राजनीति

जब विपक्ष ने मुद्दों की जगह मीनू चुन लिया

ब्रिक्स की मेज पर दुनिया बैठी थी लेकिन विपक्ष की नजर थाली पर थी।

भारत में आयोजित ब्रिक्स सम्मेलन के आधिकारिक रात्रिभोज में विदेशी मेहमानों को शाकाहारी भारतीय व्यंजन परोसे गए। खांडवी, मशरूम गलौटी, पनीर लबाबदार, गुच्छी मार्मिक, बाजरे का पुलाव, बीटरूट रायता और पारंपरिक भारतीय मिठाइयों से सजा यह मेन्यू भारत की समृद्ध शाकाहारी पाक-परंपरा का प्रदर्शन था। लेकिन मेहमानों की मेज से उठकर यह मेन्यू सीधे भारतीय राजनीति की मेज पर पहुंच गया।

कांग्रेस ने सवाल उठाया कि जब भारत में अधिकांश लोग मांसाहारी हैं, तो विदेशी मेहमानों के सामने केवल शाकाहारी व्यंजन क्यों परोसे गए। राहुल गांधी की ओर से 80 प्रतिशत भारतीयों के मांसाहारी होने का दावा भी सामने आया और सरकार पर खान-पान की पसंद थोपने का आरोप लगाया गया। अब प्रश्न यह नहीं है कि किसी को शाकाहारी भोजन पसंद है या नहीं।

प्रश्न यह है कि न तो ब्रिक्स का मंच कोई पारिवारिक डिनर का मंच है और न ही राजकीय भोज का उद्देश्य यह साबित करना होता है कि देश के कितने प्रतिशत लोग क्या खाते हैं। यदि भारत किसी अंतरराष्ट्रीय आयोजन में अपने श्रेष्ठ शाकाहारी व्यंजनों को दुनिया के सामने रखता है, तो इसमें अस्वाभाविक क्या है? क्या किसी देश का सांस्कृतिक परिचय उसके पूरे मेन्यू कार्ड से ही तय होगा?

खाने के मीनू पर भी राजनीति होगी!

ब्रिक्स जैसे महत्वपूर्ण अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन में क्या विपक्ष के पास सरकार से पूछने के लिए इससे बड़ा कोई प्रश्न नहीं था? दुर्भागपूर्ण है कि विपक्ष की नजर में ब्रिक्स की मेज पर असली मुद्दे क्या थे इससे अधिक महत्वपूर्ण खाने का मीनू है? सत्य तो यह है कि ब्रिक्स दुनिया की बदलती आर्थिक और रणनीतिक व्यवस्था में तेजी से महत्वपूर्ण होता हुआ मंच है। इसकी मेज पर व्यापार है, निवेश है, ऊर्जा है, तकनीक है, वित्तीय सहयोग है और बदलती वैश्विक व्यवस्था में भारत की भूमिका है।

यानी विपक्ष के पास सवालों की कोई कमी नहीं थी।

वह पूछ सकता था कि भारत ब्रिक्स के माध्यम से अपने आर्थिक हितों को किस तरह आगे बढ़ा रहा है? चीन के साथ व्यापार असंतुलन को लेकर भारत की रणनीति क्या है? ब्रिक्स के विस्तार से भारत की सामरिक स्थिति मजबूत होगी या जटिल? क्या भारत वैश्विक दक्षिण का प्रभावी नेतृत्व कर पा रहा है? स्थानीय मुद्राओं में व्यापार और डॉलर पर निर्भरता कम करने की चर्चा का भारत के लिए क्या अर्थ है? ऊर्जा सुरक्षा और तकनीकी सहयोग में भारत को क्या अवसर मिल सकते हैं? ब्रिक्स में भारत अपनी स्वतंत्र विदेश नीति और राष्ट्रीय हितों के बीच संतुलन कैसे साध रहा है? ये वे प्रश्न थे जिन पर सरकार को असहज किया जा सकता था। ये वे प्रश्न थे जिन पर विपक्ष अपनी विदेश नीति की समझ दिखा सकता था। वे प्रश्न थे जिनसे जनता को पता चलता कि विपक्ष सत्ता का गंभीर विकल्प बनने की तैयारी कर रहा है।

लेकिन विपक्ष ने चुना क्या “मेन्यू”!यहीं से यह विवाद केवल भोजन का विवाद नहीं रह जाता। यह राजनीतिक प्राथमिकता का प्रश्न बन जाता है। यह विपक्ष की राजनैतिक प्राथमिकताओं पर भी प्रश्नचिन्ह लगाता है। क्या एक राजकीय भोज जनगणना होता है? विपक्ष का तर्क है कि भारत में बड़ी संख्या में लोग मांसाहारी हैं। तो क्या राजकीय भोज का मेन्यू जनगणना के आंकड़ों के अनुपात में तय होता है?

यदि देश में 70 प्रतिशत लोग किसी विशेष भोजन को पसंद करते हैं तो क्या मेन्यू में 70 प्रतिशत वही भोजन होना चाहिए? यदि किसी राज्य में मांसाहार प्रमुख भोजन है तो क्या हर अंतरराष्ट्रीय भोज में मांसाहार अनिवार्य होनी चाहिए? यदि किसी समुदाय की संख्या कम है तो क्या उसकी खाद्य परंपरा का महत्व भी कम हो जाएगा? यह तर्क जितना आगे जाएगा, उतना ही विचित्र होता जाएगा।

विडंबना है कि आज देश की राजनीति एक ऐसे मोड़ पर पहुंच गई है जहां विपक्ष यह भूल गया है कि राजकीय भोज संसद की सीटों का वितरण नहीं है, मेन्यू वोट बैंक नहीं है और प्लेट कोई जनगणना तालिका नहीं है। काश कि विपक्ष यह समझ पाता कि वो सरकार से मेन्यू का हिसाब मांग रहा है, जबकि देश उससे विकल्प का मेन्यू मांग रहा है। क्योंकि खाने के मीनू पर राजनीति विपक्ष की राजनैतिक समझ और प्राथमिकताओं पर प्रश्नचिन्ह लगा रही है। अत्यंत खेद का विषय है कि कांग्रेस जैसा दल जिसके पास 140 साल की विरासत है वो यह भूल गई है कि लोकतंत्र में विपक्ष की पहचान इस बात से नहीं होती कि वह कितने विवाद पैदा कर सकता है। बल्कि विपक्ष की पहचान इस बात से होती है कि वह सत्ता से कितने बड़े सवाल पूछ सकता है। इसलिए विपक्ष के लिए आवश्यक है कि वह कूटनीति की मेज को चुनावी मंच बनाकर विपक्ष की भूमिका पर ही प्रश्न चिन्ह न लगाए।

थाली में स्वाद रहने दीजिए, राजनीति संसद में कीजिए।

डॉ नीलम महेंद्र