गज़ल ; देवी देवता सखा सहोदर – प्रभुदयाल श्रीवास्तव

देवी देवता सखा सहोदर सबके सब बेकार हो गये

ज्योंही मां उतरी आंखों में सपने सब साकार हो गये||

 

जैसे गये रसोई में तो मां की सूरत याद आई

लोटा थाली डोंगे मग्गे सब मां के आकार हो गये||

 

जब जब भी तड़्फा हूं मां की किसी तरह‌ सूरत देखूं

सारी रात दिखाऊं मां को सपने तक तैयार हो गये||

 

जब से पता लगा इस घर को मां अब यहां नहीं रहती

सोफा तकिये चादर गद्दे सब के सब बीमार हो गये||

 

एक नहीं मैं ज्यादा लूंगा यह तो बच्चे कि जिद थी

मां आई तो सभी खिलोने व्यर्थ और बेकार हो गये|

 

 

 

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