— डॉ. नेहा गौड़
साँस तो चलती है,
पर जीना भूल जाते हैं।
साथ चलते हैं कदम,
पर साथ देना भूल जाते हैं।
जो निकले थे कभी
इस भीड़ का नेतृत्व करने,
अक्सर उसी अनजानी भीड़ में
खो जाते हैं—
हाँ, लोग अक्सर भूल जाते हैं।
भुला दिए हैं मनुष्यों ने—
होली के वे चंचल रंग,
फागुन की वह अल्हड़ उमंग,
और रक्तिम-हरित संबंधों का
वह जीवंत प्रसंग।
तभी तो अब
दीपावली के माटी के दीए
तिमिर से लड़ने के बजाय
बुझने को फड़फड़ाते हैं,
क्योंकि लोग अक्सर भूल जाते हैं।
विस्मृत हो चुकी है अब—
भोर के सूर्य की
वह पहली निश्छल किरण,
और निरुद्देश्य हँसी-मज़ाक के
वे बीते क्षण।
मुट्ठी भर शोहरत ने
ऐसे निगला है घर का आँगन
कि गुड्डे-गुड़ियों के ब्याह भी
अब वहाँ शोर नहीं मचाते,
क्योंकि लोग अक्सर भूल जाते हैं।
लोग भूल चुके हैं
इतिहास का वह फैला हुआ हाथ,
जब द्वारकाधीश ने
थामा था सुदामा का साथ।
आज हर पवित्र संबंध की नींव पर,
वे दंभ के खोखले महल बनाते हैं,
क्योंकि लोग अक्सर भूल जाते हैं।
और फिर—
एक दिन वे लौटते हैं,
मसान में किसी देह को
अग्नि के सुपुर्द कर,
अस्थि
यों को मौन जल में
विसर्जित कर आते हैं।
गंगा के जल से
वे केवल देह के पाप धोते हैं,
पर समय का वह अदृश्य चक्र
फिर भी भूल जाते हैं—
क्योंकि, ‘नेहा’,
लोग अक्सर भूल जाते हैं।