दादी का संदूक !

स्याही-कलम-दवात से, सजने थे जो हाथ !
कूड़ा-करकट बीनते, नाप रहें फुटपाथ !!
बैठे-बैठे जब कभी, आता बचपन याद !
मन चंचल करने लगे, परियों से संवाद !!

मुझको भाते आज भी, बचपन के वो गीत !
लोरी गाती मात की, अजब-निराली प्रीत !!

मूक हुई किलकारियां, चुप बच्चों की रेल !
गूगल में अब खो गए,बचपन के सब खेल !!

छीन लिए हैं फ़ोन ने, बचपन के सब चाव !
दादी बैठी देखती, पीढ़ी में बदलाव !!

बचपन में भी खूब थे, कैसे- कैसे खेल !
नाव चलाते रेत में, उड़ती नभ में रेल !!

यादों में बसता अभी, बचपन का वो गाँव !
कच्चे घर का आँगना, और नीम की छाँव !!

लौटा बरसों बाद मैं , उस बचपन के गाँव !
नहीं बची थी अब जहां, बूढी पीपल छाँव !!

नहीं रही मैदान में, बच्चों की वो भीड़ !
लगे गेम आकाश से, फ़ोन बने हैं नीड़ !!

धूल आजकल चाटता, दादी का संदूक !
बच्चों को अच्छी लगे,अब घर में बन्दूक !!

– डॉo सत्यवान सौरभ,

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