‘हिन्द की चादर’ गुरू तेग बहादुर

गुरू तेग बहादुर शहीदी दिवस (24 नवम्बर) पर विशेष

योगेश कुमार गोयल

            एक अप्रैल 1621 को अमृतसर में गुरू हरगोबिन्द साहिब के घर माता नानकी जी की कोख से जन्मे गुरू तेग बहादुर सिख धर्म के नवें गुरू हैं, जिन्होंने सदैव कट्टरता का विरोध और साम्प्रदायिकता के विरूद्ध संघर्ष किया। धार्मिक स्वतंत्रता के समर्थक रहे गुरू तेगबहादुर की शहादत को प्रतिवर्ष 24 नवम्बर को ‘गुरू तेग बहादुर शहीदी दिवस’ के रूप में मनाया जाता है। प्रेम, त्याग और बलिदान के प्रतीक गुरू तेग बहादुर को ‘हिन्द दी चादर’ अथवा ‘भारत की ढ़ाल’ भी कहा जाता है क्योंकि उन्होंने हिन्दू धर्म की रक्षा के लिए अपना सब कुछ और यहां तक कि अपना जीवन भी न्यौछावर कर दिया था। धार्मिक सद्भाव के पक्षधर गुरू तेगबहादुर ने धर्म तथा लोक की सेवा के लिए स्वयं को समर्पित कर दिया था। वे एक ऐसे सद्भावी और धर्म के प्रति समर्पित संत थे, जिन्होंने कट्टरता के समक्ष झुकने से इनकार कर दिया था। इसी कट्टरता ने 24 नवम्बर 1675 को ऐसा काला इतिहास लिख डाला, जिसे पूरी दुनिया कभी विस्मृत नहीं कर सकेगी।

            गुरू तेग बहादुर ने धर्म के सत्य ज्ञान के प्रचार-प्रसार एवं लोक कल्याणकारी कार्यों के लिए कई स्थानों का भ्रमण किया और लोगों को संयम तथा सहज मार्ग का पाठ पढ़ाते हुए धर्म के सत्य मार्ग पर चलने का उपदेश देते हुए आध्यात्मिक स्तर पर धर्म का सच्चा ज्ञान भी दिया तथा सामाजिक स्तर पर चली आ रही रूढि़यों, अंधविश्वासों की कटु आलोचना कर नए सहज जनकल्याणकारी आदर्श स्थापित किए। उन्होंने कुएं खुदवाना, धर्मशालाएं बनवाना तथा अन्य लोक परोपकारी कार्य कराकर लोगों के आध्यात्मिक, सामाजिक व आर्थिक उन्नयन के लिए भी अनेक रचनात्मक कार्य किए। वे सदैव सिखों के प्रथम गुरू रहे गुरू नानक देव द्वारा बतलाए गए मार्ग का अनुसरण करते रहे। उनकी गिनती मानवीय धर्म, वैचारिक स्वतंत्रता एवं आदर्शों के लिए शहीद होने वाले महापुरूष तथा क्रांतिकारी युगपुरूष के रूप में होती रही है। उन्होंने कश्मीरी पंडितों तथा अन्य हिन्दुओं को बलपूर्वक मुसलमान बनाने का प्रबल विरोध किया।

            वह ऐसा समय था, जब पूरी कट्टरता और निर्ममता के साथ इस्लाम धर्म का प्रचार-प्रसार किया जा रहा था और खून की नदियां बहाकर लोगों को धर्म परिवर्तन करने के लिए विवश किया जा रहा था। गुरू तेगबहादुर ने लोगों को धर्म परिवर्तन से बचाने के लिए उन्हें प्रेरित करने का कार्य किया और उनकी लगातार बढ़ती लोकप्रियता तथा धर्म परिवर्तन की राह में रोड़ा बनने के कारण वे कट्टर मौलानाओं की आंखों में खटकने लगे थे। नतीजा यह हुआ कि तत्कालीन मुगल शासक औरंगजेब ने उन्हें तरह-तरह से परेशान करना शुरू कर दिया। इसी उद्देश्य से गुरू तेगबहादुर के कई करीबी सेवादारों को बड़ी ही निमर्मता से मरवा दिया गया। गुरू जी की आंखों के सामने ही उनके प्रिय सेवादार भाई मतीदास को बोटी-बोटी काट दी गई, भाई दयालदास को खौलते पानी के कड़ाह में फैंककर बड़ी दर्दनाक मौत दी गई, भाई सतीदास को कपास में लपेटकर जिंदा जला दिया गया।

            मुगल शासक औरंगजेब का इतना अत्याचार झेलने के बाद भी गुरू तेगबहादुर अपने इरादों में टस से मस नहीं हुए और उन्होंने औरंगजेब द्वारा अपनाए गए दबाव के तमाम क्रूरतम तरीकों के बावजूद इस्लाम धर्म को अपनाने से इन्कार कर दिया था। अंततः औरंगजेब ने गुरू तेग बहादुर को मौत की सजा सुनाई और उसने सबके सामने उनका सिर कलम करवा दिया। क्रूर शासक औरंगजेब के फरमान पर दिल्ली के चांदनी चौक में काजी ने फतवा पढ़ा और जल्लाद जलालदीन ने तलवार से तेग बहादुर का शीश धड़ से अलग कर दिया। इस तरह धर्म, मानवीय मूल्यों, आदर्शों तथा सिद्धांतों की रक्षा के लिए अपने प्राणों की आहुति देने वाले गुरू तेग बहादुर का विश्व इतिहास में अद्वितीय स्थान रहा हैं।

            दिल्ली में स्थित गुरूद्वारा शीश गंज साहिब और गुरूद्वारा रकाब गंज साहिब उन स्थानों की याद दिलाते हैं, जहां गुरू तेग बहादुर की निर्मम हत्या की गई। जिस जगह उन्हें शहीद किया गया था, दिल्ली में चांदनी चौक के पास उसी जगह पर अब गुरूद्वारा शीशगंज साहिब है और जिस स्थान पर उनका अंतिम संस्कार हुआ था, वहां पर गुरूद्वारा रकाब गंज साहिब है। 54 वर्ष की आयु में गुरू तेगबहादुर की असमय शहादत ने सिख धर्म को भी पूरी तरह से बदल दिया क्योंकि उसी घटनाक्रम के बाद अपनी रक्षा के प्रति सिख समुदाय पहले से ज्यादा सजग हुआ और कट्टर मुस्लिमों का कहर थोड़ा कम हुआ। उनकी शहादत के बाद उनके नौ वर्षीय पुत्र को गद्दी दी गई, जिसने आगे चलकर सिख धर्म की धारा को बदलकर रख दिया। गुरू तेगबहादुर का यह पुत्र खालसा पंथ का संस्थापक और सिखों का दसवां गुरू बना। गुरू गोबिंद सिंह ही गुरू तेगबहादुर के वह पुत्र थे, जिन्होंने साबित कर दिया कि सिख कमजोर नहीं हैं।

            गुरू तेगबहादुर निर्भय आचरण, धार्मिक अडिगता और नैतिक उदारता का सर्वश्रेष्ठ उदाहरण रहे हैं। वे मानवीय धर्म एवं वैचारिक स्वतंत्रता के लिए शहादत देने वाले एक क्रांतिकारी युगपुरूष थे। गुरूग्रंथ साहिब में उनका योगदान अतुलनीय है। उनके द्वारा रचित 116 शबद गुरू ग्रंथ साहिब में शामिल किए गए, जिनमें से एक है:-

साधो कउन जुगति अब कीजै।

जा ते दुरमति सगल बिनासै राम भगति मनु भीजै।

मनु माइआ महि उरझि रहिओ है बूझै नह कछु गिआना।

            धर्म की रक्षा हेतु उनके बलिदान का उल्लेख करते हुए सिख ग्रंथों में कहा गया है:-

धरम हेत साका जिनि कीआ, सीस दीआ पर सिरड न दीआ।

            अपने पिता गुरू तेगबहादुर के अद्वितीय बलिदान के बारे में गुरू गोबिंद सिंह जी ने लिखा:-

तिलक जं×ाू राखा प्रभ ताका। कीनो बडो कलू महि साका।।

साधन हेति इती जिनि करी। सीसु दीया परु सी न उचरी।।

धरम हेत साका जिनि कीआ। सीसु दीआ परु सिररु न दीआ।।

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