कविता

रसोई से धूप तक

— डॉ. नेहा गौड़
कई दिनों से
तुम
मेरे उठने से पहले जाग जाते हो
रसोई से
धीमी आवाज़ें आती हैं
चम्मच का कप से छू जाना
गैस का कम हो जाना
खिड़की का थोड़ा खुल जाना

मैं जानती हूँ
तुम मुझे जगाना नहीं चाहते
फिर भी
नींद
उन्हीं आवाज़ों से टूटती है
और मैं
कुछ देर तक
वैसे ही पड़ी रहती हूँ
जैसे घर नहीं
कोई शांत बहाव हो
जो मुझे छूकर निकल जाता है

घर ने अपनी आदतें बदल ली थीं
दरवाज़े
खुलने से पहले
थोड़ा रुक जाते हैं
घड़ी
समय को
कम बेचैनी से नापती है
धूप
खिड़की से भीतर आने से पहले
ठहर जाती है

मैंने नहीं समझा था तब
कि यह सब
तुम्हारे होने का असर है

धीरे-धीरे
मैंने देखा
तुम
पत्ते नहीं तोड़ते
बहस में आवाज़ नहीं बढ़ाते
और टूटती चीज़ों को
दोनों हाथों से थाम लेते हो
यहाँ तक कि
किताब पढ़ते हुए
पन्ने भी
बहुत धीरे पलटते हो
जैसे शब्द नहीं
किसी की नींद रखी हो उन पर

प्रेम
मनुष्य के छूने का ढंग बदल देता है
और दुनिया
इसी कारण
पूरी तरह टूटी नहीं लगती
क्योंकि कहीं न कहीं
अब भी
कोई मनुष्य
प्रेम में पड़ा है।