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    हिन्दी भाषा और भारतीय परम्पराएँ

    आजकल पूरी दुनिया कोरोना वाइरस से लड़ रही है और लाखो जाने जा चुकी हैं हमारा देश भी कोविड से बुरी तरह प्रभावित है पर अगर हम मृत्यु दर की तुलना अन्य देशो से करें तो सायद हम अन्य पश्चिमी देशो से बेहतर स्थिति मे हैं और उसके लिए हम कह सकते हैं की इसमे हमारा रहन सहन और खान पान हमे मदद कर रहा है तथा दूसरे देश भी अब हमारे कुछ कल्चर को अपना रहे हैं।   

    कहने का मतलब की जो देश अब तक हमारी प्रथावों हमारे कल्चर की खिल्ली उड़ाते थे वो अब खुद भी उसे अपना रहे हैं जो उन्हे भी कोरोना से लड़ने मे मदद कर रहा है आज पूरी दुनिया ने हाथ मिलाना बंद करके नमस्ते करना शुरू कर दिया है, योग को तो पहले से ही अपना ही लिया था, शाकाहार का चलन भी बढ़ रहा है, हमारे जैन मुनियों द्वारा अपनाया जाने वाला मास्क आज ग्लोबल बन गया है।  

    इसके अलावा कोरोना से लड़ने मे लगभग सभी डाक्टर ये मान रहे हैं की हमे अपनी इम्यूनिटी बूस्ट करने की जरूरत है और इसमे जो चीजें हेल्प कर रही हैं वो हमारे रूटीन भोजन का हिस्सा रही है जैसे लहसुन, अदरक, हल्दी, नीबू, दूध, दही, तुलसी आदि, सायद यही कारण है की कोरोना मरीजो की इतनी बड़ी संख्या हो जाने के बाद भी हमारे देश का डेथ रेट अन्य पश्चिमी देशो की तुलना मे बहुत कम है जबकि कोरोना पेसेंट के मामले मे हम दूसरे नंबर पर पहुँच गए हैं अर्थात हमारी परम्पराएँ कितनी समृद्ध रही हैं और हमारे पूर्वजो और ऋषियों मुनियों के अनुभव कितने सार्थक रहे हैं वो सबके सामने है।

    लेकिन आज हमारे ही देश मे एक ऐसा वर्ग भी है जो अपनी हर चीज मे कमिया ही ढूँढता है और उसकी हंसी उड़ाता है जबकि वही चीजें जब वापस वेस्टर्न या अमरीका से रिटर्न होकर आती हैं तो उसे अपनाने मे प्राउड फील करता है

    जैसे आज के कुछ दशक पहले तक गांवो मे पहने जाने वाले सूती कपड़ो को पिछड़ेपन की निशानी माना जाता रहा है और लोगों को टेरीलीन और पोलिस्टर पहनने की सलाह दी जाती थी जबकि सूती कपड़े की अपनी खूबिया थी वो एकतरह से प्राकृतिक एयर कंडीशन था,  अब जब वही सूती कपड़ा वेस्टर्न कंटरीज से काटन बन कर लौटा है तो लोग उसे दुगने – तिगुने दामो मे खरीदते हैं और बड़े गर्व से बताते हैं की ये काटन है। कुछ दशक पहले तक जब खेतों मे किसान अन्न उत्पादन मे गोबर का इस्तेमाल करता था तो उसकी हंसी उड़ाई जाती थी और उसे यूरिया के इस्तेमाल की सलाह दी जाती थी आज जब यूरिया का ड्रा बैक सामने आया लोगों मे बीमारिया बढ्ने लगीं तो लोग ओर्गेनिक फूड की तरफ भाग रहे हैं जो इसी देशी गोबर की खाद की मदद से उगाया जाता है पर अब वो ओर्गेनिक फूड इतना महंगा हो गया है की सब उसे खरीद भी नहीं सकते।

    हमारे पूर्वजो ने हमे हरे पेड़ो को काटने से मना किया और इसे धर्म विरुद्ध बताया साथ ही इसका दृढ़ता से पालन करवाने  के लिए कुछ अतिलाभकारी वृक्षो की पूजा करना सिखाया तो हमे अंधविश्वासी कहा जाने लगा, जबकि अब सब सेव अर्थ डू प्लांटेशन तथा गो ग्रीन का नारा दे रहे हैं। 

    इसीतरह हमारी जिस संस्कृत भाषा पर विदेशों मे रिसर्चें हो रहीं हैं और बड़ी बड़ी यूनिवर्सिटी मे संस्कृत की क्लासें चल रही हैं वो हमारे देश से लगभग गायब होने की स्थिति मे पहुँच चुकी है क्योंकि यहाँ हमारी उदासीनता या कहें की पश्चिम का अंधानुकरण करने की वजह से जादातर गुरुकुल बंद हो गए और संस्कृत को सिर्फ मंदिरो और शादी व्याह तक सीमित कर दिया गया जबकि संस्कृत विश्व की न सिर्फ प्राचीनतम भाषा रही है बल्कि साहित्य से लेकर ज्ञान विज्ञान की अनेकों पुस्तकें इसी भाषा मे मौजूद रही हैं,

    यही हाल संस्कृत से ही जन्मी हिन्दी का है जो सौभाग्य से दुनिया की तीसरी सबसे जादा बोली जाने वाली भाषा तो है पर हमारी उदासीनता और हीनभावना की वजह से आज ये एक साइंटिफिक और समृध भाषा होते हुये भी आधुनिक शिक्षा की भाषा नहीं बन पा रही जबकि अगर अँग्रेजी से इसके व्याकरण इसकी शब्द संरचना, उच्चारण की तुलना करें तो इंग्लिश इसके सामने कहीं नहीं टिकती, पर आज हमे इसको बचाने के लिए साल मे एक दिन हिन्दी दिवस के रूप मे मनाना पड़ रहा है।

    हमे बचपन से ही बताया जाता है इंगलिश सीखो वरना जॉब मिलने मे दिक्कत होगी आगे बढ्ने मे दिक्कत होगी और वो होती भी है क्योंकि हमारे देश मे इंगलिश बोलना ही शिक्षित होना मान लिया गया है, जिससे कितनी प्रतिभाओं को अपनी प्रतिभा साबित करने का मौका ही नहीं मिल पाता जबकि मै जिस बहुराष्ट्रीय जापानी कंपनी मे कार्यरत हूँ उसके बड़े बड़े पदों पर बैठे जापानियों की इंगलिश बहुत अच्छी नहीं है और वो इसे लेकर खुलकर बोलते भी हैं कि “माय इंग्लिश इज नाट गुड सो प्लीज स्पीक वेरी स्लोली” उन्हे अपनी टीम के जूनियर मेंबर्स के सामने भी ऐसा कहने मे जरा सा संकोच नहीं होता और वो आपस मे सदा जापानी मे ही बात करते हैं ये उनका राष्ट्रवाद है, पर कोई भी भारतीय कर्मचारी भले ही वो जूनियर ही हो और जिसकी इंग्लिश सचमुच कमजोर भी होती है ऐसा कहने की सोच भी नहीं सकता क्योंकि ऐसा कहते ही उसकी सारी योग्यता जापानी नहीं बल्कि भारतीय कर्मचारियों की नजर मे संदेह के घेरे मे आ जाएगी।

    मेरी कंपनी के कुछ साथी प्रोजेक्ट वर्क के लिए टर्की जाते रहते हैं और वो बताते हैं की टर्किश लोग अपनी भाषा मे ही बात करते हैं और इंग्लिश समझने के लिए इंटरर्प्रेटर (दुभाषिया) रखते हैं जो एक यूरोपियन देश है पर हम अंग्रेज़ो से इतनी दूर हैं हमारी अपनी एक समृद्ध भाषा भी है फिर भी हम लोगों मे इंग्लिश के लिए जिसतरह का पागलपन है वो हमे आगे बढ़ाने की बजाय पीछे कर रहा है।

    भारत ने पिछले दिनो चीन के लगभग ढाई तीन सौ मोबाइल एप बैन कर दिये हैं पर आखिर क्या हमने कभी सोचा की जो चीन एक बंद देश है जहां मंदारिन के अलावा कोई और भाषा चलती ही नहीं वह नयी तकनीकी मे इतना आगे कैसे निकल गया? चीन ने अमेरिका का फेसबुक वाटसप गूगल सब बैन कर रखा है पर ऐसा नहीं की वो ये सब बंद करके किसी आदिम युग मे चले गए बल्कि ये सब बैन करके उन्होने अपने विकल्प पैदा किए और वही विकल्प दुनियाभर मे फैला रहे हैं, वो ऐसा कर सके क्योंकि उनके यहाँ सारी रिसरचें उनकी अपनी भाषा मे होती हैं उनकी सारी किताबें उनकी अपनी भाषा मे उपलब्ध हैं।

    सवाल ये है की दुनिया की सबसे अच्छी अँग्रेजी बोलने वालों मे शामिल भारत मे ऐसा कुछ क्यों नहीं हुआ मेरा मानना है की इसकी बड़ी वजह अँग्रेजी ही रही है क्योंकि हमारे देश मे विद्वान उसे ही मान लिया जाता है जो अच्छी अंग्रेसी बोलता है, जिसे अँग्रेजी नहीं आती या कम आती है वो खुद को और अपने इनोवेटिव विचारों को लेकर अक्सर हीनभावना का शिकार रहता है और उसे पब्लिकली व्यक्त करने से भी बचता है। शायद यही सब कारण रहे हैं जो हमारे देश की सारी साफ्टवेयर क्रान्ति भी ठेके पर नौकरी करनेवाली ही है जहां अच्छी अँग्रेजी बोलने वाले तो मिलेंगे पर इनोवेशन मे सब जीरो हैं, हमारे यहाँ टीसीएस, इन्फोसिस, विप्रो जैसी कंपनियाँ तो बनी पर एक ऐसा सॉफ्टवेयर न बन पाया जो दुनिया मे भारत की पहचान बन पाता जबकि कहने को हम आई॰ टी॰ मे सुपर पावर हैं पर इस्तेमाल ओरेकल, सैप, फेसबुक, वाट्सअप, माइक्रोसॉफ्ट आदि का ही करते हैं।        

    हमारे देश मे विद्यार्थियों का सारा ज़ोर ज्ञान प्राप्त करने से जादा इंग्लिश भाषा सीखने पर होता है, क्योंकि उसे समाज मे घर मे हर जगह इंग्लिश का माहौल तो मिलता नहीं इसलिए आसानी से सीखी जाने वाली ये भाषा उसके लिए चैलेंज बन जाती है और वो अपना सारा ज़ोर किसी इनोवेशन मे लगाने के बजाय इसी मे लगाए रहता है, और जो 2-4% सम्पन्न परिवारों के बच्चे अच्छे इंग्लिश मीडियम स्कूलों मे पढ़ते हैं और इंग्लिश के साथ नॉलेज भी गेन करते हैं उनमे से अधिकतर विदेशो मे जॉब करने चले जातें है जिससे हमारे देश मे प्रतिभावों की कमी हो गयी है और हमारा देश आजादी के इतने सालों बाद भी विकासशील देशों की कतार मे खड़ा है जबकि अंग्रेज़ो के आने से पहले 17वीं सदी तक भारत दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यस्था और विश्व का सबसे धनी देश था हमने जो भी इन्वेन्शन किए हैं जैसे जीरो, दशमलव, वो सब सदियों पहले जब हम पढ़ाई अपनी भाषा मे करते थे हमारा पांचांग जो हजारो वर्षो से सूर्यग्रहण, चंद्रग्रहण तथा ग्रह नक्षत्रों की सटीक जानकारी बिना किसी नासा या इसरो की सहायता से देता आ रहा है वो इंग्लिश मे नहीं संस्कृत मे है।  

    दुनिया के छोटे छोटे देश भी अपनी भाषाओं और संस्कृतियों पर गर्व करते हैं पर हम उसपर तभी गर्व कर पाते हैं जब वो पश्चिमी देशो से सर्टिफाइड होकर आती है। इसका नुकसान ये होता है की हमारे हजारों साल पुराने शास्त्रों मे उल्लेखित नीम, हल्दी जैसी वस्तुओं का पेटेंट अमरीका करवा लेता है और हम कुछ नहीं कर पाते क्योंकि हम उन सभी चीजों को बेकार समझते हैं जो हमारे पास है,

    ये ऐसी स्थिति है की जैसे हमारे पास एप्पल का आई फोन पहले से ही मौजूद हो और उसकी बुराइयां गिनवाकर कुछ चतुर लोगो ने उसे हमसे फिकवा दिया और हमे नोकिया का बेसिक फोन पकड़ा गए, बाद मे उस आईफोन को खुद ले जाकर उसमे थोड़ा बदलाव करके उसका नाम बदलकर हमे महंगे दामों मे फिर से बेच रहे हैं, जैसे कोयले, नमक, नीम, बबूल आदि की खिल्ली उड़ाने और इससे दाँतो की सतह खराब होने का दावा करने वाला कॉलगेट अब पूछता है! क्या आपके टूथपेस्ट मे नमक है? और नीम, बबूल तथा कॉलगेट वेदशक्ति के नाम से अपने प्रॉडक्ट लांच कर रहा है। 

    आज के बोर्डिंग स्कूल भी बिलकुल हमारे गुरुकुल के जैसी पद्धति पर आधारित हैं जहां बच्चो को परिवार से दूर रख कर शिक्षा दी जाती है अंतर सिर्फ इतना है की यहाँ पर बच्चों को आधुनिक शिक्षा तो दी जाती है पर भारतीय संस्कारो से दूर किया जाता है साथ ही यहाँ शिक्षा मुफ्त नहीं बल्कि एक बिजनेस है

    अतः अब समय आ गया है की हम अपनी गलतियों से सीखें और अपनी परम्पराओ अपनी पुरानी जीवन पद्धति से सीखते हुये आधुनिकता की ओर बढ़ें और जहां तक संभव हो हिन्दी भाषा मे संवाद करें जिससे एक दूसरे से बात करने मे न सिर्फ सहजता तथा अपनेपन का अनुभव हो बल्कि अपनी भावनाए भी सेयर कर सकें।

    इंग्लिश भाषा की जानकारी होना अच्छी बात है पर इसमे कमजोर होना कोई शर्मिंदगी की बात नहीं हाँ अगर हम हिन्दी मे कमजोर हों तो वो जरूर हमारे लिए शर्मिंदगी वाली बात होनी चाहिए, और जो गैर हिन्दी भाषी राज्यों के लोग हिन्दी का विरोध करते हैं उन्हे भी समझना होगा की उनके राज्य की भाषा तो सम्पूर्ण राष्ट्र की भाषा बन नहीं सकती क्योंकि वो एक निश्चित क्षेत्र और आबादी मे ही प्रचलित है तो क्यों न देश के 44% लोगों की मातृभाषा तथा लगभग 70% से ऊपर की आबादी द्वारा बोली समझी जाने वाली अपने ही देश की भाषा हिन्दी को सर्वमान्य रूप से स्वीकार किया जाय आखिर हमे इतिहास से सीखना चाहिए की कैसे हमारे राजे रजवाड़े आपस मे अपने अहंकार के कारण लड़ते रह गए और देश गुलाम होता चला गया हम सदियों बाद आजाद तो हुये पर मानसिक गुलामी अँग्रेजी के माध्यम से आज भी जारी है जिससे जल्द से जल्द छुटकारा पाना होगा।

    मुकेश चन्द्र मिश्रा

    मुकेश चन्‍द्र मिश्र
    मुकेश चन्‍द्र मिश्रhttps://www.facebook.com/mukesh.cm
    उत्तर प्रदेश के प्रतापगढ़ जिले में जन्‍म। बचपन से ही राष्ट्रहित से जुड़े क्रियाकलापों में सक्रिय भागेदारी। सांस्कृतिक राष्ट्रवाद और देश के वर्तमान राजनीतिक तथा सामाजिक हालात पर लेखन। वर्तमान में पैनासोनिक ग्रुप में कार्यरत। सम्पर्क: mukesh.cmishra@rediffmail.com https://www.facebook.com/mukesh.cm

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