-प्रभुदयाल श्रीवास्तव-
poem

मुझको मिले मुसद्दीलाल,
लगे सुनाने अपने हाल|
बोले कल लखनऊ में था,
अभी-अभी आया भोपाल|

करते-करते बात तभी,
आया उनमें तेज उबाल|
इस उबाल की गरमी में ,
हमने तुरत गला ली दाल|

हाय क्रोध की गरमी की,
करते नहीं लोग पड़ताल|
अगर पके इसमें भोजन,
ईंधन का ना रहे बवाल|

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सबसे अच्छा

गुड्डा गुड़िया घोड़ा गाड़ी,
अब सब कुछ बेकार है|
सबसे अच्छा मोबाइल है,
मुझको इससे प्यार है|

सब मित्रों से बात करा दे,
कहीं देर ना दार है|
मेल करा दे दोस्त बना दे,
क्या अच्छा किरदार है|

नहीं कनेक्शन कहीं जुड़ा है,
ना बिजली का तार है|
फिर भी मुट्ठी में हाजिर है,
सारा यह संसार है|

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