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    Homeसाहित्‍यकविताहै कहर बाहर

    है कहर बाहर

    क्यों घरों को छोड़कर बाहर निकलते।
    है कहर बाहर नहीं फिर क्यों संभलते।

    सड़क गलियों से अभी तक प्यार क्यों है।
    मिल रहीं बीमारियाँ जब राह चलते।

    हो गए बीमार तो फिर क्या करोगे?
    रोओगे रह जाओगे फिर हाथ मलते।

    भीड़ में जाना मुनासिब जब नहीं है,
    क्यों नहीं यह बात अब तक भी समझते।

    मास्क बांधो और छह फुट दूरियाँ हों,
    क्यों नहीं पालन नियम का आप करते।

    प्रभुदयाल श्रीवास्तव
    प्रभुदयाल श्रीवास्तव
    लेखन विगत दो दशकों से अधिक समय से कहानी,कवितायें व्यंग्य ,लघु कथाएं लेख, बुंदेली लोकगीत,बुंदेली लघु कथाए,बुंदेली गज़लों का लेखन प्रकाशन लोकमत समाचार नागपुर में तीन वर्षों तक व्यंग्य स्तंभ तीर तुक्का, रंग बेरंग में प्रकाशन,दैनिक भास्कर ,नवभारत,अमृत संदेश, जबलपुर एक्सप्रेस,पंजाब केसरी,एवं देश के लगभग सभी हिंदी समाचार पत्रों में व्यंग्योँ का प्रकाशन, कविताएं बालगीतों क्षणिकांओं का भी प्रकाशन हुआ|पत्रिकाओं हम सब साथ साथ दिल्ली,शुभ तारिका अंबाला,न्यामती फरीदाबाद ,कादंबिनी दिल्ली बाईसा उज्जैन मसी कागद इत्यादि में कई रचनाएं प्रकाशित|

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