डॉ. राधेश्याम द्विवेदी
हनुमान जी भारतीय पौराणिक कथाओं में एक शक्तिशाली और सम्मानित हिंदू देवता हैं । सदियों से उन्हें साहस, निस्वार्थता और शक्ति के प्रतीक के रूप में पूजा जाता रहा है। रामायण में हनुमान की भूमिका भगवान राम के प्रति गहरी भक्ति अटूट विश्वास ,निष्ठा और वीरता का प्रतीक है। उनकी भूमिका बहुआयामी और महत्वपूर्ण है, जो हमें वफादारी, भक्ति, साहस और विनम्रता में मूल्यवान सबक सिखाती है। वे राम के परम भक्त थे और अनेक कथाएँ उन्हीं के इर्द-गिर्द घूमती रहती हैं। उनकी वीरता और बल ने उन्हें एक शक्तिशाली योद्धा बनाया, साथ ही उन्होंने लंका से चुराई गई संजीवनी बूटी को वापस लाकर रामायण युद्ध में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। कई कथाओं में कहा जाता है कि उनके जन्म में वायु की भूमिका थी। बचपन में, हनुमान ने सूर्य को फल समझ चखने की कोशिश की,जिसके कारण उनकी बोलने की क्षमता चली गई। धनुर्धर के रूप में उनकी कुशलता और बल ने उन्हें एक दुर्जेय योद्धा बना दिया। राम और रावण के युद्ध के दौरान, हनुमान ने जंबुमाली, अक्ष और महापार्श्व सहित कई राक्षस योद्धाओं को मार गिराया था। वे समुद्र के ऊपर से छलांग लगाकर लंका पहुंचे और अपनी जलती हुई पूंछ से लंका को प्रज्वलित कर दिया था।
राम के गुणों और वीरता से प्रेरित होकर हनुमान ने उनके प्रति अपनी अमर भक्ति की प्रतिज्ञा की, इस प्रकार उन्होंने वफादारी, बहादुरी और अटूट प्रतिबद्धता से चिह्नित यात्रा की शुरुआत की। हनुमान परमात्मा और मानव के बीच एक कड़ी के रूप में कार्य करते हैं। वे एक आदर्श भक्त के रूप में हमें निष्ठा, भक्ति, साहस और विनम्रता के मूल्यवान पाठ पढ़ाते हैं। बदले में कुछ भी उम्मीद किए बिना सेवा करने की उनकी इच्छा, विपरीत परिस्थितियों में उनका साहस, और धार्मिकता के प्रति उनकी अटूट प्रतिबद्धता ; सभी ऐसे गुण हैं जो प्रेरणा देते रहते हैं। हनुमान का चरित्र हमें भक्ति की शक्ति, विनम्रता की शक्ति और धार्मिकता के लिए खड़े होने का साहस सिखाता है।
प्रमुख हनुमान प्रतिमा और मंदिर :-
श्री हनुमंत कथा में भगवान हनुमान के जन्म, उनके बालपन के पराक्रम और श्री राम के प्रति उनकी अगाध भक्ति की पावन गाथा है। जिसमें मुख्य रूप से माता अंजनी के यहाँ उनका अवतार, सूर्य को फल समझ कर निगलने की लीला और लंका दहन जैसे प्रसंग आते हैं। उनकी कथा आज पूरे भारत में प्रचलित है, और अन्य हिंदू देवताओं की तरह ही उनके सम्मान में अनेक मंदिर पूरे देश में जगह जगह पर स्थापित हैं। भारत के हर राज्य में उनकी प्रतिमाएं पा जाती हैं।
हनुमान की मूर्तियाँ और उनके प्रसिद्ध मंदिर अपनी अनोखी बनावट, भव्यता और चमत्कारों के लिए जाने जाते हैं। वैसे भारत के कोने कोने में राम दरबार में हनुमान प्रतिमा तो मिलती ही है। स्वतंत्र रूप से हनुमान की प्रतिमा और मन्दिरों की भी बहुत प्रसिद्धि है। 20 फिट लम्बी लेटे हुए हनुमान की शयन मुद्रा की मूर्ति वाला मंदिर प्रयागराज का मुख्य आकर्षण है। यहां उनके पुत्र मकर ध्वज की मूर्ति भी स्थापित की गई है।76 सीढ़ियों वाली हनुमानगढ़ी अयोध्या का सर्वाधिक लोकप्रिय मंदिर है, जहां राम जन्म भूमि से भी ज्यादा श्रद्धालु दर्शन और आराधना करते हैं। संकटमोचन मंदिर वाराणसी की महिमा भी कम नहीं है। हनुमान धारा चित्रकूट में ऊंचाई पर स्थित अत्यंत प्रसिद्ध मंदिर हैं। सामान्यतः मंदिरों में गदा लिए हुए खड़े या बैठे हुए मुद्रा की मूर्तियां मिलती हैं। भारत में कई स्थानों आन्ध्र प्रदेश, दिल्ली और ओडिशा में 100 फीट से भी ऊंची विशाल मूर्तियाँ स्थापित हैं।
अलीगंज लखनऊ में अति प्रसिद्ध हनुमान मंदिर गोमती के पुल के पास स्थित है। सालासर हनुमान मंदिर चूरू(राजस्थान) कुछ प्रमुख मंदिर हैं। राजस्थान के दौसा जिले के पास दो पहाडिय़ों के बीच बसा हुआ बालाजी हनुमान मंदिर मेहंदीपुर भी प्रसिद्ध मंदिर है।
गुजरात के भेट-द्वारका से चार मील की दूरी पर मकरध्वज के साथ में भगवान हनुमान की मूर्ति स्थापित है।डुल्या मारुति, पूना (महाराष्ट्र) पूना के गणेशपेठ में बना यह मंदिर काफी प्रसिद्ध है।श्री कष्टभंजन हनुमान मंदिर, सारंगपुर (गुजरात) अहमदाबाद-भावनगर के पास स्थित बोटाद जंक्शन से सारंगपुर 12 मील दूरी पर स्थित है। हंपी, कर्नाटक बेल्लारी जिले के हंपी शहर में एक प्रसिद्ध हनुमान मंदिर है। इन्हें यंत्रोद्धारक हनुमान कहा जाता है। नारी रूपा गिरजा बंध हनुमान मंदिर रतनपुर बिलासपुर में, उल्टे हनुमान जी का मंदिर सांवरे इंदौर मध्य प्रदेश में स्थित है। प्राचीन कनॉट प्लेस का हनुमान मंदिर , बाल हनुमान मन्दिर , जाम नगर गुजरात , पंचमुख आञ्जनेयर हनुमान मंदिर तमिलनाडु और महाबीर मंदिर पटना आदि प्रमुख हनुमान मंदिर हैं।
हनुमान गढ़ी अयोध्या
हनुमान गढ़ी (अयोध्या) एक बहुत ही प्राचीन और ऊँचे टीले पर स्थित मंदिर है। यह स्थान प्राचीन काल से ही धर्म और आस्था का मुख्य केंद्र रहा है। पौराणिक कथा के अनुसार, रावण के वध के बाद भगवान रामचंद्र सीता देवी और लक्ष्मण के साथ अयोध्या लौट आए थे। हनुमानजी अपने परम प्रिय भगवान की सेवा करने के लिए अयोध्या में ही रुक गए थे।
हनुमान गुफा से होती थी अयोध्या की रखवाली :-
वाल्मीकि रामायण और स्कंद पुराण के अनुसार, अजर-अमर हनुमान जी यहाँ एक गुफा में निवास करते थे। इन्हें ‘रामकोट’ का रक्षक माना जाता है। मान्यता है कि यहां भगवान श्रीराम के दिव्य शासन की झलक मिलती है। शास्त्रों के अनुसार, जब प्रभु रामचंद्र साकेत धाम जा रहे थे, तब उन्होंने हनुमान जी को अयोध्या में रहने और सूर्य और चंद्रमा के अस्तित्व के दौरान तथा भगवान राम की महिमा का गुणगान होने तक वहां शासन करने का निर्देश दिया था। उन्होंने हनुमान जी को भक्तों को पूर्णता की ओर मार्गदर्शन करने का भी निर्देश दिया था।
अयोध्या स्थित ‘हनुमान गढ़ी’ भगवान हनुमान को समर्पित एक किले के आकार में निर्मित 10 वीं शताब्दी का प्राचीन तीर्थ मंदिर शहर के केंद्र में स्थित है, जहाँ 76 सीढ़ियाँ चढ़ने के बाद पहुँचा जा सकता है। इसके प्रत्येक कोने में गोलाकार किलेबंदी है। माना जाता है कि यह वह स्थान है जहां भगवान हनुमान ने एक गुफा में निवास किया था और पूरे शहर की रक्षा की थी।
मुगल शासक औरंगजेब ने राम जन्म भूमि की भांति कहा जाता है कि हनुमानगढ़ी को तोड़वाकर वहां एक मस्जिद बनवा दिया था। उर्दू उपन्यासकार मिर्ज़ा रजब अली बेग सुरूर की पुस्तक ‘फसाना -ए-इब्रत, जिसका स्रोत ‘साहिफा-ए- बहादुरशाही’ है और जिसे उन्होंने 1816 ईस्वी में प्रतिरूपित किया था, में उल्लेख है कि औरंगज़ेब ने हनुमानगढ़ी मंदिर को ध्वस्त कर एक मस्जिद का निर्माण करवाया था। बाद में, बक्सर में अवध के नवाब शुजाउद्दौला की पराजय के बाद, बैरागियों ने 1855 ईस्वी में उस भूमि पर कब्जा कर लिया, मस्जिद को हटवा दिया और भक्त हनुमान के लिए एक नया मंदिर बनवाया। कुछ मुसलमानों का मानना था कि हनुमानगढ़ी एक मस्जिद पर बनी है। इसलिए उन्होंने कई बार मंदिर को तोड़ने की कोशिश की, लेकिन असफल रहे।
भक्त हनुमान जी के दोनों ओर भक्तों द्वारा भेंट की गई चांदी या सोने की गदाएं रखी हुई हैं। श्री राम के नाम से अंकित चांदी की तुलसी की माला हमेशा मूर्ति को सुशोभित रखती है। भक्त हनुमान जी के पीछे सीता, राम और लक्ष्मण की प्राचीन मूर्तियां भी स्थापित हैं। भक्त हनुमान जी की यह मूर्ति अत्यंत शक्तिशाली है और पूरे भार हनुमान जी की एकमात्र जीवित मूर्ति मानी जाती है। मंदिर के गर्भगृह में माता अंजना देवी की गोद में विराजमानभगवान हनुमान की छह इंच की भव्य प्रतिमा विराजमान है। प्रतिमा को हमेशा अनेक पुष्पमालाओं और सिंदूर से पूर्णतः सजाया जाता है। इसलिए, अधिकांश समय केवल भगवान हनुमान का नारंगी रंग का कमल नुमा चेहरा ही दिखाई देता है।
मुख्य मंदिर में, पवनसुत माता अंजनी की गोद में बैठते हैं। श्रीहनुमानजी का मन्दिर में श्रीमारुति की एक और मूर्ति यहाँ है, वह केवल छः इंच ऊँची है । माना जाता है कि हर एक सीढ़ी किसी न किसी आध्यात्मिक पहलू को दर्शाती है। कुछ लोगों का कहना है कि ये 76 सीढ़ियाँ ईश्वर की ओर यात्रा में भक्ति के विभिन्न चरणों को प्रतिबिंबित करती हैं। मन्दिर बड़ा है और उसमें श्रीहनुमानजी की स्थानक मूर्ति है सदा पुष्पाच्छादित रहती है।
श्री हनुमान जी के भक्तों के लिये यह स्थान विशेष श्रद्धास्पद है। मन्दिर के चारों ओर निवास योग्य स्थान बने हैं, उनमें साधु सन्त रहते हैं। लंका विजय के बादअयोध्या राज महल का जो स्वर्ण स्तम्भ रावण उठा ले गया था उसे भी हनुमान जी यहां लाकर स्थापित किया था। यहां पास में हनुमान कुण्ड भी है जिसे राज्य सरकार ने सौंदर्यीकृत कराया है।
हनुमानगढ़ी क्षेत्र में उत्खनन
हनुमानगढ़ी क्षेत्र में 1981-1982 ई. में सीमित क्षेत्र में उत्खनन किया गया। यह उत्खनन मुख्यत: हनुमान गढ़ी और लक्ष्मण घाट क्षेत्रों में हुआ था। हनुमान गढ़ी क्षेत्र से भी उत्तरी काली चमकीली मृण्भांड संस्कृति (लगभग 700 ईसा पूर्व से 200 ईसा पूर्व के बीच ) के अवशेष प्रकाश में आए हैं। साथ ही यहाँ अनेक प्रकार के मृतिका वलय कूप तथा एक कुएँ में प्रयुक्त कुछ शंक्वाकार ईंटें भी मिली हैं। उत्खनन से बड़ी मात्रा में विभिन्न प्रकार की वस्तुएँ मिली हैं, जिनमें मुख्यत: आधा दर्जन मुहरें, 70 सिक्के, एक सौ से अधिक लघु मृण्मूर्तियाँ आदि उल्लेखनीय हैं। इसमें सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण कुषाण शासक वासुदेव की एक मिट्टी की मुहर (दूसरी शती ई.), इसी काल का मूलदेव का एक सिक्का तथा एक भूरे रंग की केश-विहीन जैन मृण्मूर्ति है। हनुमानगढ़ी से प्राप्त अन्य मृण्मूर्तियाँ पहली-दूसरी शताब्दी ई. पू. की हैं। ये मृण्मूर्तियाँ अहिच्छत्र, कौशांबी, पिपरहवा और वैशाली आदि क्षेत्रों से प्राप्त मृण्मूर्तियों के समान ही हैं। इस प्रकार की मृण्मूर्तियों को वासुदेवशरण अग्रवाल ने विजातीय प्रकार से अभिहित किया है।
तीन सौ वर्ष पूर्व की वर्तमान संरचना:-
वर्तमान में स्थित हनुमान गढ़ी की स्थापना लगभग तीन सौ वर्ष पूर्व स्वामी श्रीअभयारामदास जी ने की थी। कहते हैं प्राचीन काल में यहाँ हनुमानजी का एक विशाल मन्दिर था, जिसके कालान्तरमें भग्न होने से यह स्थान एक टीले में बदल गया था, इसे हनुमान् टीला कहा जाता था; उसी स्थान पर स्वामी अभयारामदास जी द्वारा स्थापित वर्तमान मन्दिर है। आप एक सिद्ध महात्मा थे तथा हनुमानजी ने आप को साक्षात् दर्शन भी दिया था। आप ने समाज की श्रद्धा-भावना के संरक्षणार्थ पहले यहाँ श्री निर्वाणी अखाड़ा की स्थापना की और फिर यहीं श्रीहनुमानजी की विधिवत् पूजा-आराधना एवं भोग-राग की व्यवस्था मर्यादित रूप से की।
नवाबों ने अयोध्या से महज 6 किलोमीटर दूर फैजाबाद को अपनी राजधानी बनाया था। उनके शासनकाल में, भारत के विभिन्न हिस्सों के शासकों जैसे अहिल्या बाई होलकर, जयपुर के राजा, नागपुर के भोसले आदि ने यहाँ बड़ी संख्या में मंदिर और मठ बनवाए।
अवध के नवाबों की उदारता की बड़ी बड़ी बातें मुस्लिम और अंग्रेजी इतिहासकारों द्वारा की जाती है। 20 एकड़ या 52 बीघे भूमि का तथाकथित दान देने की बात भी आती है पर ऐसा हुआ है नहीं था । नवाब शुजा- उद- दौला या मंसूर अली द्वारा मालगुजारी (कर) में छूट की बात ही प्रमाणित होती है।
यह भी कहा गया है कि एक बार लखनऊ तथा फैजाबाद के प्रशासक नवाब मंसूर अली का पुत्र किसी भयंकर रोग से अत्यन्त पीडित हो गया। सुयोग्य वैद्यों और हकीमों के उपचारों से भी जब उसकी व्याधि नहीं मिटी, तब वह हनुमानगढ़ी के श्रीहनुमान जी की शरण में आया और अविलम्ब उसे उस भीषण रोग से मुक्ति मिल गयी। इसके प्रतिफल स्वरूप नवाब के मन में श्रीहनुमान जी के प्रति श्रद्धा अंकुरित हो गयी। उसने कुछ सहयोग भी किया था। साधुओं की सुविधा के लिये विशाल इमली का बाग लगवा दिया और उसी समय श्री अभयाराम दास जी से प्रार्थना करके हनुमानजी का एक विशाल, भव्य एवं सुदृढ़ मन्दिर बनवा दिया था, जो आज भी हनुमान गढ़ी के नाम से विख्यात है।
दर्शन,पूजन,मुण्डन और यज्ञोपवीत :-
अयोध्या तथा आस-पास के कुछ जिलों के कई परिवार अपने कुल परम्परानुसार अपने बच्चों का मुण्डन और यज्ञोपवीत यहीं करवाते हैं। अयोध्या के बहुत से नेमी श्रद्धालु स्नान करके नित्य यहाँ आते हैं। हिन्दू भक्तों एवं दर्शनार्थियों के कारण यहाँ नित्य ही मेला-सा लगा रहता है। मंगलवार तथा शनिवार को तो अपार भीड़ होती है। यह कहने में अत्युक्ति न होगी कि अयोध्या में युगल-सरकार की कृपा प्राप्ति के लिये हनुमान गढ़ी के श्री हनुमानजी की जितनी पूजा होती है, उतनी युगल-सरकार की भी नहीं होती।
दियारा के राजा का सहयोग :-
सुल्तानपुर की दियारा रियासत के राजा (और अन्य स्थानीय जमींदारों) ने संतों और अखाड़ों के माध्यम से मंदिर की रक्षा और इसके विस्तार (जिसे ‘गढ़ी’ या किले का रूप दिया गया) में आर्थिक और सैन्य सहयोग प्रदान किया था।
महाराजा मानसिंह द्वारा विवाद का निपटारा :-
अयोध्या के तत्कालीन महाराजा मानसिंह का जन्म मार्ग शीर्ष शुक्ल 5, सं. 1877 तदनुसार 10 दिसंबर 1820 ई, में हुआ था। उनका शासकीय समय 1830-1870 तक लिखा मिलता है। राज्य की सत्ता 1844 से ही मानसिंह के हाथ में आ गई थी।
जब हनुमान गढ़ी का झगड़ा उठा तो वादशाह ने महाराजा मानसिंह से कहा कि यहाँ तुम हिन्दुओं के सरदार हो। जैसे तुमसे बने इस झगड़े को निपटा दो।
अन्तिम बादशाह वाजिदअली के समय में एक दुर्घटना हुई। “गुलाम हुसेन” नाम का एक सुन्नी फ़क़ीर हनुमानगढ़ी के महन्तों के यहाँ से पलता था। वह एक दिन बिगड़ बैठा और सुन्नियों को यह कह कर भड़काया कि औरङ्गजेब ने गढ़ी में एक मसजिद बनवा दी थी उसे बैरागियों ने गिरा दिया। इस पर मुसलमानों ने जिहाद की घोषणा कर दी और गढ़ी पर धावा बोल दिया। परन्तु हिन्दुओं ने उन्हें मार भगाया और वे जन्मस्थान की मसजिद में छिप गये। कप्तान आर. मिस्टर हरसे और कोतवाल मिरजा मुनीम बेग ने झगड़ा निपटाने का बड़ा उद्योग किया। बादशाही सेना खड़ी थी परन्तु उसको आज्ञा थी कि बीच में न पड़े। हिन्दुओं ने फाटक रेल दिया और युद्ध में 11 हिन्दू और 75 मुसलमान मारे गये। दूसरे दिन नासिरहुसेन नायब कोतवाल ने मुसलमानों को एक बड़ी क़बर में गड़वा दिया जिसे “गंज – शहीदाँ” कहते हैं। यह स्थल राम जन्मभूमि अधिगृहीत परिसर में स्थित था।
1855 में जब हिंदुओं ने हनुमानगढ़ी पर अधिकार कर लिया था, तब एक भीषण संघर्ष हुआ था। आज भी अयोध्या में मुस्लिम समुदाय का मानना है कि आगामी राम जन्मभूमि मंदिर से सटे पांच एकड़ का एक स्थान ‘गंज-ए-शहीदान’ है – हनुमान गढ़ी के बैरागियों द्वारा मारे गए मुसलमानों के सामूहिक दफन का स्थल है। जिसे ‘गंज शहीदा’ (शहीदों की समाधि) कहा जाता है।
मुसलमानों ने वाजिदअली शाह को अर्ज़ी दी कि हिन्दुओं ने मसजिद गिरा दी। इसके प्रतिकूल भी कुछ मुसलमानों ने अर्ज़ी भेजी। बादशाह के एक अर्ज़ी पर यह लिखा –
हम इश्क़ के बन्दे हैं
मज़हब से नहीं वाक़िफ़।
गर काबा हुआ तो क्या,
बुतखाना हुआ तो क्या ?
बादशाह ने एक कमीशन बैठाया जिसने महन्तों को जिता दिया। इस न्याय से संतुष्ट होकर लार्ड डलहौज़ी ने बादशाह को मुबारकबाद दी। परन्तु मुसलमान सन्तुष्ट न हुये और लखनऊ जिले की अमेठी के मोलवी अमीर अली ने हनूमान गढ़ी पर दूसरा धावा मारने का प्रबन्ध किया। बादशाह ने मना किया परन्तु उसने न माना और रुदौली के पास शुजागञ्ज में मारा गया। इसके पीछे बादशाह तख्त से उतार दिये गये और नवाबी का अन्त हो गया।
इस मामले की जाँच में मुसलमानों ने एक फ़रमान पेश किया था जिसमें लिखा था कि हनुमान गढ़ी के भीतर एक मसजिद है। महाराजा साहब को एक चर से यह समाचार मिला कि यह फ़रमान अवध के काजी का बनाया हुआ है और उसके पास दिल्ली के बादशाह नव्वाब शुजाउद्दौला आदि की मुहरें हैं। महराजा साहब ने काजी के, घर की तलाशी ली तो दिल्ली के बादशाहों, नव्वाब शुजाउद्दौला, नव्वाब आसफउद्दौला, नव्वाब सआदत अली खाँ और कई नाज़िमों, की मुहरें निकलीं । उन मुहरों को महाराज मानसिंह ने प्रार् साहब को सौंप दिया। प्रार् साहब ने उन मुहरों को देखा तो बनावटी फरमान पर उन्हीं में की कुछ मुहरें लगी थीं। पारसाहब ने उन मुहरों को बादशाही दरबार में भेज दिया।
इस समय यहां राजा मानसिंह शासक थे।
इसी समय में हनुमान गढ़ी विवाद हुआ था जिसका निपटारा करने पर महाराजा मानसिंह को राजे-राजगान का पद मिला हुआ था। राजा मानसिंह ने इसका पर्दाफाश करते हुए कूटनीति से विवाद को सुलझाया था। इसके कुछ दिन पीछे लखनऊ की बादशाही का अन्त हो गया और अंगरेजी राज स्थापित हुआ।
वर्तमान समय की परम्परा :-
अयोध्या के सिद्ध पीठ हनुमानगढ़ी में एक ऐसी परंपरा है, जहां के प्रमुख गद्दीनशीन किसी भी परिस्थितियों में परिसर के बाहर नहीं निकलते हैं। किसी महंत को 60 वर्ष की आयु के बाद ही गद्दीनशीन चुना जाता है। जहां प्रधानमंत्री (चार पट्टी के महंत) से लेकर राष्ट्रपति (गद्दीनशीन) का अपना कानून होता है। हनुमानगढ़ी में चार पट्टी हैं, जिसके चार महंत होते हैं और एक गद्दीनशीन यानी प्रमुख होता हैं। रामानंदी संप्रदाय के निर्माणी अखाड़े के अंतर्गत वैष्णो साधु होते हैं जो चार पट्टी में विभक्त हैं- उज्जैनिया, सागरिया, बसंती और हरिद्वारी। यह 4 महंत हनुमानगढ़ी के प्रधानमंत्री होते हैं। इनके ऊपर एक राष्ट्रपति हैं,जिसे गद्दीनशीन कहा जाता है। हनुमानगढ़ी के प्रथम गद्दीनशीन अभयरामदास महाराज थे । हनुमानगढ़ी में वर्तमान गद्दीनशीन प्रेमदास हैं, जो 51वें गद्दीनशीन पर आसीन हैं। वर्तमान समय में सगरिया पट्टी के गद्दीनशीन बनाए गए हैं।
गद्दीनशीन के चयन की प्रक्रिया:–
चार पट्टी के 3-3 लोगों का नाम अखाड़े में भेजा जाता है। अखाड़े के लोग चुनाव करते हैं कि वह व्यक्ति गद्दीनशीन बनने योग्य है या नहीं। चुनाव होने के बाद अखाड़ा पास करता है। उसके बाद बैठक होती है। बैठक में वरिष्ठ संत अखाड़े के लोग यह तय करते हैं कि कौन बनेगा गद्दीनशीन। फिर उसके बाद चुनाव होता है। तब सर्वसम्मति से गद्दीनशीन अपने आसन पर विराजमान होते हैं। गद्दीनशीन 60 वर्षों के बाद बनाए जाते हैं। जब उम्र का पड़ाव अंतिम छोर पर होता है। मोह माया तमाम चीजों से व्यक्ति दूर हो जाता है।उस समय उस व्यक्ति को गद्दीनशीन पर बैठाया जाता है ।
हनुमान जी का स्वरूप ही होते हैं गद्दीनशीन :-
हनुमानगढ़ी पंचायती अखाड़ा का मठ है। यहां महंत गद्दीनशीन की नियुक्ति गुरु-चेला की परंपरा पर आधारित नहीं होती है। इसका निर्णय पंचांयत अखाड़ा लेता है। उसी प्रकार चारों पट्टिओं के महंत की नियुक्ति भी पंचांयत अखाडे ही करते हैं। यहां पर सब को एक समान का अधिकार होता है। परंपरा के अनुसार गद्दीनशीन का पद संभालने के बाद हनुमानगढ़ी के अपने नियम और संविधान के अनुसार गद्दी नशीन महंत अपने अंतिम पड़ाव तक हनुमानगढ़ी के परिसर में ही रहता है। 52 एकड़ में फैले हनुमानगढ़ी का परिसर के बाहर गद्दीनशीन नहीं निकलता है। मृत्यु के बाद ही उनका शरीर परिसर के बाहर जा सकता है। गद्दीनशीन हनुमान जी की गद्दी मानी जाती है। ऐसे में उस पर आसीन होने वाले महंत को हनुमान जी का स्वरूप माना जाता है।उस गद्दी पर आसीन होने वाले व्यक्ति का सिर्फ एक ही काम है। वह भगवान का भजन करें और आए हुए भक्तों को आशीर्वाद दे। गद्दीनशीन प्रसिद्ध सिद्ध गद्दी है। अगर गद्दीनशीन का किसी परिस्थितियों में तबीयत या कोई आरोप- प्रत्यारोप लगता है तो डॉक्टर से लेकर कोर्ट का प्रतिनिधिमंडल भी गद्दीनशीन यानी हनुमानगढ़ी परिसर में ही आएगा। गद्दीनशीन बाहर नहीं जाएगा। महंत कि जब तक मृत्यु नहीं होती है तब तक वह गद्दी पर आसीन रहता है।