लेखक परिचय

लक्ष्मी नारायण लहरे कोसीर पत्रकार

लक्ष्मी नारायण लहरे कोसीर पत्रकार

स्वतंत्र वेब लेखक व ब्लॉगर

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murderसदियों से महिलाओं की स्थिति निम्न रही है यातनाएं भरी जीवन आज भी जी रही है। नारी की महत्वकांक्षा कहें या महत्ता पुरूष के साथ कदम से कदम मिलाकर चल रही हैं फिर भी अपेक्षाओं के अनुरूप नारी जाति का सम्मान समाज में नही मिल पा रही है आज आजादी के बाद भी उपेक्षित का शिकार है और यातनाएं भरी जीवन जी रही हैं । परिवार में मां ,बहन , बेटी ,पत्नी ,सहपाठी की भूमिका अग्रणीय होने के बाद भी परिवार में ही यातनाएं सह रही है ।आखिर कब आजादी मिलेगी । गीता ने अपनी मां को मुखाग्नि ही तो दी थी। क्या गीता अपनी मां को मुखाग्नि नही दे सकती ? एक बेटा जब बुजुर्ग माता -पिता को बाहर का रास्ता दिखा देते हैं तो बुजुर्ग माता -पिता के पास एक ही विकल्प होता है और वह अपनी बेटी के घर को इस लायक समझते हैं पर कुंठित मानसिकता उस समय नजर आती है जब बुजुर्ग माता -पिता गुजर जाते हैं तब बेटा उस समय पार्थिव शरीर पर हक जताकर अपनापन का लोगो को अहसास दिलाने की जहमत उठाते नजर आता है ।गीता जब अपने मां को कांधे दकरें ले जाती है तब भाई शर्मशार महशूश करता है और वहीं सोंच से अपनी बहन गीता को बेसुध होकर भाई हत्या कर देता है । क्या कुंठित मानसिकता से समाज ग्रसीत नही है ? इस तरह की मानसिकता के कारण आज नारी के सम्मान पर प्रश्न चिन्ह लग जाता है । छत्तीसगढ तिल्दा- नेवरा के मोहदा गांव की घटना भाई- बहन के अटूट प्रेम के बंधन को शर्मशार करती है बहन की अच्छाई को भाई को सम्मान करना चाहिए पर भाई बहन की हत्या कर देता है आखिर समाज किस ओर जा रही है कई दिनो के गहन मंथन के बाद मेरे दिमाक में कई प्रश्न उठे और गीता की हत्या को लेकर मेरे मन को चोंट लगा आखिर कुंठित मानसिकता से ग्रसीत समाज को कब समझ आयेगा । नारी की सम्मान की बात होती है और वही नारी की एक ओर अपने ही परिवार में हत्या की ताने बाने रचकर हत्या कर दी जाती है ।

समाज में आज नारी जाति का सम्मान होना चाहिए उस नारी जाति का अपमान ,निरादर ,हत्याएं ,यातनाएं घर से लेकर गली -मुहल्ले ,चैक -चैराहे कार्यालयों तक सरेआम हो रही है ।जिस तथाकथित सभ्य समाज की हम बात करते है वही समाज आज नारी की सम्मान को दरकिनार कर शोषक बन गया है आजादी के इन बीते वर्षो में समाज के तथाकथित समाज के ठेकेदार ,सामाजिक संगठन सरकार की महत्वकांक्षी योजनाएं व कानून धरी की धरी रह जाती है जब नारी प्रताडीत होती है नारी की सम्मान परिवार से शुरू होनी चाहिए पर ऐसा नही हो पा रहा है और समाज आंख बंद कर अपनी एक अलग राग अलाप रहा है ।

जिस भारतीय संस्कृति से सीख लेना चाहिए उस भारतीय संस्कृति को भी दरकिनार कर दिया जा रहा है । अंधेपन की भी एक हद होती है। धर्म सम्प्रदाय के अनुसार हर कोई किसी न किसी रूप में अपने ईष्ट देव मानता है और पूजा अर्चना करता है । भारतीय संस्कृति में भगवान को मानने वाला हर ब्यक्ति नारियल फूल अगरबत्ती देवी -देवता को अर्पित कर अपने को धन्य मानता है वही घर में देवी स्वरूप नारी पर अपमान के कसिदें कसतें है और यातनाएं देते है। हमारी संस्कृति में यदि देवताओं के नाम भी लिए जातें है तो पहले शक्तिस्वरूपा उनकी पत्नियों के नाम लिए जाते है जैसे राधेकृष्ण ,सीताराम सामाजिक तौर पर देखें तो घर की मालकिन महिलाएं ही हुआ करती हैं फिर भी समाज में नारी जाति यातनाओं का दंश से जकडी हैं आखिर नारी जाति कब तक उपेक्षा का शिकार होती रहेंगीं कब खिलखिलाकर हंस पायेगी आज भी नारी बंद कमरे में सिसक रही कब होगा सुधार ।आखिर कब तक नारी को लोक लाज भय दिखाकर यातनाओं की शिकार बनाता रहेगा ये तथाकथित समाज ।

छत्तीसगढ के तिल्दा -नेवरा से लगभग 12 किलो मीटर दूर मोहदा गांव में गीता की हत्या उस वक्त होती है जब गीता की मां की चिता की आग बुझकर ठंडी भी नही हुई थी ।गीता की हत्या को पचा पाना मुमकिन नही है गीता की हत्या नारी जाति की हत्या है हर उस प्रतिभावान नारी की हत्या है जो समाज को कुछ देना चाहती है पर सम्मानित होने के बजाए उसकी हत्या कर दी जाती है । गीता की हत्या से कुंठित मानसिकता से ग्रसीत हर उस ब्यक्ति को सबक लेना चाहिए और नारी के सम्मान में एक कदम बढ कर स्वागत करना चाहिए । गीता कुंठित मानसिकता की बली चढ गई ऐसा नही होना चाहिए था पर इस घटना से कुंठित मानसिकता लेकर अपने आप को समाज का हितैसी कहने की जेहमत उठाने वालों को सबक लेने की आवश्कता है । मोहदा गांव में उस वक्त लोग अचंभित हो गए जब कुछ लोगो के आंखो के सामने जब भाई ने बहन को कुल्हाडी से मार मार कर हत्या कर दी । श्रीमति सुरूज बाई वर्मा का हंसता खेलता परिवार था तीन बेटियां और एक बेटा । बेटा के लापरवाही और बेरूखी पन के कारण कुछ वर्ष पहले सुरूज बाई वर्मा अपनी बेटी गीता के परिवार के साथ रह रही थी ।

गीता वर्तमान में गांव की मुखिया थी । सुरूज बाई वर्मा का तबीयत कुछ दिनो से ठीक नही चल रहा था और मंगलवार 31 मार्च 2015 को गीता के घर में निधन हो गया सुरूज बाई वर्मा 85 वर्ष की थी । गीता अपने मां की धर्म के रिति रिवाज से कांधे देकर सहजता से स्वयं मुखाग्नि देकर मां की अंतिम इच्छा और अंतिम संस्कार करती है इस खबर की समाचार पत्रों गीता की सराहना होती की बेटे ने मां को घर से निकाला तो बेटी ने की मां की अंतिम इच्छा पुरी की दाह संस्कार की । गीता का भाई तेजराम वर्मा अपने मां को बहुत पहले घर से निकाल दिया था इस कारण मां की अंतिम इच्छा के अनुरूप गीता ने अपना कर्तब्य का पालन करते हुए अपनी फर्ज निभाई । 02 मार्च को गीता का भाई तेजराम वर्मा और तेजराम का पुत्र गीता के घर आ दमका और गीता की कुल्हाडी मार कर हत्या कर दिया गीता की हत्या के बाद बात सामने आयी तेजराम को संपत्ती की लालच और लोक लाज की चिंता थी घटना के बाद पुलिस ने तेजराम और उसके पुत्र को गिरफतार कर जेल भेज दिया है । इस तरह गीता की हत्या हो जाती है जो समाज के लिए निंदनीय घटना है जब मां जीवीत थी तब मां को घर से बाहर का रास्ता दिखाने वाला उनकी निधन पर अपना पन जताना चाहा समाज में लोक लाज की चिंता की सोच रखने वाला आखिर गीता की हत्या करके क्या जताना चाह रहा था।

गीता की हत्या गांव के लिए एक घटना हो सकता है पर गीता की हतया नारी जाति की हत्या है जिसे भरपाई कर पाना मुश्किल है। अक तक की यह पहली घटना है कि किसी नारी को अपने ही मां की मुखाग्नि देने पर भाई के द्वारा हत्या कर दिया गया । कुंठित मानसिकता रखने वाले हर उस ब्यक्ति को इस घटना से सबक लेना चाहिए नारी के अच्छे कार्यो का सम्मान करना चाहिए और नारी का सम्मान न की हत्या । पिछले एक दशक से नारी जाति शमशान घाट पहुंच कर अपने माता पिता को मुखाग्नि दे रहे है और लोग बाक सहजता से स्वीकार भी रहे है पर गीता के साथ ऐसा नही हुआ और हत्या हो गई हमें और समाज को विचार करना होगा भविष्य में फिर कोई गीता कुंठित मानसिकता का शिकार न हो । स्वगीय गीता जी को भावभिनी श्रद्धांजलि अर्पित करता हूं जो समाज में एक नई चेतना के लिए लोगो के बीच जानी जायेगी । गीता जी का नाम सम्मान से नारी जाति में नाम लिया जायेगा जो अपनी मां की अंतिम इच्छा को पुरा करने के साथ साथ एक बडी जिम्मेदारी का निर्वहन करते समाज में नई चेतना जगा गई ।

-लक्ष्मी नारायण लहरे

One Response to “गीता की हत्या ! क्या कुंठित मानसिकता से ग्रस्त समाज लेगा सबक”

  1. sureshchandra .karmarkar

    गीताजी को भावभीनी श्र्धांजलिअर्पित. ऐसी एक नहीं कई गीताजी जीवित हैं जो अपने माता पिता के दुःख ,दर्दों और उनकी जरूरतों में हाथ बांटती है और फिर भी भाइयों और भाभियों के उलाहने सुनती है. सेवा ,मदद ,करने के बाद भी भाई और भाभियाँ उस पर लोभी होने और माता पिता की संपत्ति पर नज़र है ,इसलिए ”सेवा ” है का आरोप लगाते हैं. हम द्विभाषी और द्विसोच के लोग हैं. एक वर्ष में दो नवरात्रियाँ ,दोनों स्त्री शक्ति कि. दोनों अवसरों पर मेले. दोनों अवसरों पर ”कन्या भोज” ।नौ दिन तक हर गाओं शहर में कितने ही लोग व्रत,उपासना,दान दक्षिणा को बड़ी श्रद्धा से सम्प्पन करेंगे. जितने बड़े महापुरुष हुए, श्री राम ,श्री कृष्णमहादेव ,सबकी सफलता के पीछे स्त्री. फिर भी हमारे देश में महिलाओं के साथ यह व्यवहार. ये तथाकथित ”भागवताचार्य” कथाकार ”,प्रवचनकार करते क्या हैं?”गौओ का वध करने वालों को ”फांसी” की मांग , मांस का निर्यात करने वाले को ”फांसी” की मांग ,किन्तु महिलाओं के साथ दुर्व्यवहार केबारे में इनके विचार मुखर नही. महिला प्रतारणा के बीज हमारी सोच में हैं।

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