कुमार कृष्णन
राजस्थान के श्रीगंगानगर में एक तेरह वर्षीय छात्रा के साथ कथित सामूहिक यौन उत्पीड़न का मामला केवल एक आपराधिक घटना नहीं है। यह उस सामाजिक संकट का संकेत है जिसकी आहट वर्षों से सुनाई दे रही है लेकिन जिसे हम हर नई घटना के बाद कुछ दिनों के आक्रोश में भुला देते हैं। प्रारंभिक जांच के अनुसार एक नाबालिग छात्रा को कई दिनों तक बंधक बनाकर उसके साथ गंभीर अपराध किए जाने के आरोप हैं। पुलिस ने कई आरोपियों को गिरफ्तार किया है और जांच जारी है। न्यायालय का अंतिम निर्णय अभी आना बाकी है, इसलिए किसी निष्कर्ष पर पहुँचना जल्दबाजी होगी। लेकिन इस घटना ने एक बार फिर उस प्रश्न को हमारे सामने खड़ा कर दिया है जिससे बचना अब संभव नहीं— क्या भारत अपने बच्चों, विशेषकर अपनी बेटियों, को सुरक्षित बचपन दे पा रहा है?
हर बार जब ऐसी कोई घटना सामने आती है, तो हमारा सार्वजनिक विमर्श लगभग एक जैसा होता है। राजनीतिक बयान आते हैं, सोशल मीडिया पर आक्रोश उमड़ता है, कठोर दंड की मांग उठती है और कुछ दिनों बाद सब कुछ सामान्य हो जाता है। लेकिन अपराध सामान्य नहीं होते। वे समाज की गहराइयों में मौजूद उन विकृतियों का परिणाम होते हैं, जिन्हें हम लंबे समय तक अनदेखा करते रहते हैं। इसलिए श्रीगंगानगर की घटना को केवल पुलिस कार्रवाई या अदालत की प्रक्रिया तक सीमित करके नहीं देखा जा सकता। यह हमारे सामाजिक चरित्र, नैतिक शिक्षा, प्रशासनिक सतर्कता और लोकतांत्रिक संवेदनशीलता की सामूहिक परीक्षा है।
भारत में बाल यौन हिंसा का संकट नया नहीं है। पिछले डेढ़ दशक में ऐसे मामलों की रिपोर्टिंग बढ़ी है। इसका एक कारण यह भी है कि बच्चों के यौन शोषण को लेकर समाज में पहले की तुलना में अधिक जागरूकता आई है और पॉक्सो कानून के लागू होने के बाद शिकायत दर्ज कराने का रास्ता अपेक्षाकृत स्पष्ट हुआ है। लेकिन इसके साथ यह भी सच है कि बच्चों के विरुद्ध यौन अपराध आज भी भयावह स्तर पर मौजूद हैं। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के आंकड़े लगातार बताते हैं कि हर वर्ष हजारों बच्चे यौन हिंसा का शिकार होते हैं। इनमें अधिकांश पीड़ित बच्चियां होती हैं और बड़ी संख्या में उनकी आयु किशोरावस्था से भी कम होती है।
इन आंकड़ों का सबसे भयावह पक्ष यह नहीं कि अपराध बढ़ रहे हैं, बल्कि यह है कि अधिकांश मामलों में अपराधी कोई अजनबी नहीं होता। वह परिवार का परिचित, पड़ोसी, रिश्तेदार, मित्र या ऐसा व्यक्ति होता है जिस पर बच्चा और उसका परिवार भरोसा करता है। यानी खतरा बाहर से कम और भीतर से अधिक है। यह तथ्य हमारी पारंपरिक सुरक्षा की समझ को बदल देता है। हम बच्चों को अनजान लोगों से सावधान रहना सिखाते हैं, लेकिन क्या उन्हें यह भी सिखाते हैं कि किसी परिचित द्वारा अनुचित व्यवहार होने पर वे बिना भय अपनी बात कह सकें?
समाजशास्त्री लंबे समय से यह कहते रहे हैं कि किसी भी समाज में महिलाओं और बच्चों के विरुद्ध हिंसा केवल कानून-व्यवस्था की समस्या नहीं होती। वह उस सामाजिक सोच का परिणाम होती है जिसमें शक्ति, प्रभुत्व और स्त्री के प्रति असमान दृष्टि गहराई से मौजूद होती है। जब स्त्री को बराबरी के मनुष्य के बजाय नियंत्रण और उपभोग की वस्तु की तरह देखने वाली मानसिकता संस्कृति, भाषा, मनोरंजन और रोजमर्रा के व्यवहार में सामान्य होने लगती है, तब उसके सबसे भयावह रूप बच्चों के विरुद्ध अपराधों में दिखाई देते हैं। इसलिए केवल अपराधियों को ‘राक्षस’ कह देने से समस्या का समाधान नहीं होगा। यह भी देखना होगा कि ऐसी मानसिकता पैदा कैसे होती है और समाज उसे रोकने में क्यों विफल रहता है।
भारतीय समाज का एक बड़ा विरोधाभास यही है कि एक ओर हम कन्या पूजन करते हैं, स्त्री को शक्ति का स्वरूप बताते हैं, दूसरी ओर बच्चियों के प्रति हिंसा की खबरें लगातार सामने आती रहती हैं। यह विरोधाभास केवल धार्मिक या सांस्कृतिक नहीं, बल्कि सामाजिक व्यवहार का प्रश्न है। सम्मान का अर्थ केवल प्रतीकात्मक पूजा नहीं, बल्कि जीवन के हर क्षेत्र में सुरक्षा, समानता और गरिमा सुनिश्चित करना है। यदि एक बच्ची अपने घर, स्कूल, पड़ोस या सार्वजनिक स्थानों पर भी स्वयं को सुरक्षित महसूस नहीं करती, तो हमारी सांस्कृतिक घोषणाएँ खोखली सिद्ध होती हैं।
श्रीगंगानगर की घटना ने एक और महत्वपूर्ण प्रश्न उठाया है—क्या हमारे सार्वजनिक संस्थान बच्चों की सुरक्षा को लेकर पर्याप्त सतर्क हैं? यदि किसी नाबालिग को संदिग्ध परिस्थितियों में लगातार विभिन्न स्थानों पर ले जाया जाता है, तो क्या कहीं भी ऐसी व्यवस्था नहीं है जो समय रहते संदेह व्यक्त करे? यह प्रश्न केवल पुलिस का नहीं है। होटल, परिवहन तंत्र, स्थानीय समुदाय, बाल संरक्षण तंत्र और नागरिक समाज—सभी की भूमिका की निष्पक्ष समीक्षा आवश्यक है। किसी भी सभ्य समाज में बच्चों की सुरक्षा केवल कानून की जिम्मेदारी नहीं होती; वह सामाजिक संस्कृति का हिस्सा होती है।
यही कारण है कि इस घटना को केवल एक ‘क्राइम स्टोरी’ की तरह पढ़ना पर्याप्त नहीं होगा। इसे भारतीय समाज के बदलते चरित्र, संस्थागत जवाबदेही और लोकतांत्रिक संवेदनशीलता के व्यापक संदर्भ में समझना होगा। क्योंकि जब बचपन असुरक्षित होने लगे, तब संकट केवल कानून का नहीं रहता, वह राष्ट्र के भविष्य का संकट बन जाता है।
भारत ने बच्चों की सुरक्षा के लिए वर्ष 2012 में यौन अपराधों से बच्चों का संरक्षण अधिनियम (पॉक्सो) लागू किया। इस कानून ने पहली बार बच्चों के विरुद्ध यौन अपराधों की स्पष्ट परिभाषा दी, उनकी पहचान गोपनीय रखने का प्रावधान किया और त्वरित न्याय का लक्ष्य निर्धारित किया। इसके बाद समय-समय पर कानून को और कठोर बनाया गया। लेकिन प्रश्न यह है कि क्या केवल कठोर कानून बना देने से अपराध रुक जाते हैं?
वास्तविकता यह है कि कानून का प्रभाव उसकी कठोरता से नहीं, बल्कि उसके प्रभावी क्रियान्वयन से तय होता है। देश में आज भी अनेक मामलों में जांच लंबी खिंच जाती है, फोरेंसिक रिपोर्ट आने में देरी होती है, गवाह मुकर जाते हैं, पीड़ित परिवार सामाजिक दबाव और आर्थिक कठिनाइयों से टूट जाता है तथा मुकदमे वर्षों तक अदालतों में लंबित रहते हैं। न्याय में देरी केवल पीड़ित के साथ अन्याय नहीं होती, बल्कि अपराधियों के भीतर यह विश्वास भी पैदा करती है कि दंड से बच निकलने की संभावना बनी हुई है।
श्रीगंगानगर की घटना ने एक बार फिर यह प्रश्न उठाया है कि क्या हमारी संस्थाएं बच्चों की सुरक्षा के प्रति पर्याप्त संवेदनशील हैं। यदि कोई नाबालिग कई दिनों तक संदिग्ध परिस्थितियों में विभिन्न स्थानों पर रहती है, तो क्या किसी स्तर पर चेतावनी की घंटी नहीं बजनी चाहिए? होटल, परिवहन व्यवस्था, स्थानीय प्रशासन और नागरिक समाज—सभी की अपनी-अपनी जिम्मेदारी है। विकसित देशों में होटल उद्योग और सार्वजनिक संस्थानों के कर्मचारियों को मानव तस्करी तथा बाल शोषण की पहचान के लिए विशेष प्रशिक्षण दिया जाता है। भारत में भी ऐसी व्यवस्था को गंभीरता से लागू करने की आवश्यकता है।
लेकिन इस पूरे विमर्श का सबसे कठिन पक्ष समाज के भीतर छिपा है। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो और विभिन्न अध्ययनों से यह तथ्य सामने आता रहा है कि अधिकांश मामलों में अपराधी कोई अपरिचित व्यक्ति नहीं होता। वह परिवार का सदस्य, रिश्तेदार, पड़ोसी, शिक्षक, मित्र या परिचित होता है। इसका अर्थ यह है कि बच्चों की सुरक्षा का संकट केवल सार्वजनिक स्थानों तक सीमित नहीं है; वह विश्वास के दायरे के भीतर भी मौजूद है। यह स्थिति परिवारों के सामने नई चुनौती खड़ी करती है।
भारतीय परिवारों में यौन शिक्षा को लेकर आज भी असहजता है। माता-पिता बच्चों से इस विषय पर खुलकर बात करने से बचते हैं। परिणाम यह होता है कि बच्चे अनुचित व्यवहार की पहचान ही नहीं कर पाते या पहचान लेने के बाद भी भय, शर्म और अपराधबोध के कारण अपनी बात किसी से नहीं कह पाते। यही मौन अपराधियों की सबसे बड़ी ताकत बन जाता है। विद्यालयों में ‘गुड टच-बैड टच’, व्यक्तिगत सुरक्षा, साइबर सुरक्षा और सहायता मांगने की प्रक्रिया पर व्यवस्थित शिक्षा अब विकल्प नहीं, आवश्यकता है।
डिजिटल युग ने इस संकट को और जटिल बना दिया है। स्मार्टफोन और इंटरनेट ने ज्ञान के नए अवसर दिए हैं, लेकिन अश्लील सामग्री, ऑनलाइन ग्रूमिंग, साइबर ब्लैकमेल और यौन शोषण के नए रास्ते भी खोले हैं। कृत्रिम बुद्धिमत्ता और डिजिटल तकनीक के दौर में बच्चों की सुरक्षा केवल भौतिक दुनिया तक सीमित नहीं रह गई है। अभिभावकों और शिक्षकों को डिजिटल दुनिया की चुनौतियों को समझना होगा। निगरानी और विश्वास के बीच संतुलन बनाना आज पहले से अधिक आवश्यक हो गया है।
समाज को भी अपने भीतर झांकना होगा। क्या हम बच्चों के प्रति सचमुच संवेदनशील हैं? क्या किसी बच्चे की असामान्य स्थिति देखकर हम हस्तक्षेप करते हैं, या यह सोचकर आगे बढ़ जाते हैं कि यह किसी और का मामला है? नागरिक जिम्मेदारी का अर्थ केवल मतदान करना या कर देना नहीं है। यदि समाज अपने सबसे कमजोर नागरिकों की रक्षा के प्रति सजग नहीं है, तो लोकतंत्र का नैतिक आधार भी कमजोर पड़ जाता है।
मीडिया की भूमिका पर भी गंभीर विचार की आवश्यकता है। लोकतंत्र में स्वतंत्र पत्रकारिता अत्यंत महत्वपूर्ण है, लेकिन बच्चों से जुड़े यौन अपराधों की रिपोर्टिंग में संवेदनशीलता सर्वोपरि होनी चाहिए। पीड़ित की पहचान की रक्षा, अपुष्ट सूचनाओं से बचाव और न्यायिक प्रक्रिया का सम्मान—ये केवल कानूनी दायित्व नहीं, बल्कि पत्रकारिता की नैतिक जिम्मेदारियां भी हैं। दुर्भाग्य से कई बार प्रतिस्पर्धा और सनसनी के कारण इन मूल्यों की उपेक्षा होती है। इससे पीड़ित और उसके परिवार की पीड़ा कई गुना बढ़ जाती है।
यह भी ध्यान रखना होगा कि हर ऐसी घटना को राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप का माध्यम बना देना समस्या का समाधान नहीं है। अपराधी का कोई धर्म, जाति या दल नहीं होता; उसका केवल अपराध होता है। बच्चों की सुरक्षा पर राष्ट्रीय सहमति बननी चाहिए। यह विषय चुनावी बहस का नहीं, बल्कि राष्ट्रीय संकल्प का होना चाहिए।
यदि इस संकट का समाधान केवल कठोर दंड में खोजा जाएगा, तो हम समस्या के केवल एक हिस्से को ही संबोधित करेंगे। दंड आवश्यक है, लेकिन उससे भी अधिक आवश्यक है अपराध की सामाजिक जमीन को कमजोर करना। यह तभी संभव होगा जब बाल सुरक्षा को कानून-व्यवस्था के सीमित दायरे से निकालकर सार्वजनिक नीति और सामाजिक संस्कृति का हिस्सा बनाया जाए।
सबसे पहले न्याय व्यवस्था को अधिक सक्षम और संवेदनशील बनाना होगा। पॉक्सो के मामलों की जांच के लिए प्रशिक्षित पुलिस अधिकारियों, आधुनिक फोरेंसिक प्रयोगशालाओं और समयबद्ध अभियोजन की व्यवस्था अनिवार्य होनी चाहिए। फास्ट ट्रैक अदालतों का उद्देश्य तभी पूरा होगा, जब वे वास्तव में त्वरित न्याय दें। न्याय में अनावश्यक विलंब केवल पीड़ित का विश्वास ही नहीं तोड़ता, बल्कि कानून के प्रति समाज का भरोसा भी कमजोर करता है।
दूसरा, बाल संरक्षण की संस्थाओं को अधिक सक्रिय बनाने की आवश्यकता है। स्कूल, आंगनवाड़ी, बाल कल्याण समितियां, जिला बाल संरक्षण इकाइयां और स्थानीय प्रशासन के बीच बेहतर समन्वय होना चाहिए। विद्यालयों में बच्चों की सुरक्षा संबंधी नियमित प्रशिक्षण, परामर्श सेवाएं और शिकायत तंत्र विकसित किए जाएं। प्रत्येक विद्यालय में ऐसा वातावरण बने, जहां कोई बच्चा बिना भय अपनी बात कह सके।
तीसरा, परिवार की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण है। भारतीय परिवारों में बच्चों से संवाद का दायरा अक्सर पढ़ाई, अनुशासन और भविष्य तक सीमित रहता है। अब समय आ गया है कि माता-पिता बच्चों से उनके अनुभवों, भय, मित्रों, डिजिटल गतिविधियों और व्यक्तिगत सुरक्षा पर भी खुलकर बातचीत करें। विश्वास का संबंध किसी भी सुरक्षा व्यवस्था की पहली शर्त है। जिस बच्चे को यह भरोसा हो कि उसकी बात सुनी जाएगी और उस पर विश्वास किया जाएगा, वह संकट की स्थिति में चुप नहीं रहेगा।
चौथा, समाज को अपनी संवेदनशीलता पुनः अर्जित करनी होगी। हम ऐसे दौर में जी रहे हैं, जहां सार्वजनिक जीवन में उदासीनता बढ़ती जा रही है। लोग किसी संदिग्ध स्थिति को देखकर भी हस्तक्षेप करने से बचते हैं। यह प्रवृत्ति बदलनी होगी। एक सजग नागरिक केवल कानून का पालन करने वाला व्यक्ति नहीं होता, बल्कि वह अपने आसपास घट रही असामान्य घटनाओं के प्रति भी जिम्मेदार होता है। बच्चों की सुरक्षा सामुदायिक जिम्मेदारी है, केवल पुलिस की नहीं।
डिजिटल माध्यमों की बढ़ती पहुंच को देखते हुए सरकार, तकनीकी कंपनियों और नागरिक समाज को मिलकर ऑनलाइन बाल सुरक्षा के लिए भी व्यापक अभियान चलाना होगा। इंटरनेट आज बच्चों की शिक्षा का माध्यम भी है और खतरे का रास्ता भी। इसलिए डिजिटल साक्षरता को राष्ट्रीय शिक्षा नीति का अभिन्न हिस्सा बनाया जाना चाहिए।
मीडिया को भी आत्मसंयम का परिचय देना होगा। किसी भी नाबालिग पीड़ित की गरिमा सर्वोच्च होनी चाहिए। सनसनी, अपुष्ट दावे और भावनात्मक उत्तेजना से अधिक महत्वपूर्ण तथ्य, संवेदनशीलता और न्यायिक प्रक्रिया का सम्मान है। पत्रकारिता का धर्म समाज को जागरूक करना है, भय और उत्तेजना फैलाना नहीं।
श्रीगंगानगर की घटना का अंतिम निर्णय न्यायालय करेगा। दोषी कौन हैं, किसकी क्या भूमिका रही, यह कानून तय करेगा लेकिन इस घटना ने जो प्रश्न समाज के सामने रखे हैं, उनका उत्तर अदालत नहीं दे सकती। उनका उत्तर हमें देना होगा। हमें यह तय करना होगा कि क्या हम हर भयावह घटना के बाद कुछ दिनों तक आक्रोश व्यक्त कर फिर सामान्य हो जाने वाला समाज बने रहेंगे, या ऐसी परिस्थितियां पैदा करेंगे जिनमें बच्चों के विरुद्ध अपराध करना कठिन हो जाए।किसी राष्ट्र की सभ्यता का मूल्यांकन उसके सकल घरेलू उत्पाद, राजमार्गों, स्मार्ट शहरों या तकनीकी उपलब्धियों से नहीं किया जाता। उसका वास्तविक मूल्यांकन इस आधार पर होता है कि वह अपने सबसे कमजोर नागरिकों की कितनी रक्षा करता है। बच्चे किसी भी समाज की सबसे बड़ी पूंजी होते हैं। यदि उनका बचपन भय, हिंसा और असुरक्षा में बीते, तो विकास की हर उपलब्धि अपना नैतिक अर्थ खो देती है।
भारत आज विश्वगुरु बनने, विकसित राष्ट्र बनने और वैश्विक नेतृत्व की आकांक्षा रखता है। यह लक्ष्य तभी सार्थक होगा, जब देश का हर बच्चा और हर बच्ची भयमुक्त वातावरण में जी सके। सुरक्षित बचपन केवल सामाजिक आवश्यकता नहीं, बल्कि संवैधानिक दायित्व भी है। संविधान ने प्रत्येक बच्चे को गरिमा, समानता और जीवन का अधिकार दिया है। उन अधिकारों की रक्षा केवल न्यायालयों का नहीं, पूरे समाज का दायित्व है।
श्रीगंगानगर की घटना को यदि हम केवल एक समाचार बनाकर भूल गए तो यह हमारी सबसे बड़ी नैतिक पराजय होगी। लेकिन यदि यह घटना हमें अपने सामाजिक व्यवहार, संस्थागत व्यवस्थाओं और सार्वजनिक नीतियों की गंभीर समीक्षा के लिए प्रेरित करती है, तो शायद उन असंख्य बच्चों के भविष्य को अधिक सुरक्षित बनाया जा सकेगा, जिनकी आवाज आज भी हमारे शोर में दब जाती है।
प्रश्न केवल इतना नहीं है कि अपराधियों को कितनी कठोर सजा मिलेगी। उससे बड़ा प्रश्न यह है कि क्या हम ऐसा भारत बना पाएंगे, जहां किसी बच्ची का बचपन भय के साए में न बीते। इसी प्रश्न का उत्तर आने वाले समय में हमारे समाज की वास्तविक पहचान तय करेगा।
कुमार कृष्णन