लेखक परिचय

बी एन गोयल

बी एन गोयल

लगभग 40 वर्ष भारत सरकार के विभिन्न पदों पर रक्षा मंत्रालय, सूचना प्रसारण मंत्रालय तथा विदेश मंत्रालय में कार्य कर चुके हैं। सन् 2001 में आकाशवाणी महानिदेशालय के कार्यक्रम निदेशक पद से सेवा निवृत्त हुए। भारत में और विदेश में विस्तृत यात्राएं की हैं। भारतीय दूतावास में शिक्षा और सांस्कृतिक सचिव के पद पर कार्य कर चुके हैं। शैक्षणिक तौर पर विभिन्न विश्व विद्यालयों से पांच विभिन्न विषयों में स्नातकोत्तर किए। प्राइवेट प्रकाशनों के अतिरिक्त भारत सरकार के प्रकाशन संस्थान, नेशनल बुक ट्रस्ट के लिए पुस्तकें लिखीं। पढ़ने की बहुत अधिक रूचि है और हर विषय पर पढ़ते हैं। अपने निजी पुस्तकालय में विभिन्न विषयों की पुस्तकें मिलेंगी। कला और संस्कृति पर स्वतंत्र लेख लिखने के साथ राजनीतिक, सामाजिक और ऐतिहासिक विषयों पर नियमित रूप से भारत और कनाडा के समाचार पत्रों में विश्लेषणात्मक टिप्पणियां लिखते रहे हैं।

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-बीएन गोयल-
hindi

प्रवक्ता में कुछ दिनों से हिंदी के बारे में एक अच्छी, लम्बी और सार्थक चर्चा चल रही है। डॉ. मधुसूदन ने अपने लेखों में हिंदी और अगंरेज़ी भाषाओं की तुलना इन की वर्तनी, लिपि और उच्चारण के आधार पर की है। उन का विश्लेषण वास्तव में तार्किक और प्रशंसनीय है। मैं मात्र हिंदी भाषी होने के नाते से नहीं वरन एक विद्यार्थी होने के नाते से भी कह रहा हूँ की हर भाषा का सीधा सम्बन्ध अपने क्षेत्र, स्थान, परिवेश और पर्यावरण से तो होता ही है साथ में हर भाषा का अपना एक आधार और इतिहास होता है। उसकी अपनी एक संस्कृति होती है और होती है एक पृष्ठभूमि। इसी प्रकार हर भाषा के विकास के अलग अलग सोपान होते हैं। आज की हिंदी यानी खड़ी बोली का भी अपना विकासमान इतिहास है।

यह ब्रजभाषा के रूप में जन्मी, ब्रज के कुंजों, वीथियों और लताओं को चूमती, कालिंदी के कूलों पर विचरती, प्रेम सागर, सुख सागर की कथाओं में भ्रमण करती हुई अमीर खुसरो, महावीर प्रसाद द्धिवेदी, प्रताप नारायण मिश्र प्रभृति का आशीर्वाद लेती हुई वर्तमान स्थिति तक पहुंची है। इसकी वर्तनी में भी समय समय पर परिवर्तन के कुछ प्रयोग किये गए। जैसे पांचवें दशक के अंत में अन्य परिवर्तनों के साथ छोटी इ और बड़ी ई दोनों ही की मात्राओं को दीर्घ में लिख कर आकार में छोटा बड़ा कर दिया गया। लेकिन ये सब परिवर्तन उच्चारण में अव्यवहारिक सिद्ध हुये और अंततः लिपि का वर्तमान रूप ही स्वीकार किया गया।

कहने का तात्पर्य है कि वर्तनी का सीधा सम्बन्ध उच्चारण से है और हिंदी ही नहीं सभी एशियाई भाषाओँ में शुद्ध उच्चारण का अपना महत्व है। यही कारण है कि अब कुछ समय से अंग्रेज़ी की वर्तनी को भी उच्चारण आधारित बनाने के प्रयास शुरू हो गए हैं। एक समय था जब अंग्रेजी भाषा को ‘किंग्स और क़्वींस इंग्लिश’ के नाम से प्रसिद्ध पुण्य सलिला माना जाता था। ऑक्सफ़ोर्ड और कैम्ब्रिज में पढ़े व्यक्ति को सर्वज्ञ और वंदनीय माना जाता था। यही बताया जाता था कि यही अंग्रेजी सर्वोपरि है। समय ने करवट बदली और अंग्रेजी के ऊपर से अंग्रेज़ों का प्रभुत्व कम होने लगा और उस का स्थान अमेरिकन अंग्रेजी लेने लगी। अमेरिका ने अंग्रेजी की वर्तनी को अपनी सुविधा और अपनी निजता दिखाने के लिए बदल दिया जैसे की programme जैसे अन्य शब्दों से एक m और e अक्षरों को हटा दिया। Labour शब्द से u अक्षर हटा दिया। cheque को बदल कर chech कर दिया। किंग और क़्वीन अंग्रेजी से पूर्णतयाः अलग करने तथा इसे अमेरिकी चोला देने की दृष्टि से इस में बहुत से परिवर्तन किये गए और धीरे-धीरे इन्हें मान्यता मिलने लगी। कम्प्यूटर के आने से जहाँ इस अभियान को गति मिली, अनेक सुविधायें मिली वहीँ king और queen अंग्रेजी की वर्तनी का बिल्कुल सर्वनाश हो गया। सबसे बड़ा परिवर्तन हुआ – शब्दों का स्थान अब अंकों ने ले लिया। अब to शब्द के लिए 2 और for शब्द के लिए 4 लिखा जाने लगा। yours को yrs बना दिया। इसे मान्यता भी मिलने लगी और यह सुविधा जनक भी लगा। इस से समय की बचत भी होने लगी। पहले शार्टहैंड के लिए भी ऐसा कभी नहीं हुआ था।

अब उच्चारण की बात करें- यह एक सत्यता है कि अंग्रेजी भाषी दो विभिन्न देशों का उच्चारण एक दुसरे से अलग ही होगा। उदाहरण के लिए अमेरिका और कनाडा को ले सकते हैं।अमेरिका और कैरिबियन देशों को ले सकते हैं। अर्थात अंग्रेज़ी भाषी जितने भी देश अथवा क्षेत्र हैं उन में भी साम्यता नहीं है। इस विषय पर अब गंभीर चिंतन शुरू हो गया है। प्रयत्न किये जा रहें हैं कि अंग्रेजी के पूरे शब्दकोष की वर्तनी को ही अब बदल कर उच्चारण आधारित किया जाये जैसे स्कूल को skool, चेक को chek, क्लियर को klear, change को chenj आदि वर्तनी से लिखा जाये। कहते हैं कि महारानी एलिज़ाबेथ ने अंग्रेजी भाषा में इन परिवर्तनों के लिए अनुमति दे दी है। प्रश्न है कि क्या यह कार्य इतना सरल है ? क्या महारानी एलिज़ा बेथ के पास इस प्रकार के अधिकार हैं ? क्या वह इन परिवर्तनों को क्रियान्वित करने के लिए आदेश दे सकती हैं ? क्या अंग्रेजी भाषा पर अब भी उन्हीं का अधिपत्य है ? क्या यह संभव हो सकेगा? क्या जॉनसन, वेब्स्टर, ऑक्सफ़ोर्ड, आदि के शब्दकोष व्यर्थ हो जायेंगे ? वेब्स्टर का मूल शब्दकोष दो वॉल्यूम में, लगभग 15 x 18 x 6 के आकार में तथा दो किलो के वज़न में था। क्या उस की कोई महत्ता नहीं रह जाएगी ? ये कुछ प्रश्न हैं जिन के उत्तर पहले देने होंगे। मेरे कहने का एक ही अभिप्रायः है कि हिंदी के साथ ऐसा कोई प्रयोग नहीं किया जाना चाहिए। हिंदी की वर्तनी उच्चारण के अनुकूल है, लिपि देवनागरी है जो शाश्वत है, सनातन है, और देश की प्रगति के लिए सर्वथा उपयुक्त है।

6 Responses to “हिंदी – वर्तनी, लिपि और उच्चारण”

  1. Bipin Kishore Sinha

    अंग्रेजी पुरे विश्व पर इसलिए थोप दी गई क्योंकि यह साम्र्राज्यवादियों की भाषा थी और उनके साम्राज्य में सूरज कभी डूबता नहीं था. अंग्रेजी विश्व भाषा गुणवत्ता के कारण नहीं बल्कि इंग्लैंड की द्वितीय विश्वयुद्ध के पहले की ताकत और शासितों की गुलामी मानसिकता के कारण बनी. इसके लिखने और उच्चारण में भारी विषमता है जिसपर आदरणीय डा. मधुसुदन ने अपने सार्थक लेखों से कई बार हमलोगों का ज्ञानवर्धन किया है. इस भाषा का स्वरूप कई बार बदला है. शेक्सपियर अगर आज आ जांय और वर्तमान अंग्रेजी को देखें, तो आत्महत्या कर लेंगे. लेकिन हम गर्व से कह सकते हैं की अगर वाल्मीकि या कालिदास आज भी भारत भूमि पर अवतरित होंगे तो संस्कृत को देखकर अत्यंत प्रसन्न होंगे. क्योंकि वैज्ञानिक तरीकों से लिखी और पढ़ी जाने के कारण यह भाषा शास्वत बन गई है. पूर्ण रूप से बिना किसी अपवाद के अपने व्याकरण के अनुसार चलने वाली यह विश्व की एकमात्र भाषा है. हमें भारतीय भाषाओँ, विशेष रूप से संस्कृत पर नाज़ है.

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    • बी एन गोयल

      B N Goyal

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      मान्यवर सिन्हा साहब – आप की टिप्पणी के लिए हार्दिक आभार। आप की बात को और थोड़ा पीछे लेजाना चाहूंगा। जब देश में मुग़लों का राज्य हो गया तो उन्होंने धीरे धीरे अपना राज्य को भी बढ़ाया और देश में अरबी/फ़ारसी युक्त उर्दू लादनी शुरू कर दी। आम बोल चाल की भाषा उर्दू बनी और कोर्ट कचहरी में अरबी/फ़ारसी युक्त उर्दू में काम होने लगा । अगर आप 1950 तक के किसी भी कोर्ट के निर्णय को देखे तो आप को उस का एक भी अक्षर पल्ले नहीं पड़ेगा यदि आप उर्दू भाषा नहीं जानते।

      अंग्रेज़ों ने एक दीर्घकालीन योजना के अंतर्गत उर्दू के साथ कोई छेड़ छाड़ नहीं की। उन्होंने स्कूलों और सरकारी दफ्तरों में मेकाले वाली अंग्रेजी शुरू कर दी। अतः अंग्रेजी और उर्दू दोनों ही इस देश की भाषा बन गयी। मुस्लिम शासकों को इस पर कोई आपत्ति नहीं हुई। 15 अगस्त 1947 तक इन्हीं दोनों भाषाओँ का आधिपत्य रहा।

      बात थी आज के परिदृश्य में हिंदी की स्थिति की। एक प्र्श्न जो प्रायः अंग्रेज़ी के पोषक और प्रशंसक उठाते हैं कि यदि अंग्रेजी नहीं होती तो क्या हम अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर इतनी प्रगति कर पाते ? आज विदेशो में विशेषकर अमेरिका और अन्य देशों में भारतीय युवकों ने अपना जो अंगद-पांव जमाया है वह अंग्रेजी के कारण ही संभव हो सका है। मेरा अंग्रेजी से कोई विरोध नहीं – इसे सीखना चाहिए लेकिन हिंदी की उपेक्षा से कष्ट होता है। मेरा निवेदन यही है कि हिंदी भी सीखो और अंग्रेजी भी सीखो लेकिन उसे अच्छी तरह से सीखो। अपनी भाषा का निरादर मत करो क्योंकि वह आप की संस्कृति का एक अभिन्न अंग है। यही आप की पहचान है। साठ के दशक में देश में त्रि-भाषा फार्मूला लागू किया गया था। प्रत्येक हिंदी भाषी को एक दक्षिण भारतीय भाषा सीखनी थी और हर दक्षिण भारतीय को हिंदी सीखनी थी। मैंने स्वयं कन्नड़ भाषा सीखना शुरू किया था लेकिन फार्मूला भी राजनीति का शिकार हो गया क्योंकि कहीं भी शिक्षक भर्ती नहीं किये गए। इस के विपरीत स्वतंत्रता पूर्व दक्षिण भारत में ‘दक्षिण भारत हिंदी प्रचार समिति ने प्रशंसनीय कार्य किया था। डॉ वी आर जगन्नाथन जैसे विद्वान उसी की देन हैं।

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    • बी एन गोयल

      B N Goyal

      मान्यवर सिन्हा साहब – आप की टिप्पणी के लिए हार्दिक आभार। आप की बात को और थोड़ा पीछे ले जाना चाहूंगा। जब देश में मुग़लों का राज्य हो गया तो उन्होंने धीरे धीरे अपना राज्य भी बढ़ाया और देश में अरबी/फ़ारसी युक्त उर्दू लादनी शुरू कर दी। आम बोल चाल की भाषा उर्दू बनी और कोर्ट कचहरी में अरबी/फ़ारसी युक्त उर्दू में काम होने लगा । अगर आप 1950 तक के किसी भी कोर्ट के निर्णय को देखे तो उस का एक भी अक्षर आप के पल्ले नहीं पड़ेगा यदि आप अरबी भाषा नहीं जानते। उर्दू लिपि के कारण पढ़ सकते हैं।

      अंग्रेज़ों ने एक दीर्घकालीन सोची समझी योजना के अंतर्गत उर्दू के साथ कोई छेड़ छाड़ नहीं की। वरन उन्होंने स्कूलों और सरकारी दफ्तरों में मेकाले वाली अंग्रेजी शुरू कर दी। अतः अंग्रेजी और उर्दू दोनों ही इस देश की भाषा बन गयी। मुस्लिम शासकों को इस पर कोई आपत्ति नहीं हुई। 15 अगस्त 1947 तक इन्हीं दोनों भाषाओँ का आधिपत्य रहा।

      बात थी आज के परिदृश्य में हिंदी की स्थिति की। एक प्र्श्न जो प्रायः अंग्रेज़ी के पोषक और प्रशंसक उठाते हैं कि यदि अंग्रेजी नहीं होती तो क्या हम अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर इतनी प्रगति कर पाते ? आज विदेशो में विशेषकर अमेरिका और अन्य देशों में भारतीय युवकों ने अपना जो अंगद-पांव जमाया है वह अंग्रेजी के कारण ही संभव हो सका है। मेरा अंग्रेजी से कोई विरोध नहीं – इसे सीखना चाहिए लेकिन हिंदी की उपेक्षा से कष्ट होता है। मेरा निवेदन यही है कि हिंदी भी सीखो और अंग्रेजी भी सीखो लेकिन अच्छी तरह से सीखो। अपनी भाषा का निरादर मत करो क्योंकि वह आप की संस्कृति का एक अभिन्न अंग है। यही आप की पहचान है। साठ के दशक में देश में त्रि-भाषा फार्मूला लागू किया गया था। प्रत्येक हिंदी भाषी को एक दक्षिण भारतीय भाषा सीखनी थी और हर दक्षिण भारतीय को हिंदी सीखनी थी। मैंने स्वयं कन्नड़ भाषा सीखना शुरू किया था लेकिन यह फार्मूला भी राजनीति का शिकार हो गया क्योंकि कहीं भी शिक्षक भर्ती नहीं किये गए। इस के विपरीत स्वतंत्रता पूर्व दक्षिण भारत में ‘दक्षिण भारत हिंदी प्रचार समिति ने प्रशंसनीय कार्य किया था। डॉ वी आर जगन्नाथन जैसे विद्वान उसी की देन हैं।

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  2. डॉ. मधुसूदन

    डॉ. मधुसूदन

    श्रीमान गोयल महोदयजी, नमस्कार।
    आपके आलेख से बहुत आनंदित हूँ; और पूर्ण सहमति व्यक्त करता हूँ। देवनागरी पर, लंदन के अध्यापकों ने, कुछ प्रकाश फेंका है; लघु लेख, दो दिन में भेजनेका प्रयास करूँगा।
    आप का अनुभव अवश्य काम आयेगा।
    हिन्दी की, दक्षिण (तमिलनाडु) सहित भारत में स्वीकृति की, दृष्टिसे अनुकूलतम गठन
    पर विचार और रणनीति पर संवाद चाहिए।
    (१) शुद्ध राष्ट्रीय दृष्टि के विचारकों का योगदान (२) भाषाका (दक्षिण को ध्यान में रखकर) अनुकूलतम गठन (३) उसके अनुकूलतम रणनीति —न्यूनतम, इतने अंगोपर विचार,ये बिन्दू मेरे ध्यानमें आते हैं।
    आप भी सोचिए। और अंग भी हो सकते हैं।
    ऐसे विचारकों को,वर्चस्ववादी और प्रादेशिक भाषा को ही बढावा देनेवाले, लोगोंसे दूर रहना होगा।
    इसका कोई भी बिन्दू पत्थर की लकीर ना मानें— जैसे विचार आए वैसे लिख दिए है।
    धन्यवाद-
    मधुसूदन

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  3. इंसान

    आपका अभिप्राय “कि हिंदी के साथ ऐसा कोई प्रयोग नहीं किया जाना चाहिए। हिंदी की वर्तनी उच्चारण के अनुकूल है, लिपि देवनागरी है जो शाश्वत है, सनातन है, और देश की प्रगति के लिए सर्वथा उपयुक्त है।” सर्वोपरि है और सर्वथा उपयुक्त है| सोचता हूँ कि यदि डॉ. मधुसूदन व आप जैसे राष्ट्रीय मनोवृति में लिप्त महानुभाव समय समय पर अपने विचार प्रस्तुत करते रहें तो अंग्रेजी-प्रशंसकों द्वारा हिंदी भाषा को कोई आंच आने का भय जाता रहेगा| धन्यवाद|

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    • बी एन गोयल

      B N Goyal

      आप की टिप्पणी के लिए धन्यवाद। भाषा सदैव विकासशील होती है। सभ्यता और संस्कृति में परिवर्तन होते हैं और चूंकि भाषा सभ्यता – संस्कृति का एक अभिन्न अंग है अतः उन परिवर्तनों का प्रभाव भाषा पर भी पड़ता है। समय के साथ साथ भाषा में नए शब्द जुड़ते रहते हैं और उन की वर्तनी उच्चारण के अनुसार निश्चित होती है।मेरा प्रश्न है कि क्या आप भाषा के आज के बोल चाल के स्वरुप को स्वीकार करते हैं। इस में हिंदी कम और अंग्रेजी अधिक होती है। इसे हिंगलिश का नाम दिया गया है। आज के युवा वर्ग की यही पसंद है क्योंकि यह सुविधा जनक है। एक बात और अंग्रेजी का जो रूप आज हमारे सामने है क्या वह ठीक है अथवा स्वीकार्य है। एक समय था जब अंग्रेजी की वर्तनी और उच्चारण के लिए अंग्रेजी के शिक्षक और बुज़ुर्ग लोग सजग थे। गलत लिखने अथवा बोलने पर मार भी पड़ती थी। लेकिन आज स्थिति उलट है। आज अमेरिकन और इंग्लिश अंग्रेजी के नाम से अंग्रेजी का भी विभाजन हो गया है। अब स्लैंग प्रमुख है।

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