राजनीति

भारत–जापान की नई रणनीतिक साझेदारी: 21वीं सदी का एशियाई समीकरण बदलने की तैयारी

सनोज राणा


दुनिया एक ऐसे दौर में प्रवेश कर चुकी है जहाँ युद्ध केवल सीमाओं पर नहीं बल्कि तकनीक, सेमीकंडक्टर, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, ऊर्जा और वैश्विक आपूर्ति शृंखलाओं पर भी लड़े जा रहे हैं। आज किसी देश की शक्ति केवल उसकी सेना से नहीं, बल्कि इस बात से भी तय होती है कि वह कितनी उन्नत तकनीक विकसित कर सकता है, महत्वपूर्ण खनिजों तक उसकी कितनी पहुँच है और वैश्विक उत्पादन शृंखलाओं में उसकी भूमिका कितनी निर्णायक है। ऐसे समय में नई दिल्ली में आयोजित 16वें भारत–जापान शिखर सम्मेलन (2026) को केवल एक द्विपक्षीय बैठक के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। यह एशिया की बदलती रणनीतिक राजनीति का एक महत्वपूर्ण पड़ाव है। रक्षा, आर्थिक सुरक्षा, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, सेमीकंडक्टर, स्वच्छ ऊर्जा और महत्वपूर्ण खनिजों में हुए समझौते बताते हैं कि भारत और जापान अब पारंपरिक मित्र नहीं, बल्कि भविष्य की भू-राजनीति के साझेदार बन रहे हैं। 

इस शिखर सम्मेलन की सबसे बड़ी उपलब्धि UNICORN (Unified Complex Radio Antenna) परियोजना है। पहली बार भारत और जापान किसी रक्षा प्रणाली का संयुक्त विकास करेंगे। भारतीय नौसेना के लिए विकसित होने वाली स्टील्थ रेडियो एंटीना प्रणाली केवल एक सैन्य उपकरण नहीं है, बल्कि यह इस बात का प्रतीक है कि जापान अब भारत के साथ संवेदनशील रक्षा प्रौद्योगिकी साझा करने को तैयार है। ध्यान रहे कि UNICORN एक विशिष्ट जापानी इंटीग्रेटेड स्टील्थ नेवल मस्त (Integrated Naval Mast) तकनीक है। कई अन्य देशों (जैसे अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस, इटली आदि) के पास भी अपने-अपने उन्नत इंटीग्रेटेड मस्त या स्टील्थ मस्त सिस्टम हैं, लेकिन वे UNICORN तकनीक नहीं हैं। UNICORN (Unified Complex Radio Antenna) तकनीक का सबसे बड़ा उद्देश्य युद्धपोतों को अधिक स्टील्थ (Stealth), अधिक सक्षम और कम दिखाई देने वाला बनाना है।लंबे समय तक जापान की रक्षा निर्यात नीति अत्यंत सीमित रही, लेकिन बदलते क्षेत्रीय सुरक्षा वातावरण ने टोक्यो की सोच को भी बदला है। भारत के लिए यह आत्मनिर्भर रक्षा उद्योग की दिशा में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि है।

आर्थिक दृष्टि से जापान द्वारा अगले दशक में 10 ट्रिलियन येन (लगभग 61 अरब अमेरिकी डॉलर) निवेश का लक्ष्य दोनों देशों के संबंधों को नई दिशा देता है। इससे भी अधिक महत्वपूर्ण यह है कि यह निवेश पारंपरिक निर्माण परियोजनाओं में नहीं, बल्कि सेमीकंडक्टर, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, महत्वपूर्ण खनिज, डिजिटल अवसंरचना और स्वच्छ ऊर्जा जैसे रणनीतिक क्षेत्रों में होगा। वर्तमान में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) की बात करें, तो अप्रैल 2000 से दिसंबर 2025 तक भारत में जापान का संचयी (cumulative) निवेश लगभग 38.45 अरब अमेरिकी डॉलर (US$ 38.45 billion) रहा है, जो भारतीय रुपये में लगभग ₹2.33 लाख करोड़ के बराबर है। जापान भारत में FDI का 5वाँ सबसे बड़ा स्रोत है। भारत-जापान शिखर सम्मेलन में जापान ने भारत में अगले दशक (2035 तक) 61 अरब अमेरिकी डॉलर (US$ 61 billion) से अधिक निवेश का लक्ष्य भी घोषित किया है। इसका अर्थ है कि भारत को केवल पूँजी नहीं मिलेगी बल्कि भविष्य की तकनीकों में साझेदारी का अवसर भी मिलेगा।

इन समझौतों का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष आर्थिक सुरक्षा (Economic Security) है। पहले राष्ट्र अपनी सुरक्षा को केवल सैन्य शक्ति से जोड़ते थे, लेकिन आज चिप, बैटरी, रेयर अर्थ मिनरल्स और डेटा भी राष्ट्रीय सुरक्षा का हिस्सा बन चुके हैं। कोविड-19 महामारी और हाल के वैश्विक संकटों ने दिखाया कि यदि आपूर्ति शृंखला कुछ देशों पर अत्यधिक निर्भर हो जाए तो पूरी अर्थव्यवस्था प्रभावित हो सकती है। भारत और जापान का नया रोडमैप इसी जोखिम को कम करने का प्रयास है।

सेमीकंडक्टर (जापान शीर्ष 5 देशों में विशेषकर सामग्री और उपकरणों में)सहयोग इसका सबसे अच्छा उदाहरण है। आज विश्व की अधिकांश उन्नत चिप निर्माण क्षमता कुछ सीमित क्षेत्रों में केंद्रित है। अमेरिका–चीन तकनीकी प्रतिस्पर्धा ने इस क्षेत्र को वैश्विक शक्ति संघर्ष का केंद्र बना दिया है। जापानी कंपनियों का गुजरात और अन्य राज्यों में निवेश केवल व्यावसायिक निर्णय नहीं है, बल्कि विश्वसनीय और विविधीकृत आपूर्ति शृंखला बनाने की रणनीति का हिस्सा है। यदि भारत इन परियोजनाओं को समय पर पूरा कर लेता है, तो वह केवल चिप आयात करने वाला देश नहीं रहेगा, बल्कि वैश्विक विनिर्माण नेटवर्क का महत्वपूर्ण केंद्र बन सकता है। 

इसी प्रकार कृत्रिम बुद्धिमत्ता, 5G, Open RAN, क्वांटम प्रौद्योगिकी और डेटा सेंटर में बढ़ता सहयोग यह संकेत देता है कि भारत और जापान भविष्य की डिजिटल अर्थव्यवस्था के नियम तय करने वाली साझेदारी विकसित करना चाहते हैं। जापान की हार्डवेयर विशेषज्ञता और भारत की सॉफ्टवेयर क्षमता यदि प्रभावी ढंग से जुड़ती है, तो यह एशिया में तकनीकी नवाचार का नया मॉडल बन सकता है।

स्वच्छ ऊर्जा सहयोग भी उतना ही महत्वपूर्ण है। ग्रीन अमोनिया, ग्रीन हाइड्रोजन, बायो-एथेनॉल और नवीकरणीय ऊर्जा परियोजनाएँ केवल जलवायु परिवर्तन से जुड़ी पहल नहीं हैं। इनका संबंध ऊर्जा आयात पर निर्भरता कम करने, नए उद्योग विकसित करने और हरित रोजगार सृजन से भी है। आने वाले वर्षों में ऊर्जा परिवर्तन वैश्विक अर्थव्यवस्था का प्रमुख आधार बनने वाला है और भारत–जापान साझेदारी इस परिवर्तन का लाभ उठाने की कोशिश कर रही है।

इन सभी समझौतों के पीछे एक बड़ा भू-राजनीतिक संदर्भ भी है। भारत और जापान दोनों हिंद-प्रशांत क्षेत्र में स्वतंत्र, खुली और नियम-आधारित व्यवस्था के समर्थक हैं। दोनों देश किसी सैन्य टकराव की राजनीति नहीं, बल्कि ऐसी व्यवस्था चाहते हैं जहाँ समुद्री व्यापार सुरक्षित रहे, आपूर्ति शृंखलाएँ बाधित न हों और आर्थिक दबाव को राजनीतिक हथियार के रूप में इस्तेमाल न किया जा सके। यही कारण है कि इस शिखर सम्मेलन में रक्षा और आर्थिक सुरक्षा को समान महत्व दिया गया।

फिर भी भारत के सामने चुनौती कम नहीं है। विदेशी निवेश की घोषणाएँ तभी सफल होंगी जब परियोजनाएँ समय पर पूरी हों, नियामकीय प्रक्रियाएँ सरल हों, कुशल मानव संसाधन उपलब्ध हो और अनुसंधान एवं विकास पर पर्याप्त निवेश किया जाए। मुंबई–अहमदाबाद हाई-स्पीड रेल परियोजना के अनुभव से यह स्पष्ट है कि केवल बड़े वादे पर्याप्त नहीं होते; उनका प्रभावी क्रियान्वयन ही वास्तविक सफलता तय करता है।

आज भारत और जापान के बीच व्यापार लगभग 27.5 अरब डॉलर है, जबकि भारत में लगभग 1,400 जापानी कंपनियाँ कार्यरत हैं। दोनों देशों की आर्थिक क्षमता को देखते हुए यह स्तर अभी भी अपेक्षाकृत कम है। यदि वर्तमान समझौते सफलतापूर्वक लागू होते हैं, तो आने वाले दशक में यह साझेदारी केवल द्विपक्षीय संबंधों तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि हिंद-प्रशांत की आर्थिक और रणनीतिक संरचना को भी प्रभावित करेगी।

21वीं सदी में वैश्विक नेतृत्व केवल सैन्य शक्ति से तय नहीं होगा। तकनीकी क्षमता, आर्थिक सुरक्षा, विश्वसनीय साझेदारियाँ और नवाचार ही नई शक्ति के वास्तविक मानक होंगे। भारत और जापान ने इस दिशा में एक महत्वाकांक्षी कदम उठाया है। अब यह दोनों सरकारों पर निर्भर करेगा कि वे इन घोषणाओं को कितनी तेजी और प्रभावशीलता से ज़मीन पर उतार पाती हैं। यदि ऐसा हुआ, तो आने वाला दशक केवल भारत–जापान संबंधों का नहीं, बल्कि एशिया के नए रणनीतिक संतुलन का दशक भी हो सकता है।

सनोज राणा