बेघरों को आवास : प्रधानमंत्री आवास योजना

अजंेद्र अजय

देश में असमानता की अनेक तस्वीरों में से एक अत्यंत दारूण तस्वीर बेघरों व आश्रयविहीनों की है। ठंड की ठिठुरन हो, लू की तपि हो अथवा बारिश के थपेडे़, वो बिना आश्रय के रहने को मजबूर हैं। वर्ष 2001 की जनगणना के अनुसार 19.43 लाख लोग बेघरों की श्रेणी मेंं थे। वर्ष 2011 में यह संख्या घटकर 17.72 लाख हो गई। हालांकि, यह दौर वह था जिसमें शहरीकरण की प्रक्रिया बहुत तेजी से बढ़ी। इसी का परिणाम था कि वर्ष 2001 में जहाॅ ग्रामीण क्षेत्रों में बेघरों की संख्या 11.6 लाख थी, वहीं 2011 में यह घटकर 8.34 लाख पर पहॅुच गई। इसके विपरीत शहरी इलाकों में यह संख्या वर्ष 2001 के 7.78 लाख के मुकाबले बढ़कर वर्ष 2011 में 9.38 लाख तक पहॅुची।वर्ष 2002 में सुप्रीम कोर्ट ने एक जनहित याचिका की सुनवाई करते हुए कहा कि बेघरी एक गंभीर समस्या है और इसके तमाम सामाजिक दुश्परिणाम हैं। अपने निर्देश में सुप्रीम कोर्ट ने बेघर, लाचार व बदहाली का जीवन जी रहे लोगों के रहने, खाने व शौचालय की व्यवस्था करना राज्यों का दायित्व बताया। वर्ष 2012 में सुप्रीम कोर्ट ने पुनः कहा कि प्रत्येक व्यक्ति को उचित जीवन जीने का अधिकार है। प्रत्येक व्यक्ति को संविधान के अनुच्छेद-21 के तहत व्यवस्थित जीवन उपलब्ध कराने की जिम्मेदारी राज्य की है। मानवधिकारों पर सार्वभौमिक घोषणा का अनुच्छेद-25(1) घोषणा करता है कि सभी को एक ऐसे जीवन स्तर का अधिकार है जो उसके और उसके परिवार के स्वास्थ्य और बेहतरी के लिए पर्याप्त हो। इसमें भोजन, वस्त्र, आवास, चिकित्सकीय देखरेख और आवश्यक सामाजिक सेवाएं शामिल हैं। यह आष्चर्यजनक तथ्य है कि आजादी के इतने वर्षों बाद भी केन्द्र व राज्य सरकारों की तमाम आवासीय नीतियों के बावजूद आर्थिक दृष्टि से कमजोर लोगों का घर का सपना पूरा नहीं हो पाया है। एक समय था जब नगरीय विकास संस्थाएं, विकास प्राधिकरण आदि आवासीय योजनाएं लाते थे। उसमें कमजोर आर्थिक आय वालों के लिए घर होते थे। मगर अब ये संस्थाएं बड़े-बड़े बिल्डरों के हितों की पोषक बन गई हैं।

सरकारी संस्थाएं नाममात्र के लिए ही आवासीय योजनाएं ला रही हैं। जो योजनाएं बनाई भी जा रही हैं, वो कमजोर आर्थिक आय वालों की पहॅुच से बाहर हैं। कोई भी व्यक्ति सामाजिक व आर्थिक रूप से सुरक्षित तभी हो सकता है, जबकि उसके पास अपने रहने का सुरक्षित ठौर-ठिकाना हो। परंपरागत रूप से भी देखा जाए तो मानव जीवन की बुनियादी आवश्यकताओं में रोटी, कपड़े के साथ मकान को शामिल किया गया है।यह सुखद पहलू है कि वर्तमान में केन्द्र सरकार ने इस विषय की गंभीरता को समझा है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने 25 जून, 2015 को प्रधानमंत्री आवास योजना (पीएमएवाई) (शहरी)-सभी के लिए आवास (एचएफए) मिशन का शुभारंभ किया। प्रधानमंत्री श्री मोदी ने स्वतंत्रता की 75वीं वर्षगांठ पर वर्ष 2022 तक सभी को आवास का संकल्प व्यक्त किया है। यह योजना सभी 29 राज्यों और 7 केन्द्र शासित प्रदेशों के सभी 4,041 शहरों व कस्बों में कार्यान्वित की जाएगी। मोदी सरकार की इस पहल को इसलिए भी गंभीर माना जाना सकता है कि सरकार ने वर्ष 2011 की जनगणना के   17.72 लाख बेघरों के आॅकड़ों से कई आगे बढ़कर लक्ष्य निर्धारित किया है। इसके पीछे कारण स्पष्ट दिखता है। मोदी से पूर्व की सरकारों ने आश्रयविहीन अथवा फुटपाथ वासियों को ही बेघरों की श्रेणी में शामिल किया। मगर मोदी सरकार ने सबके लिए आवास मिशन को शुरू करने से पूर्व वर्ष 2011 में आवास व शहरी गरीबी उन्मूलन मंत्रालय द्वारा गठित तकनीकि समूह के उस अनुमान को भी शामिल किया, जिसमें मरम्मत न होने योग्य कच्चे घरों, जीर्ण-शीर्ण व तंग मकानों में रहने वाले परिवारों के लिए 18.78 मिलियन आवासीय इकाईयों की किल्लत बताई गई थी। मोदी सरकार ने इस आॅकडे़ के साथ शहरीकरण के विस्तार को ध्यान में रखते हुए इस योजना के शुभारंभ के समय शहरी क्षेत्रों में लगभग दो करोड़ आवासीय इकाईयों की माॅग का आॅकलन किया है। इसके साथ ही राज्य सरकारों से भी नई माॅग का आंकलन करने को कहा गया है।

शुरूआत में सरकार ने इस योजना में कमजोर आय वर्ग (ईडब्ल्यूएस) व निम्न आय वर्ग (एलआईजी) को शामिल किया था। मगर दिसम्बर 2016 से इसके दायरे में मध्यम आय वर्ग (एमआईजी) को भी ले लिया गया। योजना के प्रति मोदी सरकार की प्रतिबद्वता इस बात से भी समझी जा सकती है कि जून 2015 में इस मिशन के शुरू होने के बाद अब तक देश के 2008 शहरों व कस्बों में 17,73,533 किफायती मकानों के निर्माण व वित पोषण को मंजूरी दी गई है।  जबकि यूपीए सरकार के वर्ष 2004-14 के कार्यकाल के दौरान जवाहरलाल नेहरू शहरी नवीनकरण मिशन (जेएनएनयूआरएम) व राजीव आवास योजना (आरएवाई) में कुल 13,82,768 घर स्वीकृत किये गए। मोदी सरकार ने करीब दो वर्ष की अवधि में योजना के लिए 27,883 करोड़ रूपये की केंद्रीय सहायता को स्वीकृति दी है। इसके विपरीत यूपीए के दस वर्षों के शासनकाल में 20,920 करोड़ रूपये की केन्द्रीय सहायता की प्रतिबद्वता व्यक्त की गई थी। सबको आवास उपलब्ध कराने की दिशा में केंद्र सरकार ने एक महत्वपूर्ण काम और किया है। सरकार ने आवास क्षेत्र को संरचना क्षेत्र का दर्जा देकर इस क्षेत्र में किफायती घर निर्माण के लिए निजी निवेष के द्वार खोले हैं। निजी क्षेत्र की किफायती आवास परियोजनाओं से होने वाले  मुनाफे को आयकर से छूट समेत कई अन्य रियायतें दी गई है। इसके साथ ही शहरीकरण के निरंतर विस्तार और प्रवासरत लोगों के संदर्भ में आवास की जरूरतों को पूरा करने के लिए शहरी विकास मंत्री एम वैंकेया नायडू द्वारा राश्ट्रीय शहरी किराया मकान नीति की घोषणा आवास की समस्या से जूझ रहे लोगों को उम्मीद जगाने वाली हैं। बहरहाल, वर्ष 2022 तक सबको आवास उपलब्ध कराने का मोदी सरकार का संकल्प मूर्त रूप लेता है तो यह आजादी के बाद का सबसे बड़ा लोक कल्याणकारी कदम साबित होगा।

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