कोली की फांसी पर फिर मुहर से ‘तसल्ली’

-रमेश पाण्डेय-
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निश्चित रूप से सुप्रीम कोर्ट और राष्ट्रपति के निर्णय से उन मृत मासूमों की आत्मा को शांति मिली होगी, जो इंसानी शक्ल में हैवान बने सुरेन्द्र कोली की बर्बरता का शिकार बने थे। यह तारीख देश के इतिहास में तवारीख बनेगी। उत्तर प्रदेश के बहुचर्चित निठारी कांड के मुख्य आरोपी सुरेंद्र कोली की मौत की सजा पर सुप्रीम कोर्ट ने एक बार फिर मुहर लगा दी है। 24 जुलाई 2014 को सुप्रीम कोर्ट ने कोली की पुनर्विचार याचिका खारिज करते हुए कहा कि उन्हें अपने पूर्व फैसले में दखल देने का कोई आधार नजर नहीं आता। कोली को 15 वर्षीय छात्रा हलदर की हत्या के जुर्म में शीर्ष अदालत ने 15 फरवरी, 2011 में फांसी की सजा सुनाई थी। अभी पिछले सप्ताह ही राष्ट्रपति ने उसकी दया याचिका खारिज की है। कोली ने तीन साल बाद यह पुनर्विचार याचिका दाखिल की थी। छात्रा आठ फरवरी, 2005 से लापता थी। बाद में उसके कपड़े आदि पंधेर की कोठी से बरामद हुए थे। न्यायमूर्ति एचएल दत्तू व न्यायमूर्ति अनिल आर दवे ने फांसी पर रोक की अर्जी व पुनर्विचार याचिका खारिज करते हुए अपने आदेश में कहा कि पुनर्विचार याचिका 1153 दिन की देरी से दाखिल की गई है। साथ ही उन्होंने मामले से जुड़े दस्तावेज और पुनर्विचार याचिका पर गहराई से विचार किया लेकिन उन्हें अपने पूर्व फैसले में दखल देने का कोई आधार नजर नहीं आया। पीठ ने कोली की पुनर्विचार याचिका देरी और मेरिट दोनों आधारों पर खारिज की है। इस आदेश से पहले सुबह कोली के वकील ने कोर्ट के समक्ष मामले का जिक्र करते हुए कहा कि कोली ने एक अर्जी दाखिल की है जिसमें उसने पुनर्विचार याचिका पर खुली अदालत में सुनवाई की मांग की है। ऐसे में उसकी याचिका पर सुनवाई चार सप्ताह के लिए टाल दी जाए और उसकी अर्जी को लालकिला हमले के दोषी के साथ सुनवाई के लिए लगाया जाए। पीठ ने इन्कार करते हुए कहा कि पुनर्विचार याचिका सुनवाई के लिए लगी है। ऐसे में इस अर्जी पर विचार नही हो सकता है। इसके बाद दोपहर में कोर्ट ने चौंबर में सकुर्लेशन के जरिये सुनवाई करके कोली की पुनर्विचार याचिका खारिज कर दी। सुप्रीम कोर्ट ने फरवरी, 2011 के अपने फैसले में कोली को निचली अदालत और हाई कोर्ट से सुनाई गई फांसी की सजा बरकरार रखते हुए उसके अपराध को भयावह और बर्बर कहा था।

कोर्ट ने कहा था कि कोली सीरियल किलर लगता है और ऐसे मामले सुप्रीम कोर्ट द्वारा तय दुर्लभतम अपराध की श्रेणी में आते हैं। ऐसे अपराधी के प्रति किसी तरह की दया नहीं की जा सकती। वह हत्या करने के लिए विशिष्ट तरीका अपनाता था। घर के पास से गुजरने वाली छोटी बच्चियों को उनकी कमजोरी का फायदा उठा लालच देकर अंदर बुलाता था। फिर गला घोंट कर मार देता था। मारने के बाद उनसे यौनाचार की कोशिश करता था। उनके अंग काट कर खा जाता था। बचे हुए अंगों को घर के पीछे की गैलरी और घर से सटे नाले में फेंक देता था। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि नोएडा सेक्टर 31 की कोठी डी 5 एक तरह से बूचड़खाना बन गई थी जहां मासूम बच्चों का नियमित कत्ल होता था। कोली ने मजिस्ट्रेट के सामने स्वेच्छा से अपराध स्वीकार किया है। अब इस हैवान की हैवानियत का शिकार बने मासूमों के परिजनों को उस दिन का इंतजार है, जिस दिन इस हैवान को फांसी पर चढ़ाया जाएगा। सही मायने में उसी दिन उन मासूमों के परिजनों के दिल को तसल्ली मिल सकेगी।

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