स्वाधीनता दिवस पर विशेष विमर्श

अजय दण्डौतिया

बुजुर्ग लोकतांत्रिक देश के 64वें स्वाधीनता दिवस पर दिखाई दे रहे राष्ट्रीय परिदृश्य पर यह विमर्श समीचीन है कि जन गण मन अधिनायक… भारत भाग्य विधाता का संदेश क्या सच मुच बदल गया है। क्या जन और गण से पहले मन इस लोकतांत्रिक देश पर स्थापित हो चुका है ? या किए जाने की कुटिल चाल सत्ता और उसके जरूरी तंत्र मिल जुलकर चल रहे हैं। आर्थिक और सामाजिक अपराधों की रोकथाम के लिए बनाई गई एजेंसियां सत्ता के पीछे दुम हिलाकर लोकतंत्र की अवधारणा को ही रोंदने पर बुरी तरह उतारू है । जिसे देखो वो अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और असहमति के स्वरों को नियोजित करने के साथ नियंत्रित करने का षणयंत्र लोकतंत्र की आड़ में कर रहा है। यह लाइनें इसलिए प्रासंगिक हैं कि सत्ता के केन्द्र में रहने वाले एक वरिष्ठ मंत्री ने यह कहकर आपत्ति दर्ज कराई है कि लोकपाल विधेयक को लेकर अडऩे वाले अण्णा को 15 अगस्त के दिन राष्ट्र को संबोधित करने का क्या हक है? क्या वह राष्ट्रपति या प्रधानमंत्री है। उनकी संवैधानिक पदों को सामने रखकर दर्ज की गई यह आपत्ति निसंदेह शोध का विषय है। इस आपत्ति पर यह प्रश्र विचारणीय है कि क्या एक आम नागरिक को राष्ट्रीय शुचिता और राष्ट्र हित में व्यवस्था बनाने के लिए अपने विचार प्रकट करने और उन्हें राष्ट्र तक पहुंचाने का लोकतांत्रिक हक नहीं है? यदि है तो फिर आपत्ति कैसी? बहरहाल बात सिर्फ अण्णा हजारे की नहीं है बात यह है कि राष्ट्र के ज्वलंत मुद््दों में शामिल लोकपाल विधेयक, विदेशों में जमा काला धन और नोट के बदले वोट और ऐसे कई राष्ट्रीय अस्मिता के साथ खिलवाड़ करने वाले सीधे विषयों के लिए जिम्मेदार कौन है ? किसकी खलनायकी वृत्ति इन मुद्दों के मूल में है ? कौन इसके लिए पूरी तरह जिम्मेदार है ? ऐसे कई यक्ष प्रश्र हैं जो राष्ट्र को झकझोर देने वाले हैं। इनका सीधा और आसान जबाव यह है कि पक्ष और विपक्ष के नामचीन और चमकदार चेहरे ही इन विसंगतियों के लिए प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष तौर पर जिममेदार है। इनका साथ दिया है और सतत दे रही है नौकरशाही। शीर्ष स्तर पर मीडिया की भूमिका भी बाजारू से अधिक नहीं है। न्याय पालिका पहले से ही बढ़ते अपराधों और लंबित मुकदमों के बोझ से दबी हुई है। ऐसी स्थिति में लोकतंत्र के चार पायों में से तीन पुख्ता और एक लचर प्लर (मीडिया) अपनी विश्वसनीयता को दाव पर लगाकर गंवा चुकने की हद तक आरोपित हो चुके हैं। भ्रष्टाचार को शिष्टाचार के तौर पर लेकर नैतिक मूल्यों को ही पलट दिया गया है। शीर्ष पद पर पहुंचकर भ्रष्टाचार न करने वाले को वर्तमान सामाजिक परिदृश्य में उपेक्षा और चुके हुए के भाव से देखा जाता है। यह इस बुजुर्गा देश का नैतिक पतन है। इस स्थिति से जूझ रहे आम आदमी की पीड़ा और दाल रोटी न कमा पाने की पीर से किसी का कोई वास्ता नहीं है। जबकि जनतंत्र की नींव ही जन आधारित है। जनता के चुने जन प्रतिनिधि गण आम आदमी को पूरी तरह विसार चुके हैं। उसके मन की थाह लेना तो दूर सतह पर भी फोकस नहीं किया जा रहा है। बढ़ती महंगाई और उसके मूल में जिम्मेदार राजनैतिक, प्रशासनिक और नैतिक कारणों पर गौर करने का साहस किसी में नहीं है। ऐसी स्थिति में सब दूर राष्ट्रीय सम्पदा को नोंचने, खसोटने के साथ-साथ उसकी अस्मिता को लूट लेने का भी अपराधिक दौर शुरू हो चुका है। इस दौर में राष्ट्र को ठेंगे पर रखकर राष्ट्र हित को निगल जाने वाले विलोमार्थियों की सूची में जन तंत्र के चारों सडे हुए तंत्र ही उंगलियों पर गिने जा चुके हैं, गिने जा रहे हैं। किसी भी ज्वलंत समस्या पर आम आदमी की चूक कहीं से कहीं तक नहीं है। सारी विसंगतियों और विडंबनाओं के लिए विशेष अधिकारों से सुसज्जित विशिष्टता और उसके पर्याय बने चेहरे ही जिम्मेदार हैं, ऐसी स्थिति में अण्णा हजारे का अलख जगाना निसंदेह भयंकर तिमिर में एक आशा की किरण है। जबकि इस सुखद पहलू का दुर्भाग्य यह भी है कि योगाचार्य की बुरी गत सत्ता के मद में चूर नौकरशाही और जन प्रतिनिधियों के अपवित्र गठबंधन ने बना डाली है। अण्णा हजारे को भी बहुत कुछ भुगतने की चेतावनी खुलेआम दी जा रही है। मामला संगीन है और सरकार की नजर में स्थिति तनावपूर्ण लेकिन नियंत्रण में है।

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