प्रवक्ता न्यूज़

हिंदी साहित्य: टूटी हुई विरासत, मैकाले की छाया और आधुनिक गद्य का सच

हर साल चौदह सितंबर आते ही सरकारी दफ्तरों, स्कूलों और मंचों पर हिंदी के समर्थन में औपचारिकता के फूल चढ़ाए जाते हैं। गोष्ठियाँ होती हैं, स्मारिकाएँ छपती हैं और भाषा की प्रगति के दावे किए जाते हैं। लेकिन हिंदी दिवस का यह दिन सिर्फ जश्न मनाने का नहीं, बल्कि एक गहरे ऐतिहासिक आत्ममंथन का है। जब हम हिंदी साहित्य के पूरे सफर को देखते हैं, तो एक कड़वा सवाल सामने आता है—क्या आधुनिक हिंदी साहित्य वाकई उस प्राचीन, संप्रभु और ज्ञानवान भारत का पूरा अक्स दिखा पाता है, जिसके हम वारिस होने का दावा करते हैं?
इस सवाल का जवाब तलाशने के लिए हमें इतिहास की उन परतों को पलटना होगा, जहाँ हमारी साहित्यिक निरंतरता की नाल को एक सुनियोजित साजिश के तहत काटा गया था।
मैकाले की छाया और व्यवस्था का कायाकल्प
प्राचीन भारत में नालंदा, तक्षशिला से लेकर देश के कोने-कोने में ज्ञान-विज्ञान और दर्शन की भाषा संस्कृत और प्राकृत थी। यह केवल राजाओं के दरबार की भाषा नहीं थी, बल्कि इस उपमहाद्वीप के बौद्धिक उत्थान का मेरुदंड थी। लेकिन विदेशी आक्रमणों के साथ यह व्यवस्था चरमराने लगी। दिल्ली सल्तनत और मुगल काल में फारसी राजकाज की भाषा बन गई, जिससे जनभाषाओं और उच्च सत्ता के बीच एक चौड़ी खाई खिंच गई।
यह दरार तब और गहरी और स्थाई हो गई जब 1835 में लॉर्ड मैकाले ने अपनी प्रसिद्ध शिक्षा नीति (Macaulay’s Minute) लागू की। मैकाले का उद्देश्य स्पष्ट था—एक ऐसा वर्ग तैयार करना जो “रंग और खून से भारतीय हो, लेकिन रुचि, विचारों और बुद्धि से अंग्रेज हो।” पारंपरिक गुरुकुलों, पाठशालाओं और अनुदान प्राप्त संस्थाओं की रीढ़ तोड़ दी गई। संस्कृत और देसी विधाओं को राज्य का संरक्षण मिलना बंद हो गया। नतीजा यह हुआ कि सदियों पुरानी भारतीय बौद्धिक परंपरा और जनजीवन के बीच का सेतु ढह गया। आम जनता अपनी ही जमीन पर वैचारिक रूप से बेगाना होती चली गई।
भक्ति काल का संघर्ष और गद्य का शून्य
यह सच है कि मध्यकाल में जब संस्कृत का दरबारों से पतन हुआ, तब कबीर, सूर, तुलसी, मीरा और जायसी जैसे संतों ने अवधी और ब्रजभाषा के जरिए साहित्य को गलियारों से निकालकर जन-जन की चौपाल तक पहुँचा दिया। वह हिंदी साहित्य का स्वर्णकाल था। लेकिन वह मुख्य रूप से काव्य और संगीत का दौर था।
जब 19वीं सदी के उत्तरार्ध में आधुनिक मानक हिंदी (खड़ी बोली) गद्य के रूप में आकार ले रही थी, तब हमारे पास कोई सतत, अटूट गद्य परंपरा नहीं थी। आधुनिक जीवन, विज्ञान, राजनीति और प्रशासन के लिए जिस व्यावहारिक गद्य की जरूरत होती है, वह पूरी तरह गायब था।
खड़ी बोली गद्य का जन्म: फोर्ट विलियम कॉलेज से भारतेंदु युग तक
इस ऐतिहासिक और वैचारिक विच्छेदन के बीच यह समझना भी जरूरी है कि आधुनिक हिंदी गद्य का जन्म कब और कैसे हुआ। मध्यकाल तक हिंदी साहित्य पूरी तरह काव्य, छंद और पद्यों (मुख्य रूप से ब्रज और अवधी) में बंधा हुआ था। गद्य का स्वतंत्र रूप से उपयोग बहुत सीमित था।
आधुनिक मानक हिंदी (खड़ी बोली) गद्य के निर्माण की विधिवत शुरुआत 19वीं सदी के प्रारंभ में हुई। जब ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी को अपने प्रशासन और न्याय व्यवस्था के संचालन के लिए ऐसी भाषा की जरूरत पड़ी जिसे आम लोग समझ सकें, तब फोर्ट विलियम कॉलेज, कलकत्ता (1800) की स्थापना हुई। यहाँ जॉन गिलक्राइस्ट के संरक्षण में लेखकों ने गद्य लेखन की शुरुआत की। लल्लूलाल (प्रेमसागर), सदल मिश्र (नासिकेतोपाख्यान), इंशाअल्लाह खाँ (रानी केतकी की कहानी) और मुंशी सदासुख लाल ने गद्य की पाठ्यपुस्तकें तैयार कीं। यह खड़ी बोली गद्य का शैशवकाल था, जो अभी अपनी दिशा तलाश रहा था।
इसके बाद, 19वीं सदी के उत्तरार्ध में भारतेंदु हरिश्चंद्र ने इस बिखरे हुए गद्य को अपनी ओजस्वी लेखनी, नाटकों और पत्रकारिता के माध्यम से एक जीवंत मंच प्रदान किया। बाद में महावीर प्रसाद द्विवेदी ने ‘सरस्वती’ पत्रिका के जरिए इसके व्याकरण को अनुशासन और मानकीकरण दिया।
गुलामी के मलबे से जन्मी आधुनिक हिंदी
यहीं से आधुनिक हिंदी साहित्य की वह विडंबना शुरू होती है जो दुनिया की दूसरी बड़ी भाषाओं से बिल्कुल अलग है। जब अंग्रेजी, फ्रेंच या जर्मन गद्य विकसित हो रहा था, तब उनके देश दुनिया भर में साम्राज्य फैला रहे थे, औद्योगिक क्रांति देख रहे थे और आत्मसम्मान के शिखर पर थे। उनकी शुरुआती कृतियों में रोमांच, वैभव और महलों की कहानियां थीं।
इसके विपरीत, आधुनिक हिंदी गद्य का जन्म तब हुआ जब भारत अपने इतिहास के सबसे दुर्बल, आहत और विपन्न दौर से गुजर रहा था। भूख, अकाल, कर्ज के दलदल में धंसे किसान और औपनिवेशिक शोषण के बीच जब आधुनिक हिंदी ने अपने पैर जमाने शुरू किए, तो उसकी शुरुआती आलमारियाँ वैभव की नहीं, बल्कि वेदना की कहानियों से भर गईं।
मुंशी प्रेमचंद का गोदान, कफन का ‘घीसू-माधव’ या भारतेंदु का नाटक भारत दुर्दशा—आधुनिक हिंदी का जो सबसे पुराना और मजबूत गद्य ढांचा है, वह किसी दिग्विजयी राष्ट्र का गौरवगान नहीं करता। वह एक टूटी हुई, भूखी और गुलाम जनता के आत्मरक्षा संघर्ष का दस्तावेज है। जब हमारे लेखकों ने अतीत को याद भी किया, तो वह एक गहरी कसक या विलाप बनकर उभरा—मैथिलीशरण गुप्त की यह पंक्ति इसका जीवंत प्रमाण है: “हम क्या थे, क्या हो गए हैं और क्या होंगे अभी, आओ विचारें आज मिलकर ये समस्याएं सभी।”
आज की जरूरत: अतीत के रोने से बाहर निकलना
हिंदी दिवस पर हमें यह स्वीकार करना होगा कि आधुनिक हिंदी साहित्य अपनी जड़ों में उस घायल भारत की संतान है, जिसे मैकाले की नीतियों और विदेशी शासन ने सदियों पीछे धकेल दिया था। हमारे पास अपनी प्राचीन बौद्धिक और वैज्ञानिक विरासत के सीधे और जीवंत गद्य का अभाव हमेशा खलता है।
आज जब हम एक स्वतंत्र और सशक्त भारत में सांस ले रहे हैं, तो हिंदी का दायित्व केवल सरकारी कागजों तक सीमित रहना नहीं होना चाहिए। हमें आधुनिक हिंदी को केवल गरीबी, पीड़ा और संघर्ष की अनुगूंज तक सीमित रखने के बजाय, उस प्राचीन और निर्भीक भारतीय दृष्टि से जोड़ना होगा जो विज्ञान, दर्शन और सार्वभौमिक कल्याण के शिखर पर थी। हिंदी तभी सचमुच समृद्ध होगी जब वह केवल आंसुओं का गद्य न बनकर, भविष्य के निर्माण का आत्मविश्वास बने।

डॉ. राजपाल शर्मा