गुलाममंडल खेल और नेहरू स्टेडियम

-विजय कुमार

दिल्ली में होने वाले गुलाममंडल खेलों के उद्धाटन, समापन आदि के लिए बना जवाहर लाल नेहरू स्टेडियम भी अंतत: तैयार हो ही गया। इसका नाम नेहरू स्टेडियम बिल्कुल ठीक ही रखा गया है, क्योंकि अंग्रेजों के जाने के बाद भारत में गुलाम परम्पराओं को जीवित रखने के सबसे बड़े अपराधी नेहरू ही हैं।

वे स्वयं को गर्वपूर्वक भारत में अंतिम अंग्रेज कहते थे। इसी प्रकार वे स्वयं को जन्म से हिन्दू, कर्म से मुसलमान और विचारों से ईसाई मानते थे। जो लोग इस तमाशे के समर्थक हैं, वे सब नेहरूवादी गुलाम मानसिकता के शिकार हैं। मणिशंकर अय्यर ने जीवन में बस यही अच्छा काम किया है कि वे इस सर्कस के विरोधी हैं।

इस तमाशे पर कितना धन खर्च हो रहा है, यह ठीक-ठीक किसी को नहीं पता। 15 से लेकर 50 हजार करोड़ रुपए तक की बात लोग कह रहे हैं। इससे भारत के हर विकास खंड में एक चिकित्सालय और विद्यालय तथा हर जिले में एक खेल स्टेडियम बन सकता था; पर गांव और गरीब किसी की प्राथमिकता में तो हो…।

दुर्भाग्यवश भारत के सभी बड़े नेता, राजनीतिक दल, संस्थाएं तथा संगठन चुप हैं। उन्हें डर है कि इससे कहीं युवा शक्ति उनसे नाराज न हो जाए। वे भूलते हैं कि आधुनिक युवक भले ही कितना फैशन परस्त हो; क्रिकेट, सिनेमा या कैरियर के लिए भले ही वह कितना दीवाना हो; पर उसके मन में देशभक्ति की चिन्गारी विद्यमान है। यदि उसे ठीक से बात समझाएं, तो यह चिन्गारी बहुत शीघ्र ही दावानल बन सकती है।

हर्ष की बात है कि स्वामी रामदेव जी ने इसके विरुद्ध आवाज उठाई है। यदि वे आह्वान करें, तो इस मुद्दे पर करोड़ों भारतवासी उनके साथ आ सकते हैं। क्या ही अच्छा हो यदि स्वामी जी ने नेतृत्व में तीन अक्तूबर 2010 को दिल्ली के देशभक्त नागरिक सत्याग्रह करें। वे सुबह से ही सड़कें जाम कर किसी खिलाड़ी, नेता या दर्शक को उद्धाटन कार्यक्रम में न जानें दें। सारी दुनिया का मीडिया उस दिन यहां होगा। उनके माध्यम से दुनिया देखेगी कि ‘हम भारत के लोग’ इस गुलामी के चोगे को उतार फेंकना चाहते हैं।

यदि स्वामी रामदेव जी अभी से तीन अक्तूबर को दिल्ली में रहकर इस सत्याग्रह का नेतृत्व करने की घोषणा कर दें, तो गुलाममंडल खेलों के विरुद्ध वातावरण बनने लगेगा। दिल्ली के आसपास के लाखों लोग भी उस दिन यहां आ जाएंगे। दो अक्तूबर गांधी जी का जन्मदिवस भी है, जिन्होंने सत्याग्रह रूपी शस्त्र का अंग्रेजों के विरुद्ध प्रयोग किया था। अंग्रेज रानी के नेतृत्व वाले ‘गुलाममंडल सर्कस’ के विरुद्ध इस शस्त्र को एक बार फिर आजमाने की जरूरत है।

9 thoughts on “गुलाममंडल खेल और नेहरू स्टेडियम

  1. Main ek sawaal Mr.Aiyer se poochha hai ki ve us samay kahan the jab iske liye India ne bid kiyatha?Aam janataa se,jisme aap sab log shaamil hain yah sawaal main nahi poochunga,kyonki in sab baaton mein aam janataa ki rai lee hi kab jaati hai? Par Mr.Aiyer walaa sawaal main Baba Ramdeo se bhi karnaa chaahta hon ki ve us samay kya kar rahe the?
    Main is tarah ke aayojanon ka virodhi nahi hoon,par jis tarah isko aayojit kiya ja rahaa hai,uska main virodhi jaroor hoon.Sarkar aur uski agenciyon ke paas 7 saal ka samay tha,par lambe arse tak to ve haath par haath rakh kar baithe rahe,aur aant mein jag kar sabkuchh emergency basis par karnaa chaahte hain.Isse saaf jaahir hotaa hai ki Desh ke prashishtha ka hawaalaa dekar sab mil kar arabon rupye dakaar jaanaa chaahte hain.Is khel ke prayojan meiin jis tarah kee dhandhali saamane aa rahi hai,agar usme 50% bhi satyataa hai to usse to lagta hai ki Common wealth games scrap karke aaj hi agar enquiry aarambh kar di jaye to desh ki pratishthaa jyada badhegi.Mujhe to Mahatma Gandhi ki yaad aa rahi hai ,jinhone CHARICHAURA ki ek ghatna ke baad asahyog aandolan wapas le liya tha,par kya aaj kisime wah sahas hai?

  2. श्री विजय जी बिल्कुल सहि कह रहे है. धन्यवाद.
    हमारे इतिहास से पर्दा उठना चाहिये.
    लगता है सरकार ने पिछ्ला और अगले कई चुनाव खर्च कामनवेल्थ खेल मे पूरा कर लिया है.
    लूटने की भी हद होती है. इनके आगे तो अन्गरेजो की लूट भी शरमा गई हॆ. क्या करे कामनवेल्थ खेल तो गोरी सरकार को सलामी देने के लिये ही है.
    हर स्तर पर गुलामी की मानसिक्ता का विरोध होना चाहीये.
    इतना धन अगर वाकई इमानदारी से खेलो पर खर्च होता तो हमारा देश कई खेलो मे ओलपिक मे स्वर्न पदक ले आने का सामार्थ्य रखता हे.

  3. Author Shri Vijay Kumar presents Pandit Jawahar Lal Nehru’s own description of self as:
    – Proud last Britisher in India
    – Hindu by birth
    – Muslim by deeds
    – Christian by ideology

    1. मंहगाई बढ़ती रहे बढ़ती है बढ़ जाय, खेल खेल में लुट गया आम आदमी हाय,…..

      यही है गुलाममंडल खेलों की आज की वास्तविकता … चमक दमक वाली पांच सितारा संस्कृति जब होटलों में नाचते हुए शराब के जाम छलकाती है तो उसे कहाँ दीखते हैं वे झुग्गियों के निवासी जो उसी होटल से कुछ दूरी पर पेट पर पट्टी बाँध कर सो रहे होते हैं.?…. प्रजातंत्र के बड़े बड़े दावों के बावजूद आज देश का शासन कुछ गिनती के “मेकाले के मानस पुत्रों” द्वारा संचालित किया जा रहा है ….. लोकतंत्र का चौथा स्तम्भ कहा जाने वाला मीडिया भी पांच सितारा संस्कृति का गुलाम हो रहा है … लेखक की मान लें और किसी के भी आह्वाहन पर कोई विशाल सत्याग्रह हो जाए तो मीडिया की खबरें चटकारों के साथ कुछ इस प्रकार सुनाई देंगी ;;;(१) ” भगवा ब्रिगेड ने देश का नाम मिटटी में मिला दिया (२) ग्लोबल इकानोमी के युग में स्वदेशी की बात केवल दकियानूसी लोग ही कर सकतें हैं ….. आदि आदि , आपके सत्याग्रह को प्रत्यक्ष जितने लोग देखेंगे उससे कई सौ गुना लोग इन विरोधनात्मक टिप्पणियों के साथ देख कर दिग्भ्रमित हो जायेंगे … सौ बार बोला सुना गया असत्य भी सत्य लगाने लगता है …. शत्रु को उसी के शस्त्र से काटना ही विजय का पथ प्रशस्त कर सकता है … जरूरत है विजय की इच्छा रखने वाले युवकों की जो इस विनाशकारी पांच सितारा संस्कृति से दिग्भ्रमित और विचलित न होकर सत्य की अलख जगाएं

  4. अभी तो होड़ लगी है गुलामी की झंडे Queen’s baitan” को लेकर देश में दौड़ने की !! .
    एक बड़े व्यावसायिक घराने ने तो बाकायदा बड़ा सा विज्ञापन छपवाया है की अभी झगडे को किनारे रखो . खेल हो जाने दो फिर हम खेलते रहेंगे , भरष्टाचार कौन सा बड़ा मुद्दा है ६६ सालों से खेल रहे हैं कुछ दिन चुप नहीं रह सकते.

  5. भ्रष्ट्राचाराचा देशभावनेशी संबंध जोडणे योग्य आहे का?
    प्रेषक thanthanpal (रवि, 08/08/2010 – 16:29)
    राष्ट्रकुल खेळा च्या भ्रष्ट्राचारा ची धुणी धुवत देशाच्या इज्जतीची लक्तरे जगाच्या वेशीवर टांगली जात असताना, इतके दीवस ७ वर्ष खेळाची तय्यारी होत असताना आपला कांही संबंध नाही अश्या तोऱ्यात गप्प बसणाऱ्या सरकारला आता वाईट परीस्थीतिची जाणीव झाली. प्रकरण आपल्या अंगावर शेकणार आहे हे लक्षात आल्यावर तडकाफडकी संयोजन समितीच्या ४ पदाधिकाऱ्यांची हकालपट्टी करण्यात आली. आता मोठे शार्क मासे वाचवण्याची damage control An effort to minimize or curtail damage or loss. मोहीम जनतेच्या देशभावनेस आवाहन करत सुरु झाली आहे. याला म्हणतात चोराच्या उलट्या बोंबा आणि याकरता पहेली जाहिरात सहारा उद्योग या बदनाम उद्योग समूहास हाताशी धरून सरकारनेच सुरु केली हे लहान मुलगा ही सांगील.

    1. भाई आपको प्रणाम।
      हिन्दी न्यूज पोर्टल पर विचार प्रकट करने के लिये भी आपका आभार। यह सत्य है कि आपने अपने अमूल्य विचारों को मराठी में लिखा है, लेकिन समस्या यह है कि आपने क्या लिखा है, मेरी समझ में नहीं आ रहा है? यदि आपने हिन्दी में लिखा होता तो मेरे जैसे अन्य पाठक भी समझकर अपने ज्ञान को विस्तार दे पाते। कृपया यदि सम्भव हो तो हिन्दी में अपने विचार प्रकट करें। धन्यवाद।

    1. कोई भी बच्चा बता सकता है की इस देश की प्राथमिकता क्या है?
      क्रिकेट तक तो ठीक है क्योंकि हर भारतवासी मैं उसको लेकर जूनून है. हाकी भी ठीक है, लेकिन इन सभी खेलों मैं सरकार का पैसा नहीं लगता बल्कि उलटी उसकी कमी होती है…लेकिन राष्ट्रमंडल खेल पूरी तरह से देश की भूखी नंगी जनता के साथ एक बहुत बड़ा राष्ट्रीय एवं राजनैतिक महापाप हो रहा है. एस देश के नागरिक को यह भी नहीं पता की उसको किस चीज का विरोध करना चाहिए और किस चीज़ का नहीं. अगर पता भी है तो उसमे विरोध करने की हिम्मत नहीं है. उसे नहीं पता ऐसे आयोजन देश को अगले ५० सालों तक सिर्फ गरीबी और महंगाई ही दे सकते हैं. कब तक सोयेगा ये देश…

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