‘‘हितकारी प्रकाशन समिति, हिण्डोन सिटी द्वारा सम्मान के लिये हार्दिक धन्यवाद’’

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-मनमोहन कुमार आर्य,
ऋषि-भक्त आर्य-श्रेष्ठ श्री प्रभाकरदेव आर्य जी विगत लगभग 25 वर्षों से दुलर्भ, हितकारी एवं जीवनोन्नति के आधार आर्य साहित्य के प्रकाशन का प्रशंसनीय कार्य कर रहे हैं। आप अब तक लगभग 200 मूल्यवान ग्रन्थों का प्रकाशन कर चुके हैं जिसमें ऋषि दयानन्द के ग्रन्थों सहित पं. हरिशरण सिद्धान्तालंकार कृत चारों वेदों का हिन्दी भाष्य, आर्य विद्वानों के प्रशंसित ग्रन्थ आदि सम्मिलित हैं। आर्यसमाज में कोई ऐसा विद्वान व ऋषि भक्त नहीं है जिसने आपके द्वारा प्रकाशित ग्रन्थों से लाभ न उठाया हो। आप इसके साथ ही श्री घूडमल प्रह्लादकुमार आर्य धर्मार्थ न्यास, हिण्डोन सिटी के नाम से भी वैदिक आर्य साहित्य का प्रकाशन करते हैं। आपको वैदिकधर्म के प्रचार व प्रसार के संस्कार अपने पूज्य पिता व परिवारजनों से प्राप्त हुए हैं। आप मनसा, वाचा, कर्मणा वैदिक साहित्य के प्रकाशन व प्रचार द्वारा ऋषि ऋण को चुकाने के कार्य में जुड़े हुए हैं जो कि एक आदर्श कार्य है। हम यह भी अनुभव करते हैं कि उच्च कोटि के वैदिक साहित्य का प्रकाशन आर्यसमाज के प्रचार व अस्तित्व को बनाये रखने में रीढ़ के समान है। जब तक संसार में ऋषि दयानन्द के सत्यार्थप्रकाश आदि ग्रन्थ, वैदिक साहित्य तथा वैदिक विद्वानों के ग्रन्थ उपलब्ध हैं तब तक सभी मत-मतान्तर अप्रासंगिक बने हुए हैं। श्री प्रभाकरदेव आर्य जी इस महनीय कार्य को उत्तमता के साथ करने के लिए सभी आर्यजनों की ओर से शुभकामनाओं एवं बधाई के पात्र हैं।

श्री प्रभाकरदेव आर्य जी से हमारा परिचय व सम्पर्क सन् 1997 में हुआ था जब आपने आर्यसमाज, हिण्डोन सिटी के द्वारा वहां पं. लेखराम बलिदान शताब्दी समारोह का आयोजन किया था। आर्यसमाज के वयोवृद्ध विद्वान प्रा. राजेन्द्र जिज्ञासु जी की प्रेरणा से हमें वहां अपने कुछ मित्रों सहित सम्मिलित होने का अवसर मिला था। तभी से हम श्री प्रभाकरदेव जी के कार्यों व व्यवहार से परिचित हैं। आपके विचारों, कार्यों व व्यवहार में हमें सभी आर्योचित गुणों व देवत्व के विस्तृत रूप में दर्शन होते हैं। हम तभी से ‘श्री घूडमल प्रह्लाद कुमार आर्य धर्मार्थ न्यास’ की मासिक पत्रिका ‘वैदिक पथ’ से जुड़े हुए हैं। यह पत्रिका निरन्तर हमें प्राप्त होती आ रही है। आर्यसमाज की पत्र-पत्रिकाओं में इस पत्रिका का प्रमुख स्थान है। उच्च कोटि के आर्यसमाज के विद्वानों द्वारा इसका सम्पादन किया जाता रहा है। सम्प्रति प्रवर वैदिक विद्वान डाॅ. ज्वलन्त कुमार शास्त्री जी इसका सम्पादन कर रहे हैं। स्वाध्याय की उत्तम कोटि की सामग्री इस पत्रिका के माध्यम से हमें प्रत्येक माह प्राप्त होती है। इसके स्वाध्याय से पाठकों का ज्ञानवर्धन होता है और अनेक शंकाओं का समाधान भी होता है। हमारे मन में विचार आता है कि प्रत्येक ऋषिभक्त आर्य को ‘वैदिक पथ’ का सदस्य व पाठक बनना चाहिये। इसके लिये आजीवन वा 15 वर्ष के लिये सदस्य बना जा सकता है। इससे पाठकों की ज्ञान व स्वाध्याय में रूचि में वृद्धि होने से ज्ञानवृद्धि सहित ईश्वर, धर्म, आत्मा, समाज विषयक ज्ञान समृद्ध होगा। ऋषिभक्त आर्य प्रकाशक जो साहित्य प्रकाशित करते हैं उसे सभी ऋषि भक्तों को ज्ञान-सम्पत्ति मानकर सुरक्षित व संग्रहित रखना चाहिये। आर्यसमाज के वेद प्रचार आन्दोलन में वैदिक साहित्य के प्रकाशन व प्रचार के लिये आदरणीय श्री प्रभाकरदेव आर्य जी बधाई के पात्र हैं।

श्री प्रभाकरदेव आर्य प्रायः प्रति वर्ष आर्य विद्वानों को पुरस्कृत करते हैं। विगत कुछ वर्षों में आपने आर्यसमाज के भजन-सम्राट पं. सत्यपाल पथिक, पंतजलि योगपीठ के प्रसिद्ध आचार्य बालकृष्ण जी और आर्य विद्वान डाॅ. विनोदचन्द्र विद्यालंकार जी को सम्मानित किया है। लगभग डेढ़ माह पूर्व हमारे पास श्री प्रभाकरदेव जी का फोन आया। आपने हमें बताया कि श्रावणी पर्व से कृष्ण जन्माष्टमी तक आर्यसमाज, हिण्डौन सिटी में वेद प्रचार सप्ताह का आयोजन किया गया है। रविवार 2 सितम्बर, 2018 को इस आयोजन का समापन होना है। आपने हमें इस आयोजन में आने का निमंत्रण दिया और बताया कि 2 सितम्बर, 2018 से पूर्व तो आ ही जायें। हमारे पूछने पर आपने कहा कि 2 सितम्बर, 2018 को हमारा अभिनन्दन व सम्मान किये जाने का कार्यक्रम है। हमने अपनी स्थिति लघुता व कुछ आशंकायें स्पष्ट कीं परन्तु आपने कहा कि आपने आना है। आपकी बातों में जो अपनापन व आत्मीयता थी उसके आगे हमें नतमस्तक होना पड़ा और हम 1 सितम्बर, 2018 की सायं हिण्डौन सिटी पहुंच गये। आप अपने अनेक साथियों के साथ हमें रेलवे स्टेशन पर लेने आये और अपने न्यास के बहुंमजिले भव्य भवन में ले गये। वहां आपने बहुत आदर व प्रेमभाव के साथ हमारा सम्मान किया। इसी स्थान पर हम अपने परिवार के सदस्यों सहित दो-तीन दिनों तक रहे। इसी स्थान पर दैनिक भास्कर पत्र के एक संवाददाता आये। उन्होंने हमारा परिचय प्राप्त किया और चित्र आदि लेकर गये।

रविवार 2 सितम्बर, 2018 को प्रातः 8.00 बजे हम आर्यसमाज मन्दिर पहुंचे। यज्ञ आरम्भ हो गया था। यज्ञ वेदी पर चार युवा दम्पतियों के पुंसवन संस्कार हो रहे थे। आचार्य हरिशंकर अग्निहोत्र जी यज्ञ के ब्रह्मा थे। मन्त्रपाठ आर्य गुरुकुल वा विद्यालय की दो कन्याओं द्वारा किया जा रहा था। मंच पर एक भजनोपदेशिका बहिन प्रियंका जी उपस्थित थी। यज्ञ समाप्ति के बाद उन्होंने यज्ञ प्रार्थना एवं एक मधुर भजन गाया। आचार्य हरिशंकर अग्निहोत्री जी ने पुसंवन संस्कार के महत्व पर प्रकाश डाला। यह संस्कार श्रद्धापूर्ण वातावरण में सम्पन्न हुआ। संस्कार के समापन के बाद आचार्य हरिशंकर जी का योगेश्वर श्रीकृष्ण के जीवन की प्रासंगिकता एवं उनके महाभारत में वर्णित आप्त-पुरुष के स्वरूप तथा भागवत-पुराण की मिथ्या व अप्रामाणिक बातों पर सारगर्भित एवं प्रभावशाली व्याख्यान हुआ। इसके बाद सम्मान समारोह का आयोजन किया गया। आर्यसमाज से जुड़े अनेक महत्वपूर्ण व्यक्तियों को आर्यसमाज द्वारा सम्मानित किया गया। सम्मान समारोह का संचालन समाज के मंत्री श्री राम बाबू जी ने किया। इसी क्रम में हमारा भी सम्मान किया गया। आर्यसमाज के प्रधान श्री शान्ति स्वरूप आर्य ने हमारे सिर पर गाढ़े केसरिया रंग की पगड़ी बांधी। हमें आर्यसमाज की ओर से इक्कीस सौ रुपये की धनराशि भी भेंट की। शाल भी ओढ़ाया गया। हमें एक चित्र भेंट किया गया जिसमें महर्षि दयानन्द और लाला लाजपत अग्रवाल जी के मध्य हमारा चित्र दिया गया है और उसमें हमारा सम्मान किये जाने का उल्लेख है। हमें वैदिक साहित्य के रूप में उपनिषद-भाष्य ग्रन्थ की एक प्रति भेंट की गई तथा ऋषि दयानन्द के चित्र वाला एक स्वर्ण रंग का मैडल भी हमारे गले में पहनाया गया। प्रातः 7.30 बजे से यज्ञ आरम्भ हुआ था तथा 11.00 बज चुके थे। अतः प्रातराश के लिये आधा घंटे के लिए कार्यक्रम को रोका गया।

पूर्वान्ह 11.30 बजे कार्यक्रम पुनः आरम्भ हुआ। कार्यक्रम के आरम्भ में श्री प्रभाकरदेव आर्य जी के नेतृत्व में ‘हितकारी प्रकाशन समिति, हिण्डौन सिटी’ की ओर से हमारा सम्मान किया गया। आरम्भ में श्री प्रभाकरदेव आर्य जी ने आयर्हसमाज के विषय में एक व्याख्यान देते हुए अनेक घटनाओं का उल्लेख किया। उन्होंने हमारा सम्मान किये जाने की भूमिका और हमारे द्वारा किये जा रहे लेखन आदि कार्यों पर भी प्रकाश डाला। इसके बाद आर्यसमाज हिण्डौनसिटी एवं हितकारी प्रकाशन समिति के अनेक पदाधिकारियों, कोटा, सवाई-माधो-पुर आदि अनेक आर्यसमाजों के अधिकारियों सहित आर्यसमाज के अनेक प्रमुख लोगों ने पुष्पमालाओं से हमारा सम्मान किया। हमें शाल ओढ़ाई गई। हमें भव्य स्मृति चिन्ह के रूप में एक ट्राफी, वस्त्र एवं हमारे चित्र वाले एक भव्य प्रशस्तिपत्र को आर्यसमाज व समिति के अधिकारियों द्वारा भेंट किया गया। प्रशस्ति-पत्र में कहा गया है ‘‘आप वैदिक मान्यतानुसार सत्य के प्रचार प्रसार हेतु इण्टरनेट पर अहर्निश सक्रिय हैं। हम आपकी इस जन-कल्याणकारी वृत्ति का सम्मान करते हुए आपको ‘‘वैदिक प्रचारक’’ की मानद उपाधि से विभूषित करते हुए अपने कर्तव्य पालन का सुख अनुभव कर रहे हैं। हम आपके दीर्घ, स्वस्थ, सम्पन्न व कर्मण्य जीवन की कामना करते हैं।’’ हमें इक्कीस हजार रुपये की धनराशि भी भेंट की गई। सम्मान समारोह में लिये गये चित्रों का एक एलबम भी हमें सायं उपलब्ध कराया गया।

हमारी धर्मपत्नी श्रीमती निर्मला आर्या, पुत्र वरूण आर्य तथा अनन्त आर्य भी हमारे साथ थे। हमारी धर्मपत्नी का भी भव्य सम्मान किया गया। उन्हें भी पुष्पाहार पहनाकर, शाल ओढ़ाकर तथा वस्त्र, आभूषण, माला, एवं नगद धनराशि देकर सम्मानित किया गया। हमारे दोनों पुत्र को भी ऋषि दयानन्द जी के चित्र वाला एक स्वर्ण रंग का मैडल, वैदिक साहित्य एवं भव्य व मूल्यवान वस्त्र देकर सम्मानित किया गया। इसके बाद हमें अपने कार्यों का परिचय देने और धन्यवाद के लिये समय दिया गया। हमने आर्यसमाज के पूर्णतः भरे सभागार में अपने आर्यसमाज में प्रवेश तथा अब तक किए कार्यों का परिचय दिया। हम विगत तीस वर्षों से अधिक समय से लेखन का कार्य कर रहे हैं। विगत पांच वर्षों से हम अपवाद को छोड़कर एक लेख प्रतिदिन लिखते हैं और कई बार दो या तीन लेख भी हो जाते हैं। हमारा उद्देश्य यही होता है कि वेद, ऋषि दयानन्द और आर्यसमाज की विचारधारा को जन-जन तक पहुंचा सके। दिल्ली व इसके निकट कुछ दैनिक पत्रों में हमारे लेख प्रकाशित होते हैं, अनेक नैट साइटों पर भी हमारे लेख प्रकाशित होते हैं। आर्यसमाज की कुछ पत्रिकाओं में भी हमारे लेख विगत तीन दशकों से प्रकाशित हो रहे हैं। इसके साथ हम फेस-बुक और व्हटशप सहित व्यक्तिगत रूप से देश विदेश के शताधिक मित्रों को इन लेखों को इमेल से भेजते हैं। बहुत से मित्रों के फोन भी आते हैं। उनका शंका समाधान व उन्हें परामर्श भी देते हैं। यद्यपि इससे पूर्व भी अनेक संस्थाओं ने हमें सम्मानित किया है। श्री प्रभाकरदेव आर्य जी ने आत्मीय भावों में भरकर हमें सम्मानित किया है। उन्होंने जो सद्व्यवहार व सम्मान दिया है, उससे हम अभिभूत एवं कृतज्ञ हैं। उनका धन्यवाद करने के लिए हमारे पास शब्द नहीं हैं। हम अपनी और अपने परिवार की ओर से उनका हार्दिक धन्यवाद करते हैं। उनके माध्यम से हमारा जो सम्मान हुआ है, हम स्वयं को उसके योग्य नहीं समझते। हम पहले कर्तव्य भावना से कार्य करते थे। अब कर्तव्य के साथ हमारा दायित्व और बढ़ गया है कि हम मन, वचन व कर्म सहित प्राणपण से वेद और आर्यसमाज की विचारधारा का प्रचार प्रसार करें। हम अपने इस कर्तव्य व दायित्व का पालन करने का अपने शेष जीवन में यथासम्भव प्रयास करेंगे।

आर्यसमाज का सदस्य व ऋषि का अनुयायी बनने के बाद परमात्मा की हम पर महती कृपा रही है। उसकी कृपा से हम स्वावलम्बी बने रहे और अब भी हैं। किसी प्रकार का अभाव ईश्वर ने हमारे जीवन में नहीं होने दिया। हमारे माता-पिता का आशीर्वाद भी हम पर है। हमें पुरस्कार की जो धनराशि प्राप्त हुई है वह हमने विनम्रतापूर्वक प्रकाशन कार्यों के लिये भेंट कर दी है। श्री प्रभाकरदेव आर्य जी ने हमारे निवास व भोजन सहित सभी प्रकार की सुख सुविधाओं का ध्यान रखा व हमें किंचित भी असुविधा नहीं होने दी। हम उनका व उनके सभी पारिवारिकजनों एवं सहयोगियो ंका भी हृदय से धन्यवाद करते हैं। ईश्वर से हमारी प्रार्थना है कि वह श्री प्रभाकरदेव आर्य, उनके पारिवारिकजनों व सहयोगियों सहित आर्यसमाज हिण्डोन सिटी के सभी पदाधिकारियों एवं सदस्यों को स्वस्थ, सुखी व समृद्धि प्रदान करें। हितकारी प्रकाशन समिति सहित आर्यसमाज हिण्डौन सिटी को हमारी शुभकामनायें एवं हार्दिक धन्यवाद्।

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