गोस्वामी तुलसीदास

कवि- कुल- कमल- दिवाकर महाकवि श्रीमद् गोस्वामी तुलसीदास विरचित श्री रामचरितमानस हिंदी साहित्य का अनमोल ग्रंथ रत्न है। इस ग्रंथ का मूल मंत्र है- परोपकार।इस पवित्र ग्रंथ में धर्म , राजनीति , युद्ध,  शांति और विश्व बंधुत्व के तत्व अनुस्यूत हैं। यह आध्यात्मिक शक्ति से आपूरित है । इसने मानव- जीवन को संवारने का अद्भुत काम किया है। इसने हमें सही मार्ग पर चलना सिखाया है। यह सामाजिक कल्याण, खुशहाली, मैत्री और आनंद के स्रोत का खजाना है।इस ग्रंथ- रत्न में सात  सोपान हैं। जीवन में आगे बढ़ने की सात सीढ़ियां ये हैं–बालकांड , अयोध्याकांड, अरण्यकांड, किष्किंधाकांड, सुंदरकांड, लंकाकांड  और उत्तरकांड । ये सोपान हमारे वैयक्तिक, सामाजिक और राष्ट्रीय जीवन को कितना प्रभावित कर सकते हैं, इसके संबंध में निसंकोच कहा गया है- बाल का आदि, अयोध्या का मध्य और उत्तर का अंत, जो पढ़े सो होवे संत । ‘श्री रामचरितमानस मंत्र शक्ति से समन्वित है । मनुष्य के दैहिक, दैविक और भौतिक दुखों- कष्टों का निवारण करता है । आवश्यकता है तो केवल इसे भक्ति- भाव से पढ़ने की, रसास्वादन करने की । प्रेमपूर्वक पढ़ते हुए, गाते हुए, हारमोनियम, ढोल, झाल बजाते हुए हम कितने भाव- विभोर हो जाते हैं, हमारे आनंद का ठिकाना नहीं रहता । हम किसी दूसरे ही आनंद लोक में पहुंच जाते हैं । विविध प्रसंगों का कवि ने इस ढंग से मनोहारी वर्णन किया है कि आश्चर्य होता है । यह तुलसीदास जी की कारयित्री प्रतिभा का कमाल है ।ऐसे प्रातः स्मरणीय महाकवि का जीवन हास और अश्रु का घर- आंगन रहा है । बचपन में मां का स्नेह भरा दुलार- प्यार छूटा । जवानी में पत्नी ने ऐसी फटकार लगाई कि नानी याद आ गई । नवोढ़ा पत्नी के हृदय – वेधक ये शब्द इनके कानों में वैराग्य का अमृत- रस घोलने लगे :-लाज न लागत आपको, दौड़े आए साथ ।  ‌ धिक-धिक ऐसे प्रेम को, कहा कहौं मैं नाथ ।।अस्थि- चर्ममय देह मम, तामें ऐसी प्रीति । आधी जौं श्रीराम मंह, होति न तव भव भीति ।।प्रेम में पागल तुलसीदास जी की आंख खुल गई । उनके जीवन की दिशा बदल गई । उन्होंने साधुओं की संगति में समय बिताना शुरू कर दिया और अपना भगवत् ज्ञान बढ़ाने में तल्लीन हो गए । राम कथा और राम भक्ति का प्रचार उनकी दिनचर्या हो गई । उन्होंने श्री रामचरितमानस की रचना की । उन्होंने राम के मानव- अवतार का उद्देश्य विप्र, धेनु, देवताओं और संतों की कल्याण- कामना बताया ।तुलसीदास जी बहुत बड़े समाज- सुधारक थे ।श्रीरामचरितमानस के माध्यम से उन्होंने समाज में जागृति लाने का बड़ा ही महत्वपूर्ण कार्य किया । उन्होंने समाज में फैली विकृतियों के प्रति जन जागरण का शंखनाद किया ।

उन्होंने गुरु जी कोसावधान किया—“ हरइ  शिष्य धन शोक न हरई । सो गुरू घोर नरक मंह परई ।”राजा और शासक को संदेश दिया—“जासु राज प्रिय प्रजा दुखारी ।सो नृप अवसि नरक अधिकारी ।।”माता- पिता, गुरु और स्वामी के महत्व को देखते हुए उनके आदर- सम्मान और आज्ञा पालन करने की बात सिखाई—“मातु, पिता, गुरु, प्रभु कै बानी। विनहिं विचार करिए शुभ जानी।।” समाज ने तुलसीदास को प्रताड़ित किया, घोर कष्ट दिया। बदले में तुलसीदास जी ने समाज को स्नेह, सहयोग और उन्नति का पथ दिखलाया। उन्होंने नारी को सम्मान दिलाने का प्रयास किया। बहू- बेटियों की इज्जत बढ़ाई।  अहिल्या- जैसी नारी का उद्धार किया । सीता के चारित्रिक  आदर्श,कौशल्या की ममता, उर्मिला की विरह- वेदना की मौन सहनशीलता का वर्णन कर स्त्री- समाज को ऊंचे स्थान पर प्रतिष्ठित किया। जन-जन के हृदय में नारी की प्रगतिशीलता की कामना जगा दी ।श्री रामचरितमानस में सच्चाई है, अच्छाई है । यह कल्याण कारक है और बहुत ही हितकारी है। यह सभी उम्र के नर- नारी के लिए पठनीय है । यह ग्रंथ बहुत सुंदर  है । बच्चों और किशोर – किशोरियों के लिए भी प्रतिदिन पढ़ने योग्य है । इसमें शिव- विवाह, राम- सीता स्वयंवर और विवाह- प्रसंग, नारद मोह  का सुंदर चित्रण किया गया है । तुलसीदास जी ने कई स्थलों पर हास्य का भी सुंदर प्रसंग समाविष्ट किया है । लक्ष्मण- परशुराम संवाद, हनुमान और सुरसा की क्रिया- प्रतिक्रिया, भरत के उदात्त चरित्र का वैशिष्ट्य, कपटी स्वर्ण मृग का विलक्षण प्रसंग सुंदर बन पड़ा है। इसी तरह अनेकों मनोहारी प्रसंग भरे- पड़े हैं, जिन्हें पढ़ते रहने की अपेक्षा बढ़ती जा रही है ।श्री तुलसीदास जी ने सांस्कृतिक स्तर पर अखिल विश्व में भारत का नाम ऊंचा किया है । श्रीरामचरितमानस के आधार पर रामलीला का चित्ताकर्षक प्रदर्शन होता है । दूरदर्शन पर रामायण धारावाहिक बहुत लोकप्रिय हुआ है । कोरोना काल में भी सामाजिक दूरी और शांति बनाए रखने के लिए यह धारावाहिक जन- जन का हृदयहार बना है । यह तुलसीदास जी की राम भक्ति के प्रति आस्था की पराकाष्ठा है । जिस मनुष्य पर राम की कृपा होती है, वही इस भक्ति के मार्ग पर बढ़ता है:-“जा पर कृपा राम कै होई ।पांव देइ एहि मारग सोई ।।”जो भक्त श्री रामचरितमानस ग्रंथ का शुद्ध हृदय से पारायण करते हैं, उनकी सारी मनोकामनाएं पूरी होती हैं:-“मनोकामना सिद्धि नर पावा ।जो यह कथा कपट तजि गावा ।।”

पंडित वीरेंद्र कुमार

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