लेखक परिचय

डॉ. वेदप्रताप वैदिक

डॉ. वेदप्रताप वैदिक

‘नेटजाल.कॉम‘ के संपादकीय निदेशक, लगभग दर्जनभर प्रमुख अखबारों के लिए नियमित स्तंभ-लेखन तथा भारतीय विदेश नीति परिषद के अध्यक्ष।

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डॉ. वेदप्रताप वैदिक

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के मुखिया श्री मोहन भागवत ने अपनी मप्र यात्रा के दौरान ऐसा बयान दे दिया है, जिसे लेकर देश में जोरदार विवाद छिड़ जाए तो मुझसे ज्यादा प्रसन्न कौन होगा? मैंने लगभग दस साल पहले छपी मेरी पुस्तक, ‘भाजपा, हिंदुत्व और मुसलमान’ में इसी प्रश्न को उठाया था। मूल प्रश्न यह है कि हिंदू कौन है? हिंदुत्व क्या है? हिंदुस्तान हम किसे कहे? क्या भारत के मुसलमान, ईसाई, पारसी और यहूदी भी अपने आप को हिंदू कह सकते हैं? क्या हम उन्हें हिंदू मानते हैं?

वीर सावरकर ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक ‘हिंदुत्व’ में लिखा है कि जो भी व्यक्ति भारत को अपना पुण्यभू और पितृभू मानता है, वह हिंदू है। जिन धर्मों की उत्पत्ति भारत के बाहर हुई है, उनके पैंगबर, मसीहा, पूजा-स्थल और तीर्थ याने उनका पुण्यभू भारत में नहीं है। इसीलिए उन्हें हिंदू कैसे कहा जाए? लेकिन उनका ‘पितृभू’ तो भारत ही है, क्योंकि उनके पितृ याने पुरखे यही जन्मे हैं। सावरकर के इसी सवाल को आधार बनाकर हिंदू महासभा का जन्म हुआ और बाद में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ बना। 20 वीं सदी के शुरु में बनी मुस्लिम लीग की सांप्रदायिक राजनीति का यह करारा जवाब था। लेकिन अब मोहनजी ने बैतूल में हिंदुत्व पर जो बात कही है, उसने ‘हिंदू’ शब्द की परिभाषा को काफी उदार बना दिया है बल्कि मैं यह कहूंगा कि इस शब्द का जो असली अर्थ है, उस पर उन्होंने उंगली धर दी है। हिंदू का अर्थ है, हिंद का निवासी। हिंद क्या है? सिंध ही हिंद है। फारसी में ‘स’ का उच्चारण ‘ह’ हो जाता है। जैसे ‘सप्ताह’ का ‘हफ्ता’। जो भी सिंधु नदी के पार रहता है, वह हिंदू है। याने पाकिस्तानी भी हिंदू ही हुए। हिंदू शब्द भारतीय नहीं है, विदेशी है। यह शब्द किसी भी भारतीय प्राचीन शास्त्र या ग्रंथ में नहीं है। यह हमें पठानों, तुर्कों, मुगलों या कहें कि मुसलमानों ने दिया है। मुसलमानों के दिए हुए नाम को हमने अपना नाम मान लिया है, यही बात यह सिद्ध करती है कि हिंदू में कितनी उदारता है और होनी चाहिए। मोहनजी ने इस उदारता को ही रेखांकित किया है। उन्होंने कहा है कि आपकी पूजा-पद्धति जो भी हो, यदि आप हिंदुस्तान के निवासी हैं तो आप हिंदू है। बिल्कुल वैसे ही जैसे अमेरिका का हर नागरिक अमेरिकी है, चाहे उसकी पूजा-पद्धति जो भी हो। इसी तर्क के आधार पर पूर्व सर संघचालक और मेरे अभिन्न मित्र स्व. श्री कुप्प सी सुदर्शनजी से मैं कहा करता था कि देश के मुसलमानों को देश की राष्ट्रवादी धारा से जोड़ना बहुत जरुरी है। मुझे खुशी है कि मुस्लिम राष्ट्रीय मंच के जरिए वह काम हो रहा है। यह सर्वमान्य तथ्य है कि किसी के भी कोई धर्म या विचारधारा का जन्म किसी भी देश में हुआ है, उसके माननेवालों पर ज्यादा प्रभाव उसके अपने देश की परंपरा का ही होता है। इसी आधार पर मैंने दुबई के अपने एक भाषण में लगभग 20 साल पहले कहा था कि भारत का मुसलमान दुनिया का सर्वश्रेष्ठ मुसलमान है, क्योंकि भारत की श्रेष्ठ परंपराएं उसके खून में बहती हैं और यही बात 50 साल पहले मैंने हमारे कम्युनिस्टों के बारे में सोवियत संघ में दिए एक भाषण में कही थी।

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