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    कृषि क्षेत्र में भी लैंगिक असमानता, कैसे आगे बढ़ें आधी आबादी?…

    सोनम 

    भारतीय मीडिया या यूं कहें टीवी पत्रकारिता के दौर में जनसरोकार के विषय नदारद ही दिखते हैं। लेकिन बीते दिनों एक ऐसा मामला निकलकर सुर्खियों में आया। जो अपना एक व्यापक सरोकार रखता है। जी हां कहने को तो भारतीय संविधान में समानता और स्वतंत्रता की लंबी- चौड़ी बातें लिखी हुईं हैं। फिर भी आज़ादी के एक लंबे काल खंड के बाद ये सभी बातें कई स्तरों पर सिर्फ़ किताबी ही मालूम पड़ती है। संविधान का अनुच्छेद- 15 लिंग, जाति, धर्म आदि आधारों पर भेदभाव के उन्मूलन की बात करता है, लेकिन जब वास्तविकता के तराजू पर इन बातों को तौलते हैं फिर सभी बातें भौथरी ही मालूम पड़ती है। गौरतलब हो कि भारतीय समाज में कई स्तर पर महिलाएं समानता के अधिकार से वंचित हैं और इसे स्वीकार करने में नीति-निर्माताओं से लेकर पितृसत्तात्मक समाज को संकोच नहीं करना चाहिए। वहीं ये बात भी सर्वविदित है कि गुजरात कई मायनों में देश के अन्य राज्यों से भिन्न है और इसे टीवी की पत्रकारिता ने जमकर प्रचारित और प्रसारित भी किया है। लेकिन जिक्र उसी गुजरात का करें तो वहां की दो महिलाओं की खबरें बीते दिनों सुर्खियां बनी जो अपने अधिकारों के लिए न्यायिक लड़ाई लड़ रही हैं। बता दें कि यह कहानी है अहमदाबाद शहर से लगभग 52 किलोमीटर दूर की। जहां एक गांव में दो महिलाएं रहती हैं। वैसे ये महिलाएं पारंपरिक रूप से अनपढ़ हैं, लेकिन धोखे से खोई हुई जमीन का मालिकाना हक वापस पाने के लिए जी-तोड़ मेहनत कर रही हैं। अब आप कहें कि दो महिलाओं के अधिकार से वंचित होने से क्या होता? तो जानकारी के लिए बता दें कि ये सिर्फ़ उदाहरण मात्र हैं, बल्कि देश के विभिन्न हिस्सों में महिलाओं की लगभग एक सी स्थिति है।

    ग्रामीण परिवेश में रहने वाले व्यक्ति भलीभांति परिचित होंगे कि कैसे भोर होते ही महिलाएं भी पुरुषों की भांति खेतों में काम करने के लिए निकल पड़ती हैं। लेकिन क्या उन्हें भूमि स्वामी या कृषक का दर्जा आजतक मिल पाया है? नहीं न! फ़िर यह दुर्भाग्यपूर्ण नहीं तो क्या है। ऐसी स्थिति में सिर्फ़ इतना ही कहते बनता है कि आख़िर इन मामलों में कहां गया संविधान और कहाँ गई उसमें लिखी बातें? आज के समय में असमानता की खाई यत्र- तत्र सर्वत्र विद्यमान है। जी हां वर्तमान दौर में ऐसा कोई क्षेत्र नहीं नजर आता जहां असमानता की बेल न फैली हो। कहने को तो हम वैसे कृषि प्रधान देश की श्रेणी में आते हैं। लेकिन जब बात हमारे देश की आधी आबादी के प्रतिनिधित्व करने वाली महिलाओं की आती है। फ़िर उन्हें कृषि के क्षेत्र में भी कोई खास पहचान नहीं मिल पाती है। आज भी हमारे देश में कृषि के क्षेत्र में पुरुषों का ही वर्चस्व है। ये सच है कि कृषि के कार्यक्षेत्र में महिलाओं का श्रमदान बढ़ा है। लेकिन कृषि के क्षेत्र में महिलाओं की भूमिका नगण्य ही मानी जाती है और उनके पास मालिकाना हो। ये बात तो जैसे पितृसत्ता से जुड़े लोग पचा ही नहीं सकते। बात आर्थिक सर्वेक्षण 2017-2018 की करें। फिर इसके आंकड़े काफ़ी चौंकाने वाले हैं। इसके मुताबिक कृषि क्षेत्र में महिलाओं की भागीदारी बढ़ रही है तो वही बात जब मालिकाना हक की आती है। फ़िर स्थिति चिंताजनक हो जाती है। वैसे कितनी अजीब विडंबना है कि एक तरफ हमारे देश में महिलाओं को मां लक्ष्मी के रूप में पूजे जाने की प्रथा है। लेकिन जब बात घर की लक्ष्मी का दर्जा देने की आती है तो पितृसत्तात्मक सोच हावी हो जाती है। वर्तमान दौर में भले महिलाओं के साथ समानता का ढिंढोरा पीटा जा रहा है लेकिन जब बात अधिकारों की अपने हक की आती है तो सब मौन धारण कर लेते है। चौकाने वाली बात तो यह है कि महिला सशक्तिकरण पर होने वाले खर्च में सरकार ने छह गुना तक कि कमी कर दी है। अब इस पर सरकार की क्या मंशा है यह समझ से परे है? लेकिन बात वही है कि ऐसे में महिलाओं की दशा समाज में कैसे बेहतर हो पाएगी? वहीं कृषि में महिलाओं की भूमिका का विषय कोई नया नहीं है। कृषि में महिलाओं की भागीदारी को ध्यान में रखते हुए केंद्र सरकार ने 1996 में भुवनेश्वर में केंद्रीय कृषिरत महिला संस्थान की स्थापना कर दी थी। कृषि मंत्रालय हर साल 15 अक्टूबर को महिला किसान दिवस के रूप में मनाता है। लेकिन मजाल है कि कभी किसी रैली में देश का कोई नेता या किसानों का नेता ही किसान ‘भाईयों’ के साथ ‘बहनों’ का ज़िक्र कर दें? अजब स्थिति है देश के भीतर की। महिलाएं पुरुषों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर चलती तो है। लेकिन जब बात किसानों की होती है तो पुरुषों की ही छवि दिमाग में आती है। यहां तक कि हमारे नेता तक जब किसान सम्मेलन को संबोधित करते है तो जिक्र किसान भाईयों का ही करते है। रेडियो, टेलीविजन पर भी किसान से सम्बंधित ही कोई कार्यक्रम दिखाया जाता है तो उसमें पुरुषों के ही विज्ञापनों का प्रकाशन होता है। हमारे देश में किसानों के नाम पर लम्बा आंदोलन चलाया जाता है। लेकिन महिला किसानों का ना ही राजनीति में प्रतिनिधित्व नज़र आता है और न ही कृषि अर्थव्यवस्था में।

    नेशनल सेम्पल सर्वे ऑफिस (एन एस एस ओ) के आंकड़ों पर ही गौर करें तो 23 राज्यों में कृषि, वानिकी और मछली पालन में महिलाओं का 50 फ़ीसदी है। वहीं छत्तीसगढ़ , बिहार और मध्यप्रदेश में 70 फीसदी से अधिक महिलाएं कृषि क्षेत्र में है। महिला किसान सशक्तिकरण परियोजना 2020-2021 में 23 राज्यों में कोई बजट नहीं दिया गया। ऐसे में महिला किसानों की तरक्की की कल्पना करना भी बेमानी ही है। वहीं बात पुनः अहमदाबाद की करें तो यहां से क़रीब 52 किलोमीटर दूर ग्रामीण क्षेत्र में दो महिलाएं अपनी खोई हुई भूमि का मालिकाना हक पाने के लिए संघर्ष कर रही है। बावला जिले के सकोदा गांव की गीताबेन का कहना है कि उनके लिए ज़मीन ही सब कुछ है। उसे पाने के लिए वो अपनी आख़िरी सांस तक लडेगी। गौरतलब हो कि गीताबेन को ज़मीन अपने पति की मौत के बाद मिली थी। जिसके बाद 2005 में गीताबेन ने अपनी ज़मीन तीन लाख रुपये में बेच दी। लेकिन उन्हें अपनी ज़मीन की पूरी क़ीमत नहीं मिली। जिसे लेकर वह तालुका पंचायत गईं। जहां भले उन्हें न्याय मिल गया हो। वही जिस दलाल ने कम्पनी के नाम पर उनकी जमीन खरीदी थी उसने इस मामले को लेकर जिला न्यायालय में शिकायत कर दी।

    इसके अलावा बात गुजरात की ही करें तो वहां गैर कृषक द्वारा कृषि भूमि नहीं खरीदने का प्रावधन है। गीताबेन की तरह ही मीना पटेल भी विधवा तीन बच्चों की मां है। अपने पति की मृत्यु के बाद मीना पटेल को घर से बेदख़ल कर दिया गया। मीना ने अपनी ही ज़मीन को अपने पति के भाई से कीमत देकर खरीदा। मीनाबेन के ससुराल वालों ने उसके हक की ज़मीन को भी गिरवी रख दिया। ऐसे में यह किसी एक महिला की कहानी नहीं है, अपितु ऐसी हजारों महिलाएं है जो अपने हक़ की लड़ाई पूरे देश मे लड़ रही हैं और वह कोर्ट कचहरी के चक्कर काटने को मजबूर है। वहीं दूसरी तरफ हमारे देश मे कृषि का मालिकाना हक पुरुषों के पास है।अब बात जनगणना के आंकड़ों के अनुसार करें तो कृषि क्षेत्र में काम करने वालों में महिलाओं की भागीदारी भले एक तिहाई है लेकिन उनके नाम पर मात्र 13 फ़ीसदी ही जमीन है। ध्यान रहें कि देश में 80 प्रतिशत से ज्यादा आबादी हिंदुओं की है। 2005 में हिंदू उत्तराधिकारी अधिनियम में संशोधन किया गया। महिलाओं को पुरुषों के बराबर अधिकार दिए गए और इस बार अधिकार जमीन-जायदाद में भी दिए गए। लेकिन तमाम कानूनों के बावजूद सामाजिक प्रथाओं और परंपराओं की वजह से आज भी भारत में महिलाओं को वो अधिकार नहीं मिल पा रहे हैं। जो उन्हें मिलना चाहिए। ऐसे में समय की जरूरत यह है कि महिलाओं को न सिर्फ़ कृषि क्षेत्र में काम करने पर उन्हें कृषक होने का दर्जा प्राप्त होना चाहिए, बल्कि उन्हें सभी सुविधाएं भी मिलनी चाहिए। तभी स्थितियों में कुछ बदलाव आ सकता है। वरना स्थिति बदत्तर तो है ही महिलाओं की और संवैधानिक बातें सिर्फ़ किताबी हो चली हैं।

    सोनम लववंशी
    सोनम लववंशी
    स्वतंत्र लेखिका

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