लेखक परिचय

मीनाक्षी मीणा

मीनाक्षी मीणा

सहायक प्रोफेसर क्षेत्रीय शिक्षा संस्थान (एन सी ई आर टी), अजमेर

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मीनाक्षी मीणा

आज का युग संचार व प्रौद्योगिकी का युग है, जहां पर एल.पी.जी. (उदारीकरण, निजीकरण, ग्लोबलाइजेशन) की हवा बह रही है। एल.पी.जी. की इसी हवा में ग्लोबलाइजेशन अपनी पूरी सक्रियता के साथ पूरे विश्व में विस्तारित होता जा रहा है और इसी ग्लोबलाइजेशन के कारण आज पूरा विश्व एक छोटी सी दुनिया में सिमट गया है। ग्लोबलाइजेशन के कारण हम एक दूसरे के नजदीक आ गए हैं और राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक, व्यापारिक, शैक्षिक, सांस्कृतिक आदि सभी क्षेत्रों में हम एक दुसरे से परिचित हुए हैं। इसी परिचय की वजह से आर्थिक क्रियाओं में परस्पर निर्भरता बढ़ी, अन्तर्राष्ट्रीय सहयोग तथा विदेशी व्यापार को प्रोत्साहन मिला।

ग्लोबलाइजेशन का अर्थ

वैश्वीकरण वह प्रक्रिया है ” जिसके द्वारा विश्व की विभिन्न अर्थव्यवस्थाओं का समन्यव किया जाता है, जिससे वस्तुओं और सेवाओं, प्रौद्योगिकी, पूंजी तथा श्रम का इनके मध्य प्रवाह हो सके। अर्थात् राष्ट्रीय घरेलू अर्थव्यवस्थाओं का विश्व अर्थव्यवस्था के साथ जुड़ना।

ग्लोबलाइजेशन के मुख्य तत्व :-

– व्यापार प्रतिबंधों को कम करना ताकि वस्तुओं और सेवाओं का आवक जाक निर्वाध गति से हो सकें।

– एक ऐसे वातावरण का निर्माण किया जाये, जिससे विभिन्न देशों के बीच पूंजी का स्वतंत्र रूप से प्रवाह हो सके।

– ऐसे वातावरण विकसित करना, जिससे प्रौद्योगिकी का स्वतंत्र रूप से प्रवाह हो सके।

– ऐसी व्यवसथा विकसित करना, जिससे विश्व के विभिन्न देशों के मध्य श्रम का निर्बाध आवागमन हो सके।

ग्लोबलाइजेशन का भारत पर सकारात्मक प्रभाव

– ग्लोबलाइजेशन के द्वारा भारत जैसे विकासशील देश में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश संभव होने से उनके पूंजी की समस्या का समाधान संभव होता जा रहा है तथा ऋणग्रस्तता भी नहीं बढ़ रही है।

– प्रत्यक्ष विदेशी निवेश के साथ तकनीकी का हस्तांतरण भी होता है, जिससे भारत में उत्पादन क्षमता एवं संवृध्दि दर पर अनुकूल प्रभाव पड रहा है।

– ग्लोबलाइजेशन के कारण भारत जैसे विकासशील देश के उत्पादों हेतु बाजार की उपलब्धता बढ़ने के साथ अच्छी गुणवता वाली उपभोग की वस्तुएं इन्हें कम कीमत पर उपलब्ध हो रही हैं।

– ग्लोबलाइजेशन प्रतिस्पर्धा को बढ़ाता है, जिससे घरेलू उद्योगों की कार्यकुशलता भी बढ़ती है।

– ग्लोबलाइजेशन से उत्पादन लागत में कमी होती है जिससे वस्तुओं एवं सेवाओं की कीमत में कमी होती है। अत: इस प्रक्रिया से सबसे अधिक लाभ उपभोक्ता वर्ग को हो रहा है।

– ग्लोबलाइजेशन की प्रक्रिया में प्रतिबंधों की समाप्ति सुनिश्चित होती है, जिससे एकाधिकारात्मक प्रवृत्ति हतोत्साहित हो रही है।

– ग्लोबलाइजेशन के द्वारा अर्थव्यवस्था खुलने से विभिन्न देशों के निवासियों के मध्य आपसी समन्वय बढ़ा है, इससे सामाजिक विकास के प्राचालों, शिक्षा, स्वास्थ्य जैसी सुविधाओं का भी विस्तार हो रहा है।

– ग्लोबलाइजेशन की प्रक्रिया के फलस्वरूप भारत जैसे विकासशील देश में गरीबी में गिरावट आई है। एशियन विकास बैंक की रिपोर्ट के अनुसार भारत में गरीबी 1977-78 में 51 प्रतिशत से घटकर वर्ष 1999-2000 में 26 प्रतिशत हो गई है और इसमें अभी भी गिरावट जारी है।

– ग्लोबलाइजेशन के कारण आज शिक्षा के क्षेत्र में भी एक क्रांति आई है, जिसके कारण नई नई शैक्षिक तकनीकियों का शिक्षा में समावेश किया जा रहा है। जहां पहले शिक्षा केवल व्याख्यान विधि के द्वारा निश्चित पाठयक्रम के आधार पर दी जाती थी, आज वहीं पर यह शिक्षा प्रोजेक्टर, विडियो कॉन्फ्रंसिंग के आधार पर प्रश्नोत्तर विधि, प्रदर्शन विधि आदि के आधार पर दी जाने लगी है, जिससे आज शिक्षा के क्षेत्र में बिना बोझे के शिक्षा, निर्मितवाद, अभिसंज्ञानवाद आदि नये सम्प्रत्यय उभर रहे हैं।

– ग्लोबलाइजेशन के कारण द्रु्रततर संप्रेषण यात्रा तथा सूचना प्रौद्योगिकी ने संसार को एक वैश्विक ग्राम का रूप दे दिया। संसार में घटित हो रही घटनाओं, बढ़रहे ज्ञान क्षेत्रों की जानकारी, हम अपने कमरे में बैठकर प्राप्त कर रहे हैं।

– ग्लोबलाइजेशन के कारण विभिन्न देशों के लोगों के बीच विचार विनियम, समानता एवं परंपराओं के विनिमय को गति मिल रही, जिससे हमारी सोच एवं व्यवहार व्यापक हुआ है।

– ग्लोबलाइजेशन ने अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार के लिए राष्ट्रीय सीमाओं को खोला दिया है, वैश्विक प्रतिस्पर्धा को बढ़ाया है। इससे मानव विकास की अपार संभावनाएं उभरकर आई हैं, नये अवसर प्रदान किये जा रहे हैं।

– ग्लोबलाइजेशन के कारण अच्छी वस्तुएं बाजार में आने से एक क्षेत्र की वस्तुओं में विविधता आ रही है । जिनके पास इनको खरीदने की क्षमता है, उनको ज्यादा आराम मिल रहा है।

ग्लोबलाइजेशन का भारत पर नकारात्मक प्रभाव –

उपर्युक्त तर्क वैश्वीकरण के समर्थन में प्रस्तुत किये गये हैं परंतु इसके विपक्ष में भी तर्क प्रस्तुत किये गये हैं। इसके संदर्भ में सर्वाधिक आलोचना वर्ष 2001 में अर्थशास्त्र के नोबेल पुरस्कार विजेता ”जोसेफ स्टिग्लिट्ज ने अपनी पुस्तक ”वैश्वीकरण एवं इनकी निराशाएं” में प्रस्तुत की।

– आर्थिक उदारीकरण के नाम पर आज सक्षम देशों द्वारा भारत जैसे देश को बाजार में तबदील किया जा रहा है, जिसकी वजह से हमारे देश में कुटीर व लघु उद्योग समाप्त होते जा रहे हैं स्वावलंबन घट रहा है, बेरोजगारी बढ़ रही है, हमारी स्वदेशी कंपनियां विदेशी कंपनियों के पैसे व ताकत के आगे आत्मसमर्पण कर रही है। आज देश में बड़े कारखानों की बढ़ती संख्या ने स्वरोजगारियों को मजदूर बना दिया है और हमारे गांवों की आबादी रोजगार के लिए शहरों की ओर पलायन कर रही है।

– कृषि क्षेत्र में भी हम देख रहे हैं कि हमारी उपजाऊ भूमि उद्योगों के लिए बिक रही है, हमारे किसान भूमिहीन मजदूर में तब्दील होते जा रहे हैं, कृषि उत्पाद महंगे होते जा रहे हैं, दालें महंगी हो रही हैं। हमें बाहर से इनका आयात करना पड़ रहा है, सिर्फ इतना ही नहीं महंगे बीजों व कृषि नियंत्रकों ने हमारी कृषि को घाटे का सौदा बना दिया है। अधिक पैदावार की लालसा ने व अधिक कीटनाशकों व उर्वरकों के प्रयोग से हमारी कृषि भूमि बंजर बनती जा रही है। विश्व व्यापार संगठन के दबाव में हमारी कृषि नीतियों को बदला जा रहा है।

– विकसित देश उदारीकरण की आड़ में न केवल अपनी बातं हम पर थोप रहे हैं, अपितु वे अपनी रिसर्च के लिए भी यहां के नागरिकों व परिस्थितियों को चुन रहे हैं, साथ ही उन्होंने देश को अनेक प्रकार की अखाद्य व गैर जरूरी वस्तुओं का कूड़ाघर बना दिया दहैछ, वातावरण पर निगरानी रखने वाली संस्था ई पी ए (इनवायरमेंटल प्रोटेक्शन एजेन्सी) की जानकारी के बावजूद अमरीका अपने इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों के जहरीले कचरे को भारत, पाकिस्तान, सिंगापुर जैसे देशों में भेजकर निपटा रहा है। इस ई-कचरे में कैडमियम, पारा व अन्य जहरीले तत्व शामिल है। लेड से बने हुए मानिटर और कैथोडद्य ने टयूबयुक्त ठी वी सेटों को भारत जैसे देशों में भेजकर निपटाया जारहा है, इस ई-कचरे के कारण विकासशील देशों के नागरिकों के स्वास्थ्य को नुकसान होने की संभावना बढ़ती जा रही है। इसका मतलब यह है कि जिन दवाइयों के प्रयोग के लिए वहां की सरकार उन्हें अनुमति नहीं देती, उनका प्रयोग वे यहां के नागरिकों पर करते हैं।

– ग्लोबलाइजेशनके कारण हमारा पर्यावरण लगातार विषैला होता जा रहा है। विकास के नाम पर प्रकृति का अंधाधुंध शोषण व दोहनप किया जा रहा है. बड़े बड़े मॉल एवं उद्योग धंधे बनाये जा रहे हैं, जिसके कारण हमारा पर्यावरण प्रदूषित होता जा रहा है।

– ग्लोबलाइजेशन के कारण आज प्राथमिक शिक्षा से लेकर उच्च शिक्षा तक धनाधीन होने के कारण शिक्षा व्यवसाय बन गई है। देश में प्रबंधन संस्थानों की संख्या बढ़ती जा रही है, इन संस्थानों से निकलने वाले 5 प्रतिशत युवा भी स्वरोजगार की ओर उन्मुख नहीं होते वरन् बहुराष्ट्रीय कंपनियों में अपनी सेवाएं उपलब्ध कराते हैं।

– ग्लोबलाइजेशन के कारण बेरोजगारी, निम्न मजदूरी, कार्य की अनिश्चितता पर प्रभाव पड़ता जा रहा है।

– सेज (Special economic zone) जिसे हम 21 वीं सदी के उपनिवेश अथवा ”देशी जमीन पर विदेशी टापू” कह सकते हैं के नाम पर गांव के गांव उजाड़े जा रहे हैं। विदेशी निवेशकों को किसानों की उपजाऊ जमीनें कौड़ी के भाव दी जा रही है। जिससे किसान बेरोजगार थेकर, अन्त में आत्महत्या करने पर मजबुर हो रहा है।

– ग्लोबलाइजेशन के कारण पाश्चात्य संस्कृति और पंरपरा, हमारी भारतीय संस्कृति में पैर पसार रही है, जिसकी वजह से आज हमारी भारतीय संस्कृति के मूल्यों में गिरावट आती जा रही है। आज संयुक्त परिवार की जगह एकाकी परिवार, अरेंज विवाह की जगह प्रेम विवाह होने लगे हैं। आज पाश्चात्य संस्कृति हमारे उपर इतनी हावी हो चुकी है कि हम अपने माता-पिता को हाय डैड, हाय मॉम कहने लग गये हैं, जबकि हम इनके शब्दार्थ पर जाये तो इसका अर्थ कुछ और ही निकलकर आ रहा है।

– भूमिहीन खेत मजदूरों की संख्या बढ़ रही है और किसानों के लिए खेती आज घाटे का सौदा बन गई है। कर्ज में डूबे किसान आत्महत्या का रास्ता अपना रहे हैं। अकेले महाराष्ट्र में वर्ष 2001 से 2006 तक लगभग 200 किसान आत्महत्या कर चुके हैं। आर्थिक गतिविधियों में सेवा क्षेत्र के हावी होने से सकल घरेलू उत्पाद (जी डी पी)में कृषि क्षे की भागीदारी वर्ष दर वर्ष कम होती जा रही है और हमारी अर्थव्यवस्था का स्थायी आधार सिकुड़ता जा रहा है। कृषि क्षेत्र को प्राथमिकता न देने का ही परिणाम है कि अमेरिका की आर्थिक मंदी ने हमारे देश में हलचल मचा दी है। भूमंडलीकरण के नाम पर हमारा पर्यावरण लगातार विषैला हो रहा है, गंगा जैसी जीवदायिनी नदियां भी वैश्वीकरण का शिकार हो रही है, जंगल उजड़ते जा रहे हैं और जानवर विलुप्त हो रहे हैं। ऐसा लग रहा है कि मानव को जाने के लिए किसी अन्य चीज की नहीं, बल्कि पैसा और उद्योगों की ही जरूरत रह गई है।

उपर्युक्त तर्को के आधार पर ही कहा जा रहा है कि –

”वैश्वीकरण” की आंधी आई,

कमर तोड़ रही है महंगाई,

‘सेज’ की नीति नवीन है,

किसानों से छिन रही जमीन है …

”विनिवेश” का यह तूफान,

आत्महत्या कर रहे किसान

”साम्राज्यवाद” की रणभूमि में,

हारा फिर से हिन्दुस्तान …

निष्कर्ष –

”यत्र विश्व भवत्येक नींड” अथर्ववेद की यह भावना संपूर्ण विश्व को एक घोंसले के रूप में देखती है, जिसमें सभी राष्ट्र प्रेम एवं सहयोग के साथ रह रहे हैं। लेकिन ग्लोबलाइजेशन में ”वसुधैव कुटुम्बकम”, जैसी कोई भावना नहीं है और ना ही इसमें अन्तर्राष्ट्रीयता का भाव है। बल्कि यह विश्व, पूंजीवाद के शोषण का ही पर्याय है, जिसमें ग्लोबलाइजशन के माध्यम से राष्ट्रीय घरेलू अर्थव्यवस्थाओं को वैश्विक अर्थव्यवस्था के साथ जोड़ा जा रहा है। इस संस्थिति में वस्तुओं, सेवाओं, कच्चा माल पूंजी, प्रौद्योगिकी, उत्पादन के साधनों आदि का बिना किसी प्रतिबंध के स्वतंत्र रूप से विश्व के देशों में प्रवाह होता जा रहा है। इसी प्रवाह के अंतर्गत भूमंडलीकरण आजकल इस मान्यता पर आधारित होता जा रहा है कि ”प्रतियोगिता, कुशलता को बढ़ाती है”, जिसमें इस बात पर जोर दिया गया है कि कोई भी देश, विदेशी बहुराष्ट्रीय कंपनियों के अपने देश में प्रवेश पर प्रतिबंध नहीं लगायेगा, जिसकी वजह से हमारे देश के उद्योग पिछड़ते जा रहे हैं, हमारे संसाधनों एवं बाजारों पर विकसित देशों की बहुराष्ट्रीय कंपनियों का एकाधिकार होता जा रहा है, बेकारी एवं बेरोजगारी बढ़ती जा रही है। शायद यह ग्लोबलाइजेशन का एक पक्ष है, यदि हम उसके दूसरे पक्ष पर दृष्टिपात करें तो हम पाते हैं कि ग्लोबलाइजेशन के माध्यम से आज बढ़ते हुए आर्थिक संबंधों की आवश्यकता ने सभी देशों के मध्य आर्थिक सहयोग, साधनों की गतिशीलता, तकनीकी ज्ञान का लाभ, कार्य कुशलता में वृध्दि, आयात-निर्यात आदि उपायों के महत्व को बढ़ा दिया है। इससे यह सिध्द होता है कि जब भी किसी सिध्दांत का प्रादुर्भाव होता है तो उसके कुछ फायदे भी होते हैं और कुछ नुकसान भी। ”

7 Responses to “ग्लोबलाइजेशन : एक समसामयिक मूल्यांकन”

  1. dilip singh rathdiya

    medam aapne bahut hi achha likha hai ‘vaishvikaran’ ke bare me hame hi nahi pure world ke pathko ko khunshi hogi. ok thankyou

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  2. डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश'

    डॉ. पुरुषोत्तम मीणा ‘निरंकुश’

    सबसे पहले तो आपका प्रवक्ता के मंच पर लेखकों की जमात में स्वागत और साथ ही आपको उज्जवल भविष्य की शुभकामनाएँ! सबसे पहले ये बात ठीक से समझ लें कि प्रवक्ता पर नीलेश जैसी अनेक टिप्पणीकार भी हैं!

    जहाँ तक आपके लेख का सवाल है, विद्यार्थियों के लिए परीक्षा में अच्छे अंक प्राप्त करने के लिए लिखने योग्य तो ये जरूर है, लेकिन यदि आपको अर्थशास्त्र की या आर्थिक मामलों की लेखिका के रूप में स्थापित होना है तो दूसरों के शोध और अध्ययनों के साथ-साथ आपको अपने अनुभव और निजी विचारों को ही प्राथमिकता देनी होगी!

    आज वैश्वीकरण के कारण भारत के करीब साढ़े सात हजार पूंजीपतियों के पास देश की 70 फीसदी सम्पती जमा हो चुकी है और सरकारी नौकरियां लगातार गैर सरकारी क्षेत्र में जा रही हैं! जहाँ देश के 20 फीसदी लोगों के पास नब्बे फीसदी नौकरियां कैद हो चुकी हैं!

    वैश्वीकरण ने सामाजिक न्याय और लोक कल्याण जैसे संवैधानिक मूल्यों का गला घोंट दिया है! देश में फिर से मनुवाद नए स्वरुप में स्थापित हो रहा है! वैश्वीकरण के कारण गरीबी घटी नहीं, बल्कि कई गुनी बढी हैं!

    जब तक इन सब बातों पर विचार नहीं हो तब तक वैश्वीकरण पर एक प्रोफ़ेसर द्वारा लिखा गया लेख सिक्के के दोनों पहलुओं को देखने वाला कैसे हो सकता है, इस बारे में श्री अखिल जी से भी जानने की अपेक्षा रहेगी!

    आशा है कि आप किताबी ज्ञान से आगे बढ़कर जमीनी धरातल को छूने वाले निजी अनुभवों (यदि हैं तो) को आधार बना कर अपनी प्रतिभा को सामने लाने का सार्थक प्रयास करके हमें और देश के चिंतनशील लोगों को लाभान्वित कराती रहेंगी!

    डॉ. पुरुषोत्तम मीणा ‘निरंकुश’

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  3. nilesh

    अपने दोनो ही पक्षों को बहुत ही तार्किक रूप से रखा है .ग्लोबलाइजेशन का बर्तमान अर्थ
    विश्वस्तर पर अपनी दादागिरी स्थापित करने से होगया है. आज के समय मै यह ओपनेवैशिक संस्कृति का ही एक रूप है, लेकिन आज हम अन्तराष्ट्रीय स्तर पर हो रहे परिवर्तन से अपने आप को अलग नहीं कर सकते है .अतः भारत जैसे देश को तकनीकी और आर्थिक शक्ति प्राप्त कर,विश्व स्तर नेतृत्व करना होग़ा.

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  4. nilesh

    आपका लेख बहुत अच्छा लगा….आपकी ही तरह …………

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  5. अखिल कुमार (शोधार्थी)

    akhil

    बहुत सही लिखा है आपने मैडम और बहुत ही सार्गाभित तरीके से पक्ष और विपक्ष की पड़ताल भी की है…………इसे कहते हैं सिक्के के दोनों पहलुओं को देखना…..

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