हिन्दू धर्म और स्त्री स्वतंत्रता

डॉ. शुभ्रता मिश्रा

हिन्दू धर्म को समझने के लिए उसके प्राचीनतम और आधारभूत धर्मग्रन्थ अर्थात् ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद परम प्रमाण माने गए हैं। इन चारों वेदों में उद्धृत पवित्र मन्त्र वास्तव में ईश्वर की वाणी है, जिनके प्रति सभी हिन्दु धर्माबलंबियों की अगाध श्रद्धा और आस्था जुड़ी हुई है। सृष्टि के अनेक रहस्यों को उद्घाटित करता ऋग्वेद चारों वेदों में सबसे प्राचीन है, जिसमें मण्डल, सूक्त और ऋचाएं वर्णित हैं। गद्य और पद्य दोनों से अलंकृत दूसरा यजुर्वेद में यज्ञ कर्म की प्रधानता का उल्लेख मिलता है।  उपासना का प्रवर्तक तीसरा सामवेदएक गेय ग्रन्थ है, जो भारतीय संगीत का मूल आधार है। वहीं चौथे अथर्ववेद में गणित, विज्ञान, आयुर्वेद, समाज शास्त्र, कृषि विज्ञान, आदि अनेक विषयों से संबंधित ज्ञान के भण्डार भरे हुए हैं।  

चारों वेदों में स्त्री और पुरुष से संबंधित अनेक अभिधारणाएं वर्णित हैं, जो वैदिक काल में स्त्रियों की स्थिति के सबसे पुख्ता प्रमाण कहे जा सकते हैं। वेदों में एक ओर जहां स्त्री को पृथ्वी, ऋक, वीणा तन्त्री, नदी का दूसरा तट, रात्रि, उषा, विद्युत, ज्वाला, प्रभा, लता, पंखुड़ी, धीरता, श्रृद्धा, विद्या, सेवा, क्षमा के रुप में अलंकृत किया गया है, वहीं इनके संपूरक रुपों में पुरुष को धुलोक, साम, वीणा-दंड, नदी का प्रथम तट, दिवस, प्रभात, मेघ, अग्नि, आदित्य, वृक्ष, कर्म, सत्व, स्वाभिमान के प्रतीक रुपों में वर्णित किया गया है। इस तरह वेदों में दोनों स्त्री व पुरुष अपने अपने संपूरक प्रतीकों के सामंजस्य से सौर जगत, सृष्टि का सामगान, जीवन के संगीत की नि:सृत झंकार, वैयविक्त और सामाजिक विकास का अविरल प्रवाह के सृजन द्वारा मानव जीवन को पूर्णता प्रदान करते हैं। उपनिषदों में वर्णित महामुनि याज्ञवल्क्य और विदुषी गार्गी के मध्य संवाद इस बात के स्पष्ट प्रमाण प्रस्तुत करते हैं कि हिन्दु धर्म में स्त्रियों के अध्ययन के साथ साथ यज्ञ और सार्वजनिक आयोजनो में अपने विचार रखने की पूर्ण स्वतंत्रता थी। वैदिक काल की गार्गी, सुलभा, मैत्रयी, कात्यायनी आदि सुशिक्षित स्त्रियों का वर्णन किया जो ऋषि- मुनिओं की शंकाओं का समाधान करती थी। वेदों में स्त्री को विदुषी बनने का और अपने गुण, कर्म और स्वभाव के अनुसार गुणशाली वर चुनने का अधिकार भी था।

यह कहा जा सकता है कि भारत में महिलाओं की स्वतंत्रता को लेकर बनी स्थिति में युगानुरूप परिवर्तन होते रहे हैं। स्त्री स्वतंत्रता वैदिक युग से लेकर आधुनिक काल तक अपने अधिकारों में आए बदलावों के तदनरूप परिवर्तित होती रही है। लेकिन हिन्दु धर्म के मूल में स्त्री स्वतंत्रता सदैव स्थापित रही है। वैदिक युग में स्त्रियों की सुदृढ़ सम्मानजनक स्थिति और धार्मिक व सामाजिक कार्यों में स्वतंत्रता, शिक्षा का अधिकार, सम्पत्ति में समानता का अधिकार और सभा व समितियों में उनका स्वतंत्रतापूर्वक भाग लेना उनकी वेदकालीन स्वतंत्रता के प्रमाणित साक्ष्य प्रस्तुत करते हैं। वैदिक काल में कोई भी धार्मिक कार्य नारी की उपस्थिति के बिना शुरू नहीं होता था। उक्त काल में यज्ञ और धार्मिक प्रार्थना में यज्ञकर्ता या प्रार्थनाकर्ता की पत्नी का होना आवश्यक माना जाता था। ऋग्वेद में वैदिक काल में नारियां बहुत विदुषी और नियम पूर्वक अपने पति के साथ मिलकर कार्य करने वाली और पतिव्रत धर्म का पालन करने वाली होती थी। पति भी पत्नी की इच्छा और स्वतंत्रता का सम्मान करता था।

हिन्दू धर्म के प्रत्येक क्षेत्र में स्त्रियां समान रूप से आदर और प्रतिष्ठित रही हैं। शिक्षा, धर्म, व्यक्तित्व और सामाजिक विकास में उनका महान योगदान रहा वेदों में वर्णित स्त्री की देवी, विदुषी, वीरांगना, वीरों की जननी, आदर्श माता, कर्तव्यनिष्ट धर्मपत्नी, सद्गृहणी, सम्राज्ञी, संतान की प्रथम शिक्षिका, ज्ञान-विज्ञान दाता, सन्मार्ग प्रदान करने वाली उपदेशिका, मर्यादाओं का पालन करनेवाली, सत्य और प्रेम का प्रकाश फैलानेवाली, धनुर्विद्या में निष्णात होकर राष्ट्र रक्षा में भाग लेने वाली, पूज्या, स्तुत्या, रमणीया, आह्वान-योग्य, सुशीला, बहुश्रुता, यशोमयी जैसी अनेक उपमाएं उसकी अत्यंत गौरवास्पद स्थिति को प्रदर्शित करती हैं। अब नारी वैदिक युग के दैवी पद से उतरकर सहधर्मिणी के स्थान पर आ गई थी। धार्मिक अनुष्ठानों और याज्ञिक कर्मो में उसकी स्थिति पुरूष के बराबर थी। कोई भी धार्मिक कार्य बिना पत्नी नहीं किया जाता था। श्रीरामचन्द्र ने अश्वमेध के समय सीता की हिरण्यमयी प्रतिमा बनाकर यज्ञ किया था। यद्यपि उस समय भी अरून्धती, (महर्षि वशिष्ठ की पत्नी), लोपामुद्रा (महर्षि अगस्त्य की पत्नी), अनुसूया (महर्षि अ़त्रि की पत्नी) आदि नारियाँ दैवी रूप की प्रतिष्ठा के अनुरूप थी तथापि ये सभी अपने पतियों की सहधर्मिणी ही थीं। महाभारत युद्ध के बाद नारी का पतन होना शुरू हुआ। इस युद्ध के बाद समाज बिखर गया, राष्ट्र राजनीतिक शून्य हो गया था और धर्म का पतन भी हो चला था। युद्ध में मारे गए पुरुषों की स्त्रीयां विधवा होकर बुरे दौर में फंस गई थी। राजनीतिक शून्यता के चलते राज्य असुरक्षित होने लगे। असुरक्षित राज्य में अराजकता और मनमानी बढ़ गई। इसके चलते नारियां सामाजिक, धार्मिक, आर्थिक और सांस्कृतिक शोषण की शिकार होने लगी। फिर भी यह दौर स्त्रियों के लिए उतना बुरा नहीं था जितना की मध्य काल में दिखाई देता है।

संस्थानिक रूप से कहें तो मध्यकाल से स्त्रियों की वैदिक और उत्तरवैदिक स्वतंत्रता अवनति की ओर बढ़ती दिखने लगी थी। सम्भवतः यहीं से पुरुष अहं को पहुंचने वाली चोट के दर्शन होने लगते हैं और अपनी पुरुष सत्तात्मकता को प्रतिष्ठित कर पाने की चेष्टा पुरुष समाज करने लगता है। इसके लिए स्त्री स्वतंत्रता पर सबसे पहला प्रहार दिखाई देने लगता है, जब उन पर विभिन्न तरह से निर्योग्यताओं का आरोपण किया जाने लगा था। यहां से स्त्री की धार्मिक और सामाजिक स्वतंत्रता पर लगाम लगने लगी थी। पुरुष के साथ चलने वाली स्त्री मध्य काल में पुरुष की सम्पत्ति की तरह समझी जाने लगी। इसी सोच ने स्त्री स्वतंत्रता को सामाजिक स्तर पर समाप्त कर दिया परन्तु धार्मिक दृष्टि से सोचें तो तब भी पतनी और पुत्री की धार्मिक मर्यादा का पतन भी नहीं हुआ। उनकी वैदिक अनिवार्यता हमेशा बनी रही।  हां यह अवश्य है कि मध्य काल में नए नए जन्मे तथाकथित धर्मों ने नारी को धार्मिक तौर पर दबाना और शोषण करना शुरू किया था।

धर्म और समाज के बनाए अपने झूठे नियमों ने स्त्री स्वतंत्रता का गला घोंटते हुए उसको पुरुष से निम्न घोषित कर उसे उपभोग की वस्तु बनाकर रख दिया। वैदिक युग की नारी धीरे-धीरे अपने देवीय पद से नीचे खिसकर मध्यकाल के सामन्तवादी युग में दुर्बल होकर शोषण का शिकार होने लगी। सामाजिक स्तर पर धर्म के नाम पर स्त्री को मध्यकालीन पुरुर्षों ने स्वयं के ऊपर निर्भर बनाने के लिए उसे सामूहिक रूप से पतित अनधिकारी बताया। नारी के अवचेन में शक्तिहीन होने का अहसास जगाया गया जिसके चलते उसे आसानी से विद्याहीन, साहसहीन कर दिया गया। उसके मूल अधिकारों पर प्रतिबंध लगाकर पुरुष को हर जगह बेहतर बताकर धार्मिक और सामाजिक स्तर पर स्त्री स्वतंत्रता की परिभाषा बुरी तरह छिन्न भिन्न हो गई। एक दौर आया जब स्त्री  समाज, देश और धर्म के लिए अनुपयोगी साबित कर दी गई और अपने जीवन यापन, अस्तित्व और आत्मरक्षा के लिए पूर्णत: पुरुष पर निर्भर बना दी गई।

इन भयों और दहशत के माहौल ने हिन्दु धर्म में भी पर्दाप्रथा, बाल विवाह प्रथा और नारियों को शिक्षा से दूर रखने का चलन जैसी कुरीतियों को जन्म दे दिया। प्रेम, ममता, करुणा, सृजनात्मकता में ईश्वरत्व के सबसे निकट मानी जाने वाली हिन्दु स्त्रियां पुरुषों के उपभोग और मनोरंजन की वस्तु समझी जाने लगीं। इतिहास पर दृष्टि डालें तो हम पाते हैं कि 11 वीं शताब्दी से 19 वीं शताब्दी के बीच भारत में महिलाओं की स्थिति अत्यंत दयनीय थी। यह समय हिन्दू स्त्रियों की स्वतंत्रता, सम्मान, विकास, और सशक्तिकरण के अंधकार का युग था। मुगल शासन, सामन्ती व्यवस्था, केन्द्रीय सत्ता का विनष्ट होना, विदेशी आक्रमण और शासकों की विलासितापूर्ण प्रवृत्ति ने हिन्दू स्त्रियों की स्वतंत्र अस्तिथ्व पर प्रहार करके उसे लहूलुहान कर दिया था। इससे अप्रत्यक्ष रुप से भारत का निजी व सामाजिक जीवन भी कहीं न कहीं कलुषित हो गया था।

उन्नीसवीं सदीं के पूर्वार्द्ध में भारत के कुछ समाजसेवियों जैसे राजाराम मोहन राय, दयानन्द सरस्वती, ईश्वरचन्द विद्यासागर तथा केशवचन्द्र सेन ने अत्याचारी सामाजिक व्यवस्था के विरूद्ध आवाज उठायी। इन्होंने तत्कालीन अंग्रेजी शासकों के समक्ष स्त्री पुरूष समानता, स्त्री शिक्षा, सती प्रथा पर रोक तथा बहु विवाह पर रोक की आवाज उठायी। इसी का परिणाम था सती प्रथा निषेध अधिनियम,1829,1856 में हिन्दू विधवा पुनर्विवाह अधिनियम,1891 में एज आफ कन्सटेन्ट बिल,1891, बहु विवाह रोकने के लिये वेटिव मैरिज एक्ट पास कराया। इन सभी कानूनों का समाज पर दूरगामी परिणाम हुआ। वर्षों के नारी स्थिति में आयी गिरावट में रोक लगी। आने वाले समय में स्त्री जागरूकता में वृद्धि हुई ओैर नये नारी संगठनों का सूत्रपात हुआ जिनकी मुख्य मांग स्त्री शिक्षा, दहेज, बाल विवाह जैसी कुरीतियों पर रोक, महिला अधिकार, महिला शिक्षा का माँग की गई। ब्रिटिश काल से भारत में स्त्रियों के पुनरोत्थान की शुरुआत हुई। ब्रिटिश शासन की अवधि में हमारे समाज की सामाजिक व आर्थिक संरचनाओं में अनेक परिवर्तन किए गए। औद्योगीकरण, शिक्षा का विस्तार, सामाजिक आन्दोलन व महिला संगठनों का उदय व सामाजिक विधानों ने स्त्रियों की दशा में बड़ी सीमा तक सुधार की ठोस शुरूआत हुई। इसके प्रभाव बाद में स्पष्ट रुप से देखे भी गए।

दूसरे कुछ धर्मों की बात की जाए तो जैन धर्म में भी स्त्रियों को धार्मिक अनुष्ठानों में शामिल होने की अनुमति दी गयी है। इसी तरह बौद्ध साहित्य के एक महत्वपूर्ण ग्रंथ थेरीगाथा में नारी स्वतंत्रता प्रकट करने वाला प्रथम गंथ का दर्जा मिला हुआ है। बुद्ध विश्व के पहले धर्मगुरु थे, जिन्होंने स्त्रियों को बराबरी का अधिकार दिया। उन्होंने स्त्रियों को दीक्षा का अधिकार देकर भिक्षुणी बनने का अवसर दिया और पहली बार एक पृथक और स्वतंत्र भिक्षुणी संघ की स्थापना की। बौद्ध धर्म में भिक्षुणी संघ की स्थापना एक ऐसा क्रांतिकारी कदम था, जिससे स्त्रियों की स्वतंत्रता और उनके व्यक्तित्व के सवोर्न्मुखी विकास को अभिव्यक्ति मिली।

जीवन की सर्जक, राष्ट्र की मार्गदर्शक, समाज का विकास करनेवाली और परिवार को सँभालनेवाली, इन सब के अनूठे मेल की प्रतिमा स्त्री की धार्मिक व सामाजिक स्वतंत्रता की स्थिति में इक्कीसवीं सदी तक आते-आते बहुत अधिक सुधार हुआ है। स्त्रियों ने शैक्षिक, राजनीतिक सामाजिक, आर्थिक, धार्मिक, प्रशासनिक, खेलकूद आदि विविध क्षेत्रों में उपलब्धियों के नए आयाम गढ़े हैं। वे वैदिककालीन स्त्रियों की भांति आत्मनिर्भर, स्वनिर्मित, आत्मविश्वासी बनी हैं। पुरूष प्रधान चुनौतीपूर्ण क्षेत्रों में भी अपनी योग्यता प्रमाणित की है। सभी क्षेत्रों में स्त्रियों ने नए कीर्तिमान स्थापित किए हैं।

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