लेखक परिचय

राकेश कुमार आर्य

राकेश कुमार आर्य

'उगता भारत' साप्ताहिक अखबार के संपादक; बी.ए.एल.एल.बी. तक की शिक्षा, पेशे से अधिवक्ता राकेश जी कई वर्षों से देश के विभिन्न पत्र पत्रिकाओं में स्वतंत्र लेखन कर रहे हैं। अब तक बीस से अधिक पुस्तकों का लेखन कर चुके हैं। वर्तमान में 'मानवाधिकार दर्पण' पत्रिका के कार्यकारी संपादक व 'अखिल हिन्दू सभा वार्ता' के सह संपादक हैं। सामाजिक रूप से सक्रिय राकेश जी अखिल भारत हिन्दू महासभा के राष्ट्रीय प्रवक्ता व राष्ट्रीय उपाध्यक्ष और अखिल भारतीय मानवाधिकार निगरानी समिति के राष्ट्रीय सलाहकार भी हैं। दादरी, ऊ.प्र. के निवासी हैं।

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gstराकेश कुमार आर्य

कितना दुखद है कि इस बार का संसदीय सत्र अपने आप में ऐतिहासिक बनता जा रहा है। पिछले दिनों राज्यसभा ने जिस जी.एस.टी. बिल को पारित कर दिया था, उसे अब हमारी संसद के निम्न सदन अर्थात लोकसभा ने भी पारित कर दिया है। इसे जी.एस.टी. संविधान संशोधन (122) विधेयक कहा गया है।

देश में लोकतंत्र के शुभचिंतकों के लिए यह विषय देर से चिंता और चिंतन का विषय बनता जा रहा था कि हमारे राजनीतिज्ञ और राजनीतिक दल संसदीय लोकतंत्र की गरिमा का मखौल उड़ाते हुए संसद के प्रति अपने दायित्वों का निर्वाह करने में चूक कर रहे थे और देश में लोकतंत्र के रथ को आगे बढऩे में स्वयं ही बाधक बन रहे थे। संसद का कीमती समय व्यर्थ के विवादों और शोरगुल में व्यतीत होता जाता था। कांग्रेस का व्यवहार बहुत ही अडिय़ल हो गया था।

वास्तव में कांग्रेस का ऐसा व्यवहार बहुत ही दुखद था क्योंकि चाहे कुछ भी हो, पर यह बात तो सच है कि भारत में स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात के अब तक के काल में केन्द्र में सबसे अधिक कांग्रेस का शासन रहने से कई संसदीय परमपराओं का श्रीगणेश कांग्रेस ने ही किया है। जैसे नेहरूजी प्रधानमंत्री रहते हुए देश की संसद को अधिक से अधिक समय देते थे और विपक्ष की राय का सम्मान करने का हरसंभव प्रयास करते थे। तब संसद में विपक्ष की सरकार को रचनात्मक सहयोग प्रदान करता था और देश को आगे बढ़ाने में रचनात्मक भूमिका निभाता था।

2014 के चुनावों में पहली बार कांग्रेस को लगा कि इस बार निर्णायक रूप से कुछ अधिक देर के लिए सत्ता उसके हाथ से निकल गयी लगती है, इसलिए वह बौखलासी गयी और उसने संसद में विपक्ष की भूमिका तो स्वीकार कर ली पर सरकार के लिए वह रचनात्मक सहयोगी न होकर अड़ंगा डालने वाले दल के रूप में सामने आयी। प्रधानमंत्री मोदी की इस बात के लिए प्रशंसा करनी होगी कि उन्होंने हर विपरीत परिस्थिति में और हर मोड़ पर धैर्य के साथ कांग्रेस की ओर सहयोग का हाथ बढ़ाया। जिससे इस महत्वपूर्ण राजनीतिक दल की ‘असहिष्णुता’ को समाप्त किया जा सके। प्रधानमंत्री बौखलाए नही और ना ही अधीर हुए। वह अपनी साधना में लगे रहे। अगला शुभ संकेत यह मिला कि कांग्रेस की नेता श्रीमती सोनिया गांधी के तेवर जी.एस.टी. बिल पर ढीले पडऩे लगे। उनकी भी प्रशंसा करनी होगी कि उन्होंने वस्तुस्थिति को समझा और जी.एस.टी. बिल में यथावश्यक संशोधन परिवर्तन या परिवर्तन करके इसे पारित कराने का मन बनाया।

प्रधानमंत्री मोदी ने लोकसभा में यह उचित ही कहा है कि जी.एस.टी. का पारित होना किसी एक राजनीतिक दल या सरकार की जीत न होकर यह लोकतंत्र की जीत है। लोकतंत्र किसी भी राजनीतिक दल को या राजनीतिज्ञ को अनुचित आचरण या कार्य व्यवहार की साथ के साथ सजा नही देता है, अपितु यह अपने हर विद्यार्थी का ‘होमवर्क’ और उसकी उत्तर पुस्तिका का मूल्यांकन पांच वर्ष बाद करता है। तभी वह जिसका जैसा कार्य होता है, उसे वैसे ही अंक दे देता है। इसकी लाठी मौन रहती है, अपराधी पर पड़ते समय कोई आवाज नही करती, पर उसे इतनी यातना देती है कि बस उस पीड़ा को वही जानता है। अच्छा रहा कि हमारे राजनीतिक दलों को समय रहते विवेक उत्पन्न हुआ और सभी ने अपनी ‘राजहठ’ को लोकतंत्र की अपेक्षाओं तक शिथिल कर दिया। उनके झुकते ही लोकतंत्र का रथ चल निकला और संसद की लोकतांत्रिक परंपराओं का भी सम्मान हो गया। वास्तव में इसी स्थिति को परिपक्व लोकतंत्र कहा जाता है। ऐसा लोकतंत्र जिसमें देशहित को ‘दलहित’ पर वरीयता प्रदान की जाए।

जी.एस.टी. के पारित होने से देश में विभिन्न प्रकार के टैक्सों के झंझट से मुक्ति मिलेगी। पूरे देश में टैक्स व्यवस्था में समरूपता स्थापित होगी। समता, समानता और एकरूपता के राष्ट्रीय गुणों में और चरित्र में निखार आएगा। फलस्वरूप पारदर्शिता को बढ़ावा मिलेगा जो कि लोकतंत्र की पहली शर्त है। हमारी व्यवस्था में अभी भी ऐसी बहुत सी अंधी कोठरियां हैं जो व्यवस्था और जनता के मध्य सीधा संवाद स्थापित नही होने देती हैं। कानून की इन विसंगतियों के कारण भ्रष्टाचारियों को लूट मचाने का अवसर मिलता है और हम देखते हैं कि इन्हीं अंधी कोठरियों में लोकतंत्र और जनभावना के साथ दुराचार होता रहता है। यदि कानून की प्रक्रिया की जटिलताओं को हम आवश्यक सीमा तक पारदर्शी बना दें तो भ्रष्टाचार को समाप्त किया जा सकता है। अभी तक भी यह हो रहा है कि सरकार कानून बनाती है और उस कानून की कड़ाई से बचने बचाने का रास्ता किसी भी सरकारी कार्यालय में बैठा एक ‘बाबू’ नाम का भ्रष्ट कीड़ा लोगों को बताता रहता है। रास्ता बताने के इस उपकार की एवज में मिलने वाली घूस को लोगों ने ‘सुविधा शुल्क’ का नाम दे दिया है। यदि सरकारें सर्वस्वीकृति प्राप्त कानूनों का निर्माण करने लगें और पक्ष विपक्ष जी.एस.टी. जैसी सदाश्य्यता हर कानून के निर्माण में दिखाये तो ‘बाबू’ की ‘सुविधाशुल्क’ वाली अपसंस्कृति से और भ्रष्टाचार से देश को मुक्त किया जा सकता है। जी.एस.टी. इस दिशा में उठाया गया एक ठोस और सकारात्मक कदम है। यह भी अच्छी बात है कि इस बिल के लोकसभा में पारित होने के बाद कांग्रेस के उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने भी यह कहकर इस बिल का स्वागत किया है कि-”जी.एस.टी. संविधान संशोधन विधेयक पारित होना देश के लिए अच्छा कदम है।

जी.एस.टी. को वर्तमान स्वरूप में आने में एक दशक का समय लगा है। निश्चय ही इतना लंबा समय हमारे राजनीतिक नेतृत्व के कुशल राजनीतिक प्रबंध में आयेछिद्रों की ओर हमारा ध्यान दिलाता है। जिसे प्रधानमंत्री मोदी ने अपने कुशल प्रबंधन से भरने का कार्य करके यह संकेत दिया है कि सबका विकास और सबका साथ प्राप्त करना उनका नारा ही नही है, अपितु उसे स्थापित करने के लिए वह कृतसंकल्प भी है, हमें आशा करनी चाहिए कि आगामी वर्षों में देश में सरकार चाहे जिस दल की हो पर यह सर्वानुमति और सर्वस्वीकृति के बनने का परिवेश दूर तक हमारा साथ देगा।

अब सरकार का प्रयास रहेगा कि इस विधेयक को यथाशीघ्र देश के 16 राज्यों के विधानमंडलों से भी पारित करा लिया जाए। क्योंकि यह बिल देश के किन्हीं 16 राज्यों से अनुमोदित होकर राष्ट्रपति के पास जाएगा और उनके हस्ताक्षर से एक कानून का रूप लेगा। सरकार की इच्छा है कि अप्रैल 2017 से इसे देश में लागू कर दिया जाए। हमें भी आशा करनी चाहिए कि देश के अधिकतम राज्य इसे अपनी स्वीकृति प्रदान कर यथाशीघ्र केन्द्र के पास भेजेंगे। इस समय तो हमें अपने राजनीतिक दलों और उनके जनप्रतिनिधियों को इस बात के लिए धन्यवाद देना ही चाहिए कि उन्होंने देश में लोकतंत्र की जीत करने कराने में अपना योगदान देकर अति उत्तम पहल की है।

2 Responses to “जी.एस.टी. बिल लोकतंत्र की जीत”

  1. आर. सिंह

    R.Singh

    कहा जाता है कि देर आये दुरुस्त आये.पर इतिहास दो बातें शायद ही भूल सके.वे दोनों बातें भाजपा के अड़ियल पन से सम्बन्ध रखती है.पहले तो भाजपा ने विपक्ष में रहते हुए इस बिल को दो सालों तक रोक कर रखा,नहीं तो यह बिल २०१२ में ऐक्ट बन जाता. खैर वह तो उन्होंने किया नहीं. सत्ता में आते ही उनको शायद अपनी भूल समझ में आ गयी या यों कहिये कि भाजपा ने इसका सेहरा अपने माथे पर बंधन चाहा. अगर उस समय भी उन्होंने कांग्रेस के बिल को उसी रूप में सामने रख दिया होता,तो कांग्रेस को भागने का बहाना नहीं मिलता,पर नहीं हम तो अब सत्ता में हैं,अपनी मनमानी नहीं छोड़ेंगे.बिल को अपने ढंग से बनाया गया और कांग्रेस ने साथ देने से इनकार कर दिया.दो वर्ष फिर नष्ट हो गए,तब इन्होंने कांग्रेस द्वारा सुझाये करीब करीब सब संशोधनों को मान लिया और बिल पास हो गया.अब मेरा केवल एक प्रश्न है कि इन चार से पांच वर्षों के विलम्ब का असली जिम्मेवार कौन है?

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  2. डॉ. मधुसूदन

    डॉ. मधुसूदन

    अथ से इति तक परिपूर्ण आलेख। लेखक को धन्यवाद।
    सबके साथ बिना सबका विकास नहीं हो सकता। इस तथ्य को अधोरेखित करता आलेख।

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