लेखक परिचय

डॉ. मधुसूदन

डॉ. मधुसूदन

मधुसूदनजी तकनीकी (Engineering) में एम.एस. तथा पी.एच.डी. की उपाधियाँ प्राप्त् की है, भारतीय अमेरिकी शोधकर्ता के रूप में मशहूर है, हिन्दी के प्रखर पुरस्कर्ता: संस्कृत, हिन्दी, मराठी, गुजराती के अभ्यासी, अनेक संस्थाओं से जुडे हुए। अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति (अमरिका) आजीवन सदस्य हैं; वर्तमान में अमेरिका की प्रतिष्ठित संस्‍था UNIVERSITY OF MASSACHUSETTS (युनिवर्सीटी ऑफ मॅसाच्युसेटस, निर्माण अभियांत्रिकी), में प्रोफेसर हैं।

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-डॉ. मधुसूदन-
hindi

-भाग दो-

(आठ) हिंदी की अक्षरांकित देवनागरी ध्वनिलिपि

ध्वनि की लघुतम इकाई के चिह्न, अक्षर ही हैं। इन अक्षरों के समूह को जब अर्थ भी होता है, तो शब्द माने जाते हैं। यह हिन्दी की परम्परागत लिपि होने के कारण, आप इससे परिचित ही है। पर इस लिपिका गुणगान एक संस्कृतज्ञ के अनुवादित शब्दों में देखिए। आपका गौरव जगे बिना नहीं रहेगा।
रोमन लिपि की वकालत करनेवाले विद्वानों के लिए यह उद्धरण प्रस्तुत करता हूं।
एए मॅकडॉनेल क्या कहते हैं?
(पहले मूल अंग्रेज़ी देकर-नीचे हिंदी अनुवाद दिया है)
“It not only represents all the sounds of the Sanskrit language. but is arranged on a thoroughly scientific method…..We Europeans, on the other hand, 2500 years later. and in scientific age, still employ an alphabet which is not only inadeequate to represent all the sounds of our languages, but even preserves the random order in which vovels and consonents are jumbled up as they were in the Greek adaotion of the primitive Semitic arrangement of 3000 years ago.”
A History of Sanskrit Literature, A. A. Macdonell, p. 17.

देवनागरी लिपि,
मॅकडॉनेल कहते हैं।
देव नागरी लिपि, मात्र संस्कृत के सभी उच्चारों को ही नहीं दर्शाती, पर लिपि को विशुद्ध वैज्ञानिक आधार देकर उच्चारों का वर्गीकरण भी करती है।… और दूसरी ओर, हम युरप वासी आज, २५०० वर्षों के बाद भी, (तथाकथित) वैज्ञानिक युग में उन्हीं A B C D खिचडी वर्णाक्षरों का प्रयोग करते हैं, जो हमारी भाषाओं के सारे उच्चारणों को दर्शाने में असमर्थ और अपर्याप्त है, स्वर और व्यंजनो की ऐसी खिचड़ी को, उसी भोंडी अवस्था में बचाके रखा है, जिस जंगली अवस्था में, ३००० वर्षों पहले अरब-यहूदियों से प्राप्त किया था। -संस्कृत साहित्य का इतिहास -एए. मॅकडॉनेल पृष्ठ (१७)

अच्छा हुआ, “मॅकडॉनेल साहेब” आपने सुधार नहीं किया, तनिक हमारी तो सोचते, आप यदि सुधार करते तो फिर हम कुली झमुरे, किस की नकल करते? अंग्रेज़ी के मानसिक गुलाम हम कहां जाते? किसकी ओर ताकते ?

(नौ) “संस्कृत साहित्य का इतिहास” पुस्तक के लेखक, मॅकडॉनेल (१८५४-१९३०)
यह मॅकडॉनेल (१८५४-१९३०) बिहार में जन्मे, जर्मनी और इंग्लैण्ड में संस्कृत पढ़े थे।
१८८४ में, ऑक्सफर्ड युनिवर्सिटी में संस्कृत के प्रोफ़ेसर नियुक्त हुए थे। ७००० संस्कृत की हस्तलिखित पाण्डुलिपियां काशी से खरिद कर ऑक्सफ़र्ड ले गए थे। इस काम में उन्हें भारत के गवर्नर जनरल लॉर्ड कर्ज़न(१८५९-१९२५) नें सहायता की थी। कुल १०.००० संस्कृत की पाण्डु लिपियां मॅकडोनेल ने ऑक्सफ़र्ड को दान दी थी। उनकी मृत्यु पहले वे ऋग्वेद का अनुवाद कर रहे थे।

(दस) (छः) १०.००० संस्कृत पाण्डु-लिपियां ऑक्सफ़र्ड को दान।
ये हमारे हितैषी थे या नहीं; मुझे संदेह है। क्यों कि इन्होंने हमारी पाण्डुलिपियां चुराने का भी काम किया था। वे संस्कृत से प्रभावित थे, पर अपने निजी उद्देश्य से। सारी रॉयल एशियाटिक सोसायटी पाण्डुलिपियों को संग्रह करने का नाटक कर, चुनी हुयी लिपियां युरप भेजा करती थीं।

जी हां, कुल १०.००० संस्कृत की पाण्डु लिपियां मॅकडोनेल ने ऑक्सफ़र्ड को दान दी थी। और इन की ओर आदर से देखनेवालों को यह भी सोचना होगा कि क्या यह सरासर चोरी नहीं है। मूर्ख हैं भारतवासी हम, हमें कौन हितकारी और कौन अहितकारी है, इसका भी ज्ञान नहीं है। जो भी हमें लूट लेता है, उसी को हम परम आदर से देखते हैं। उसीकी भाषा पर गर्व करते हैं।
पाण्डुलिपियां किसकी ? तो, हमारी।
दान कौन दे रहा है? तो मॅकडॉनेल।
और किसको? तो बोले ऑक्सफ़र्ड को।

वाह! महाराज मान गए। पाण्डुलिपियां हमारी, किस अधिकार से मॅकडॉनेल उसे किसी तीसरी ईकाई ऑक्सफर्ड को दान देते हैं? और मेरा भोलानाथ भारत उस पर हर्षित और गर्वित है।

(ग्यारह) रोमन लिपि में गीता।
कुछ रोमन में संस्कृत प्रयोग के इच्छुक पाठकों का ध्यान चाहता हूं। यदि गीता का पहला श्लोक आप रोमन में लिखकर देखें, तो, कैसा दिखेगा?
मूल श्लोक:
धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे समवेता युयुत्सवः
मामकाः पाण्डवाश्चैव किमकुर्वत सञ्जय॥

अब रोमन में लिखिए।
Dharmakshetre Kurukshetre samavetaa yuyutsavah.
Mamakah Paandavaashchaiv kimakurvat sanjay.
रोमन लिपि ही सीखा हुआ, बालक उसे कठिनाई से पढ़ेगा; तो उच्चारण कैसा होगा?
ढर्मक्षेट्रे कुरुक्षेट्रे समवेटा युयटस्वः
मामकाः पाण्डवाश्चैव किमकुर्वट संजय॥
और ऐसा पढ़ने में जो कठिनाई होगी, हमें उसका सही अनुमान नहीं हो सकता।
——————————————————–
दूसरा उदाहरण लें।
यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत ।
अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम् ॥

इसे रोमन में परिवर्तित करनेपर ये निम्न प्रकार पढ़ा जाएगा।

यडा यडा हि ढर्मस्य ग्लानिर्बहवटी बहारट।
अबह्युस्ठानमढर्मस्य टडाट्मानं स्रिजाम्यहम्‌
———————————————————————–
क्या यही चाहते हैं आप सारे भारत के लिए?
(बारह)
दूसरों की सुविधा के लिए हम क्या क्या त्याग करने को तैयार है?
सारे संसार के परदेशी लोगों की कठिनाई दूर करने वाले, धौतबुद्धि विद्वान भारत की पहचान भी बदल देंगे। दुःख होता है, मुझे ऐसे लोगों के भारतीय होने पर। इनके दिखाए मार्ग पर चले, तो, दो-चार दशकों में देवनागरी लिखित हिन्दी धीरे धीरे रोमन लिपि में लिखी जाएगी। यदि ऐसे रोमन लिपि में ही हिंदी पढ़नेवाले बढ़ते गए, तो कुछ दशकों में देवनागरी में पढ़नेवाले घटते ही चले जाएंगे। आगे क्या होगा, इसकी कल्पना नहीं की जा सकती। भाग्य है, ऐसा सोचनेवाले विशेष नहीं है।

(तेरह)
देवनागरी में विश्व की प्रायः सारी भाषाएं (कुछ सुधार से) लिखी जा सकती है। अंग्रेज़ी के शुद्ध उच्चारण देवनागरी में ही डिक्शनरियों में, कोष्ठक में लिखे जाते हैं। इसी कारण भारत के सारे प्रादेशिक भाषी अंग्रेज़ी का लगभग सही उच्चारण जान जाते हैं। देवनागरी के या देवनागरी जैसी ही अन्य नियमबद्ध भारतीय लिपियों के कारण ही यह संभव है। यही कारण भी है कि हम भारतीयों के अंग्रेज़ी उच्चारण चीनियों की अपेक्षा अधिक शुद्ध पाए जाते हैं।

चीनी भाषा चित्रमय है, वह शब्द के उच्चारण से नहीं पर चित्र से संप्रेषित होती है। अन्य भाषा के उच्चारण को चिह्नित नहीं कर सकती। चीनी भाषी, अपने शिक्षक के प्रत्यक्ष उच्चारण को, सुनकर ही सीख पाते हैं; ऐसा सुना है। पर देवनागरी तो सर्वथा उच्चारण को ही शब्दांकित कर सकती है। यह गुण जितना बड़ा है, उतना ही हमारी जानकारी से परे हैं। हम पानी की उन मछलियों की भांति अज्ञान है, जो पानी से बाहर निकले बिना, पानी का महत्व नहीं जान पाती।

“देवनागरी की रोमन लिपि को चुनौती” नाम से आलेख बना था। पर सुधारकर सौम्य कर दिया। पाठकों को मुक्तता से टिप्पणी करने के आग्रह के साथ समाप्त करता हूं।

7 Responses to “देवनागरी और रोमन लिपि विवाद -2”

  1. डॉ. मधुसूदन

    डॉ. मधुसूदन

    इ मैल से आया संदेश: एयर ह्वाईस मार्शल श्री विश्वमोहन तिवारी जी की सहमति के लिए, और
    विदुषी शकुन्तला जी की उदाहरणों सहित सघन पुष्टि के शब्दों के लिए मैं धन्यवाद करता हूँ।
    =================================

    शकुन्तला जी के कथनों से पूर्ण सहमति।
    उन्हें धन्यवाद
    विश्वमोहन तिवारी

    28 जुलाई 2014 को 12:51 pm को, Shakun Bahadur ने लिखा:

    आदरणीय मधुसूदन जी,
    आपके दोनों आलेखों से मेरी पूर्णरूपेण सहमति है । आपने अनेकों तथ्यपूर्ण तर्कों को सुप्रमाणित प्रस्तुत किया है ,
    जिन्हें पढ़कर किसी भी विवेकी ही नहीं ,सामान्यरूप से शिक्षित व्यक्ति के लिये भी किसी आशंका की स्थिति नहीं
    हो सकती है । मैंने एक लम्बी सूची बनाई थी जिसमें अंग्रेज़ी में रोमन की ध्वनियों से हमारी हिन्दी/ संस्कृत के
    शब्द अशुद्ध और निरर्थक होते जा रहे हैं । गीता के श्लोकों में उच्चारण की हास्यास्पद विरूपता और अनिष्ट अर्थ
    की स्थिति आपने अत्यन्त कुशलता से दर्शाई है। रोमन वर्णमाला में वर्णों की न्यूनता के कारण हिन्दी/संस्कृत के शब्द विकृत हो रहे हैं । रोमन में समान उच्चारण वाले शब्दों की स्पेलिंग का भिन्न होना ( dictation और tension की तरह) और एक ही वर्ण का अलग अलग शब्दों में भिन्न उच्चारण( but और put की तरह )
    भी पाठक को संशय में डाल कर व्यवधान उत्पन्न करेगा । व्यंजन में अकार की उपस्थिति को a के द्वारा बताने से ,काफ़ी समय से लोग ” योग” को योगा कहते हैं । योगासन तो ठीक है किन्तु योगा सुनकर अटपटा सा लगता है , अशुद्ध भी है, लेकिन सभी सुशिक्षित भी योगा का ही प्रयोग करते हैं । कृष्ण को कृष्णा, अशोका ,रामा आदि शब्द प्रचार/ प्रयोग में आ रहे हैं – जो वस्तुत: स्त्रीलिंग रूप हैं।
    हर शब्द के उच्चारण हेतु , हिन्दी की विविध ध्वनियों को सूचित करने वाले अनेकों चिह्नों को याद करना,या बार बार उलट पलट ज्ञात करना पाठ में अतिरिक्त व्यवधान उत्पन्न करेगा । रोमन अपनाने पर, शीघ्र ही हमारे सारे धर्म-ग्रन्थ और साहित्यिक कृतियाँ, महाकाव्य, नाटक आदि विकृत अवस्था प्राप्त करके नष्ट हो जाएँगे । न लिपि रहेगी, न भाषा रहेगी , फिर संस्कृति भी मृत हो जाएगी । राष्ट्र की अस्मिता और गौरव कहाँ और कैसे जीवित रह सकेंगे ? “देवनागरी-रोमन विवाद” समृद्ध राजा भोज और गंगू तेली की तक़रार जैसा प्रतीत होता है ।

    आपके द्वारा आलेखों के माध्यम से इस प्रस्ताव के दोषों और फलस्वरूप होने वाली अपूरणीय क्षति का दिग्दर्शन एक अत्यन्त साहसिक एवं श्रमसाध्य अभियान है , जो बुद्धिजीवियों को जागरूक करने में अवश्य ही संफल होगा ।
    सभी विवेकी जन आपके साथ हैं । आपके अथक प्रयत्न श्लाघनीय हैं।।
    सादर,
    शकुन्तला बहादुर

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    On Jul 25, 2014, at 8:11 AM, Madhusudan H Jhaveri

    Reply
    • ken

      Shakuntalaajii,

      Roman script is nothing but the extension of our old Brahmi and Gupta script. European may have modified these letters to their proper use by altering sounds/shapes. We need to do research in this area.

      Europeans write these words this way because our pundits taught them this way.Look at all city names and names the way we write.We need standard Roman alphabet to suite our Devanagari phonetic scheme.

      Since we apply vowels above/below/side to the letters by keeping words in a compact form we have been able to delete Schwa from the words.
      You may go through this link..

      http://en.wikipedia.org/wiki/Schwa_deletion_in_Indo-Aryan_languages

      http://en.wikipedia.org/wiki/Schwa

      योग,योगा कृष्ण ,कृष्णा, अशोका ,रामा

      યોગ,યોગા કૃષ્ણ ,કૃષ્ણા, અશોકા ,રામા…..India’s simplest script

      yoga,yogā kṛṣṇa ,kṛṣṇā, aśokā ,rāmā ….in IAST

      yogə,yogā kṛṣṇə ,kṛṣṇā, aśokā ,rāmā

      ə=a = Schwa (can be deleted at the end of word or can be learned in pronunciation.

      Now…

      but put dictation tension

      ˈbət ˈpʊt dɪkˈteɪʃən ˈtenʃən…in IPA

      ˈbaṭˈpuṭ dikˈṭeiśan ˈṭenśan…In IAST

      ˈबट् ˈपुट् दिक्ˈटेइशन् ˈटेन्शन्

      ˈબટ્ˈપુટ્ દિક્ˈટેઇશન્ ˈટેન્શન્

      ˈbəṭˈpuṭ dikˈṭeiśən ˈṭenśən…..replaced ‘a’ by ‘ə’

      In internet age all languages can be learned in our chosen script with proper scheme.

      The NRI or English medium students may learn native languages in Roman script through script converter.

      You may study Homophones here.

      http://en.wikipedia.org/wiki/Homophones

      Reply
  2. ken

    First India needs simple Gujanagari script at national level in writing both Hindi and Urdu along with standard Roman keyboard.

    Most European languages written in Roman script have their own keyboards except India

    A standard script converter may work both way for this Shloka but most Indian techies have their own method of transliteration. Lately techies are busy with fonts.

    यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत ।
    अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम् ॥

    યદા યદા હિ ધર્મસ્ય ગ્લાનિર્ભવતિ ભારત |
    અભ્યુત્થાનમધર્મસ્ય તદાત્માનં સૃજામ્યહમ્ ||

    yadā yadā hi dharmasya glānirbhavati bhārata |
    abhyutthānamadharmasya tadātmānaṁ sṛjāmyaham || ….IAST

    yadā yadā hi dharmasya glānirbhavati bhārata |
    abhyutthānamadharmasya tadātmānaṁ sr̥jāmyaham || ….ISO

    yadA yadA hi dharmasya glAnirbhavati bhArata |
    abhyutthAnamadharmasya tadAtmAnaM sR^ijAmyaham || …ITRANS

    yadA yadA hi dharmasya glAnirbhavati bhArata |
    abhyutthAnamadharmasya tadAtmAnaM sRjAmyaham || ….Harvard Kyoto

    यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत ।
    अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम् ॥………..IAST To Devanagari in reverse mode

    क ख ग घ छ ज झ ट ठ ड ढ ण
    त थ द ध न प फ ब भ म य र ल व
    श स ष ह ळ क्ष ज्ञ रू ऋ श्र त्र कृ ऊँ ॐ
    क का कि की कु कू कॅ के कै कॉ को कौ कं कः कँ कृ
    अ आ इ ई उ ऊ ऎ ऍ ए ऐ ऑ ओ औ अं अः

    ક ખ ગ ઘ છ જ ઝ ટ ઠ ડ ઢ ણ
    ત થ દ ધ ન પ ફ બ ભ મ ય ર લ વ
    શ સ ષ હ ળ ક્ષ જ્ઞ રૂ ઋ શ્ર ત્ર કૃ ઊઁ ૐ
    ક કા કિ કી કુ કૂ કૅ કે કૈ કૉ કો કૌ કં કઃ કઁ કૃ
    અ આ ઇ ઈ ઉ ઊ એ ઍ એ ઐ ઑ ઓ ઔ અં અઃ

    ka kha ga gha cha ja jha ṭa ṭha ḍa ḍha ṇa
    ta tha da dha na pa pha ba bha ma ya ra la va
    śa sa ṣa ha ḽa kṣa jña rū ṛ śra tra kṛ ūm̐ oṁ
    ka kā ki kī ku kū kæ ke kai kô ko kau kaṁ kaḥ kam̐ kṛ
    a ā i ī u ū ĕ æ e ai ô o au aṁ aḥ ………….IAST

    ka kha ga gha Cha ja jha Ta Tha Da Dha Na
    ta tha da dha na pa pha ba bha ma ya ra la va
    sha sa Sha ha La kSha j~na rU R^i shra tra kR^i U.N oM
    ka kA ki kI ku kU k^ae ke kai k^ao ko kau kaM kaH ka.N kR^i
    a A i I u U ^e ^ae e ai ^ao o au aM aH …..ITRANS

    Lots of Sanskrit texts are written in Roman (IAST) script.

    http://www.bhagavad-gita.org/Gita/verse-01-01.html

    Here is preferred roman scheme

    ્,ા,િ,ી,ુ,ૂ,ૅ,ે,ૈ,ૉ,ો,ૌ,ં,ઃ
    a,aa,i,ii,u,uu,ă,e,ai,ŏ,o,au,am,an,ah
    ə,ɑː, ɪ,iː,ʊ,ʊː,æ,ɛ,eɪ,ɔː,o,əʊ,əm,ən,əh………IPA

    McDonnell may have taken Paandu lipio but western technology is stolen same way.

    English is instantly machine translatable into Chinese but not the Hindi.

    If a small country like Thailand can do this why can’t India?
    One may click the link.
    http://www.commonsenseadvisory.com/Default.aspx?Contenttype=ArticleDetAD&tabID=63&Aid=1180&moduleId=390

    Reply
    • डॉ. मधुसूदन

      डॉ. मधुसूदन

      केन जी।
      आप का स्रोत और उद्धरण का लेखक, और मात्र उद्धरण दीजिए। अधिकृत लेखक, या भाषावैज्ञानिक ने, उसे किस ग्रंथ में कहा है? जानना चाहता हूँ।
      देवनागरी गुजराती भाषा के जन्म के भी पहले से प्रायोजित होती थी। ब्राह्मी का ही विकास देवनागरी है।
      नागर का अर्थ होता है, नगरों में रहनेवाले-जैसे वानर का अर्थ भी वनों में रहनेवाले होता है।
      आप के मत की पुष्टि मुझे कहीं मिली नहीं।
      आप मात्र उद्धरण और उद्धरण का लेखक एवं उसका प्रमाण स्रोत देकर पुष्टि करें। यह अनुरोध।

      Reply
  3. डॉ. प्रतिभा सक्‍सेना

    pratibha saksena.

    देवनागरी और रोमन लिपि का विवाद वैसा ही परिदृष्य उपस्थित करता है जैसा कि किसी सुसंस्कृत, सुविचारित सुनियोजित, सतर्क और सुसंगतियों से पूर्ण महिला को बेतुके तर्कोंवीली, मनमानी,अपर्याप्त,अनियोजित ध्वनियों में बहकनेवाली ,असंगतियों से युक्त स्त्री के मुकाबले खड़ा कर दिया जाय !.

    Reply
  4. ken

    Here are some article related links.
    http://macdonell.vedicsociety.org.in/contents
    http://en.wikipedia.org/wiki/Arthur_Anthony_Macdonell

    3. A form of Scientific Writing…
    As per this paragraph,Naagari (later Devanagari) script was initiated by Naagar brahmins of Gujarat( which is modified to current Gujanagari form )

    Here are my comment to uplift Hindi.
    http://www.pravakta.com/detail-of-indian-language#comment-75300

    વર્તમાન મેં જીના…….

    http://youtu.be/d5gCPwhj-No

    આઓ મિલકર સંકલ્પ કરે,
    જન-જન તક ગુજનાગરી લિપિ પહુચાએંગે,
    સીખ, બોલ, લિખ કર કે,
    હિન્દી કા માન બઢાએંગે.
    ઔર ભાષા કી સરલતા દિખાયેંગે .
    બોલો હિન્દી લેકિન લિખો સર્વ શ્રેષ્ટ નુક્તા/શિરોરેખા મુક્ત ગુજનાગરી લિપિમેં !

    ક્યા દેવનાગરી કા વર્તમાનરૂપ ગુજનાગરી નહીં હૈ ?

    Reply
  5. मुकुल शुक्ल

    लानत है हम भारतवासियों पर जो इतनी बहुमूल्य धरोहर संस्कृत को छोड़ कर मूर्खों की भाषा अंग्रेज़ी के पीछे पड़े हुए है, जिसे खुद अंग्रेज़ भाषा विज्ञानी एक पिछड़ी हुई भाषा मानते है | कब सुधरेंगे हम और कब हमारे ज्ञान चक्षु खुलेंगे | आज तो हाल ये है की संघ लोक सेवा आयोग मे बैठे नौकरशाहों ने साज़िशन अंग्रेज़ी को बढ़ावा देने के लिए प्रारम्भिक परीक्षा मे अंग्रेज़ी भाषा के ज्ञान को अनिवारी कर दिया है और साथ ही साथ हिन्दी भाषा के लिए अनुवादित निबंधों का प्रयोग किया जाता है जिसे समझना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन है | देश के नौकरशाहों और वकीलों के दिमाग से जब तक गुलाम मानसिकता नहीं जाएगी तब तक भारत मे भारतियों के हाथों मे राज होते हुए भी भारत की भाषाओं की उन्नति होना असंभव है | हमारा देश प्रगति तभी कर पाएगा जब हम अपनी भाषा मे काम करना शुरू करेंगे | आज न्याय प्रणाली अपनी भाषा मे न होने के कारण 3 करोड़ से अधिक मामलों मे लोगों को न्याय के लिए बरसों से इंतज़ार करना पड़ रहा है | जब तक हमारे पास हमारी भाषाओं को लेकर सही तथ्य और मजबूत तर्क नहीं होंगे तब तक इन मानसिक गुलामों से देश को मुक्ति नहीं मिल पाएगी और भारतीय भाषाएँ अंग्रेज़ी की गुलाम होने को मजबूर रहेंगी | आदरणीय डॉक्टर साहब मेरा आप से निवेदन है की आप अपने लेखों का एक ग्रंथ तैयार कीजिये जिसकी मदद से हम अच्छे और वैज्ञानिक तर्कों के साथ इस भ्रष्ट और गुलाम मानसिकता से ग्रसित नौकरशाही और न्याय पालिका से लड़ कर लोगों के ये समझा सकें की हमारे देश की भाषाएँ कितनी महान हैं और संस्कृत भाषा की ओर बढ़ कर ही हमारी उन्नति संभव है | आपके द्वारा किए गए शोध से ज्ञान वर्धन और स्वाभिमान वर्धन के लिए आपको बहुत बहुत आभार |

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