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    Homeविविधाझोलाछाप डॉक्टर और कमीशनखोरी का धंधा

    झोलाछाप डॉक्टर और कमीशनखोरी का धंधा


    प्रियंका सौरभ 

    कोरोना काल में पूरी दुनिया में डॉक्टर भगवान् के रूप में लोगों को नज़र आये है और ऐसा हो भी क्यों न?अपनी जान को दांव पर लगाकर दूसरों को निस्वार्थ भाव से जिंदगी उपहार देने वाले भगवान ही तो है। मगर सरकारी आँकड़ों के अनुसार भारत के 1.3 बिलियन लोगों के लिये देश में सिर्फ 10 लाख पंजीकृत डॉक्टर हैं। इस हिसाब अगर देखा जाये तो भारत में प्रत्येक 13000 नागरिकों पर मात्र 1 डॉक्टर मौजूद है। जबकि विश्व स्वास्थ्य संगठन ने इस संदर्भ में 1:1000 अनुपात  को जायज़ और जरूरी मानता है, यानी हमारे देश में प्रत्येक 1000 नागरिकों पर 1 डॉक्टर होना अनिवार्य है। लेकिन ऐसा करने के लिए भारत को वर्तमान में मौजूदा डॉक्टरों की संख्या को कई गुना करना होगा।

     जहाँ एक ओर शहरी क्षेत्रों में 58 प्रतिशत योग्य चिकित्सक है, वहीं ग्रामीण क्षेत्रों में यह आँकड़ा 19 प्रतिशत से भी कम है। योग्य चिकित्सकों के अभाव में  देश में में झोलाछाप डाक्टरों की संख्या दिन-प्रतिदिन बढ़ती जा रही है। इन झोलाछाप डॉक्टरों के कारण मरीजों की जान सासत में है। इस मामले में स्वास्थ्य विभाग आखें मूंदे बैठा है। विभाग की अनदेखी के कारण झोलाछाप डाक्टर  चाँदी कूट रहे है। गाँवों में तो ये स्थिति और भी बदतर है। भारत के  प्रत्येक गाव में कई-कई झोलाछाप डाक्टर मरीजों को लूट रहे हैं। यह धधा इतना चंगा हो गया है कि लोग धड़ल्ले से इस व्यवसाय में एंट्री कर रहे है। गावों में इस प्रकार के झोलाछाप डाक्टर सरेआम क्लीनिक चलाकर लोगों को बेवकूफ बना रहे हैं।  

    इन झोला छाप डॉक्टरों (वे डॉक्टर जो न तो पंजीकृत हैं और न ही उनके पास उचित डिग्री है) की संस्कृति हमारी स्वास्थ्य प्रणाली के लिये काफी खतरनाक है।  विश्व स्वास्थ्य संगठन ने अपनी रिपोर्ट में बताया है  कि भारत में 57.3% डॉक्टर वास्तव में  बिना मेडिकल डिग्री के हैं। और, यह आश्चर्य की बात नहीं है कि उनमें से ज्यादातर देश के ग्रामीण इलाकों में पाए जाते हैं

    देश भर में झोलाछाप डॉक्टरों के कारण मरीजों की जान सासत में

    इंडियन मेडिकल काउंसिल एक्ट 1956, दिल्ली मेडिकल काउंसिल एक्ट 1997, ड्रग्स एंड कॉस्मेटिक्स एक्ट 1940 और ड्रग्स एंड कॉस्मेटिक्स रूल्स 1945 में कहा गया है कि केवल एक रजिस्टर्ड डॉक्टर ही एलोपैथिक दवा लिख सकता है। “भारतीय चिकित्सा पद्धति के लिए, भारतीय चिकित्सा केंद्रीय परिषद अधिनियम, 1970 कहता है  कि भारतीय चिकित्सा पद्धति के अभ्यासी के अलावा कोई भी व्यक्ति जो किसी मान्यता प्राप्त चिकित्सा योग्यता रखता है और किसी राज्य रजिस्टर या भारतीय चिकित्सा के केंद्रीय रजिस्टर में नामांकित है, भारतीय में  मेडिकल और  किसी भी राज्य में मरीजों के लिए दवा लिखेगा।

    इसके अलावा यदि कोई अन्य ऐसा करता पाया तो उसके लिए इंडियन मेडिकल काउंसिल एक्ट, 1956 में कारावास की सजा का उल्लेख है जो एक वर्ष तक का हो सकता है या जुर्माना जो 1,000 रुपये तक हो सकता है या दोनों हो सकता है, दिल्ली मेडिकल काउंसिल एक्ट, 1997 के तहत क्लॉज (27) में ‘कठोर दंड’ का उल्लेख किया गया है । इसमें तीन साल तक की कैद या 20,000 रुपये तक का जुर्माना या दोनों हो सकते है। भारतीय दंड संहिता भी इन मामलों को धारा 429 (प्रतिरूपण), 420 (धोखाधड़ी) और 120 B (आपराधिक षड्यंत्र) के तहत देखती है।


    मगर इतना होने के बावजूद देश में ऐसा हो क्यों रहा है?  इस धंधे के इतना फूलने- फलने का कारण सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं की कमी है। साथ ही जो सरकारी मेडिकल अफसर है वो बड़े घरों से आते है और खासकर गाँवों में मरीज देखना पसंद नहीं करते, जिसकी वजह से उनका ध्यान अपने प्राइवेट हॉस्पिटल पर ज्यादा रहता है  गावों के लोगों को  सरकार द्वारा स्थापित स्वास्थ्य केंन्द्रों में डॉक्टरों की कमी के कारण मरीजों को इन झोलाछाप डॉक्टरों की शरण में जाना पड़ रहा है।

     ये झोलाछाप डॉक्टर नकली दवाओं के साथ इलाज कर मरीजों के जीवन से खिलवाड़ कर रहे है। ऐसा भी देखा गया है कि कई झोलाछाप डाक्टर नशे के व्यापार से भी जुड़े हुए हैं। ऐसे में गावों में चल रहे ये क्लीनिक नशेड़ियों की पौध को पैदा करने में जुटे हुए है। मगर देश भर में  प्रशासन को जानकारी के बावजूद इन पर नकेल कसने की कोई कार्रवाई अंजाम नहीं दी जाती।

    इन फर्जी डॉक्टरों द्वारा मरीजों के जीवन से खिलवाड़ किया जा रहा है। देश भर में जगह-जगह बिना रजिस्ट्रेशन वाले डॉक्टर क्लीनिक चला रहे हैं। इतना ही नहीं क्लीनिकों के नाम बड़े शहरों के क्लीनिकों की तर्ज पर रखते है, जिससे लोग आसानी से प्रभावित हो जाते है।  मरीज अच्छा डॉक्टर समझकर इलाज करवाते हैं, लेकिन उन्हें इस बात का पता नहीं रहता है कि उनका इलाज भगवान भरोसे किया जा रहा है। 

    फर्जी डॉक्टरों के लिए यह धंधा काफी लाभदायक है। मरीजों को लुभाने के लिए बड़े डॉक्टरों की तर्ज पर जांच करवाते हैं और जांच के आधार पर मरीज का इलाज करते हैं, जिससे मरीज को लगे कि डॉक्टर सही हैं एवं उनका इलाज सही तरीके से किया जा रहा है। देश के  लगभग हर गाँव में एक-दो फर्जी क्लीनिक चल रहे हैं।

    फर्जी डाक्टरों ने इस धंधे को और लाभदायक बनाने के लिए  निजी अस्पतालों से भी सांठगांठ कर रखी है। मरीज की हालत ज्यादा गंभीर होने पर वो उसे वहां भेज देते हैं, जहां से उन्हें कमीशन के तौर पर फायदा होता है। फर्जी डॉक्टरों का ग्रामीण क्षेत्रों में धंधा खूब फल-फूल रहा है। फर्जी डॉक्टर ग्राम स्तर पर शाखाएं जमाए हुए हैं और बड़े डॉक्टरों की तर्ज पर  बिना संसाधनों के क्लीनिक चलाते हैं। फर्जी डॉक्टर वहीं दवा लिखते है जिनमें उन्हें कमीशन मिलता है। अक्सर ऐसे मामले देखने को मिलते है कि फर्जी डॉक्टरों के इलाज से मरीज की जान पर आफत आ जाती है ।  

    हमारी शिक्षा प्रणांली भी ऐसे धंधों के को पनपाने में बराबर कि दोषी है देश में हर साल कई फर्जी संस्थान हैं जो असंख्य फर्जी मेडिकल डिग्री सौंपते हैं। राजनेताओं के ऐसे निजी शिक्षा संस्थाओं से निहित स्वार्थ है जो इन सबको बढ़ावा दे रहे है।  सरकार को ऐसे संस्थानों पर लगाम लगानी चाहिए। केंद्रीय स्वास्थय मंत्रालयों को देश भर में जिला प्रशासन के साथ मिलकर इन झोलाछाप डॉक्टरों पर नकेल कसनी चाहिए और लोगों को भी इस  दिशा में स्वयं जागरूक होना चाहिए कि वो इन झोलाछाप के पास न जाकर अपने गाँव के सरकारी स्वास्थ्य केंद्र पर जाये।

    ग्रामीण पंचायतों को इस दिशा में ये प्रयास करना चाहिए कि उनके गाँव में स्वास्थ्य केंद्र पर कोई स्टाफ और जरूरी चिकित्सा सेवा उपकरणों की कमी न हो। अगर ऐसा है तो वो सरकार से मांग कर उनको सर्वप्रथम पूरा करवाए।  सरकारी चिकित्सिकों पर जहां ड्यूटी है वहां रात को भी रुकने की पाबंदी लगाई जाये।  ग्रामीण क्षेत्र में कम से कम दस साल सर्विस का नियम हर चिकित्सा कर्मी पर लागू कर उनके प्राइवेट प्रैक्टिस पर कानूनी पाबन्दी हो तो ये झोलाछाप स्वतः ही खत्म हो जायँगे।

    प्रियंका सौरभ
    प्रियंका सौरभ
    रिसर्च स्कॉलर इन पोलिटिकल साइंस, कवयित्री, स्वतंत्र पत्रकार एवं स्तंभकार

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