऊर्जा का संतुलन बनता है। प्रभास क्षेत्र की भौगोलिक स्थिति ऐसी है, जहां सरस्वती का विलोप और समुद्र का संगम एक विलक्षण चुंबकीय क्षेत्र निर्मित करता है। पुराणों में सोमनाथ को प्रलय के बाद का प्रथम प्रकाश कहा गया है। स्कंद पुराण के प्रभास खंड में अंकित तथ्य संकेत देते हैं कि यह स्थान चंद्रमा के क्षय रोग (अंधकार) की समाप्ति का प्रतीक है। यह प्रतीकात्मक रूप से अज्ञान के विनाश और ज्ञान के उदय का क्षेत्र है। महाभारत के मौसल पर्व में श्रीकृष्ण का इस भूमि को चुनना यह सिद्ध करता है कि सोमनाथ केवल शैव परंपरा ही नहीं, अपितु संपूर्ण सनातनी चेतना का केंद्र रहा है। यही कारण है कि 1947 में भारत की स्वाधीनता के पश्चात सोमनाथ का पुनरुद्धार आधुनिक भारतीय इतिहास की सबसे साहसी घटना मानी गई। यह 75 वर्ष केवल ईंट और पत्थर के जुड़ने के नहीं, बल्कि राष्ट्र के टूटे हुए आत्मविश्वास को जोड़ने के साक्षी रहे हैं। सरदार पटेल ने स्पष्ट किया था कि सोमनाथ का निर्माण सरकारी कार्य नहीं, बल्कि लोक संकल्प होना चाहिए। के.एम. मुंशी जी ने सोमनाथ को भारतीय संस्कृति का अक्षय पात्र कहा। उनके संपादन में सोमनाथ का इतिहास एक शोधपरक ग्रंथ के रूप में उभरा। मंदिर का बाण स्तंभ आज भी आधुनिक भूगोलवेत्ताओं के लिए विस्मय का विषय है, जो बिना किसी भूमि अवरोध के सीधे दक्षिण ध्रुव की ओर संकेत करता है। सोमनाथ का इतिहास सात बार ध्वस्त होकर पुनः उठ खड़े होने का है। यह फीनिक्स की तरह राख से जन्म लेने वाली सभ्यता का प्रतीक है। आक्रांताओं ने मंदिर को धन के लोभ में लूटा, लेकिन वे उस श्रद्धा पुंज को नहीं लूट सके जो जनमानस के हृदय में था। आज 75 वर्षों की यह यात्रा हमें सिखाती है कि भौतिक ढांचा नष्ट किया जा सकता है, किंतु शाश्वत सत्य को मिटाना असंभव है। सोमनाथ का पुनरुत्थान भारत की सांस्कृतिक संप्रभुता की पुनर्स्थापना है। यह मंदिर आज न केवल श्रद्धा का केंद्र है, बल्कि अनुसंधान, पुरातत्व और स्थापत्य का एक ऐसा वैश्विक विश्वविद्यालय है, जो आने वाली पीढ़ियों को स्व की पहचान कराता रहेगा। सोमनाथ की यह गाथा केवल एक देवालय का इतिहास नहीं, अपितु आर्यावर्त की उस जिजीविषा का साक्षात् प्रकटीकरण है, जिसने काल के थपेड़ों को सहकर भी अपनी अस्मिता को अक्षुण्ण रखा।