पञ्च राज्यों के चुनावों को सेमीफाइनल की संज्ञा देना कितना उचित है ?

विनायक शर्मा

पांच राज्यों में होने जा रहे आगामी विधानसभा चुनाव की तिथियों की घोषणा विगत शनिवार, 6 अक्टूबर को चुनाव आयोग द्वारा किये जाने के साथ ही सभी राजनीतिक दल अपने-अपने सैन्य दलबल के साथ चुनावी समर में कूद चुके हैं. जहाँ एक ओर उनके तरकश में आरोप प्रत्यारोप के आयुधों की भरमार है तो वहीं दूसरी ओर लोकलुभावने वायदों की भी कहीं कोई कमी दिखाई नहीं देती. हाँ, मुद्दों के कुछ ऐसे ठुस्स पटाके भी उनकी झोली में हैं जिन्हें गाहे-बगाहे चलाने में उन्हें अभी भी कोई परहेज नहीं है. बस कमी है तो केवल जन सरोकार के अहम् मुद्दों की जिनके विषय में अधिकतर राजनीतिक दल बात करने से भी कतराते हैं. अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहे क्षेत्रीय दलों की अनर्गल आरोप जड़ने की नकारात्मक राजनीति देश के मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस को बहुत भा रही है. संभवतः इसीलिए 2013 में केजरीवाल के आरोपों के चलते दिल्ली प्रदेश की शिला दीक्षित के नेतृत्व की कांग्रेस की सरकार गवाने के पश्चात् से ही कांग्रेस निरंतर हो रही अपनी पराजय का चिंतन-मनन करने की अपेक्षा अनर्गल आरोपों को ही विजय का मार्ग मान बैठी है. यही नहीं, वंशवाद के रथपर सवार कांग्रेस के तथाकथित युवा राष्ट्रिय अध्यक्ष की बचकानी हरकतों से जहाँ एक ओर संवेदनशील और राष्ट्रिय हित के मुद्दे मखोल का कारण बन पुराने अनुभवी नेताओं के लिए परेशानी का सबब बन रहे हैं. वहीँ दूसरी ओर देश के युवा मतदाता असमंजस की स्थिति में है कि कांग्रेस के इस नेता को क्यूँकर देश की बागडोर सौंपी जाए ? छोटे और क्षेत्रीय दलों से गठबंधन करने से परहेज और येन-केन-प्रकारेण क्षेत्रीय दलों के सरकारों को गिरा राष्ट्रपति शासन या अपनी सरकार बनवाने वाली कांग्रेस आज उन्हीं क्षेत्रीय क्षत्रपों की दहलीज पर उनके गठबंधन में शामिल होने की गुहार लगा रही है. यह कैसी विडम्बना है ? मजे की बात यह है कि इन सब परिस्थितियों के मध्य कांग्रेस हर चुनाव में अपनी सरकार बंनने के दिव्यास्वपन देखने में मशगूल है. अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहे तमाम विपक्षी दलों के बनते टूटते महा-गठबंधन में स्वहित सर्वोपरि के मूलमंत्र के कारण प्रमुख विपक्षी दल कांग्रेस की ही स्थिति सबसे दयनीय दिखाई देती है. कांग्रेस की नजर एक ओर जहाँ भ्रूण की स्थिति में पल रहे तथाकथित महागठबंधन में सम्मानीय स्थान पाने की है वहीँ उसकी योजना क्षेत्रीय और छोटे दलों के सहारे 2019 में होनेवाले लोकसभा के आम चुनावों की वैतरणी पार करने की भी है. इन पांच राज्यों की सत्ता पर जहाँ एक ओर छतीसगढ़, मध्यप्रदेश और राजस्थान की सत्ता पर भाजपा के नेतृत्व की सरकारें काबिज हैं, वहीँ दूसरी ओर मिजोरम में कांग्रेस और तेलंगाना में टी आर एस की सरकारों का शासन है. इन राज्यों के चुनावी समर सत्तापक्ष का एकमात्र लक्ष जहाँ एक ओर अपनी-अपनी सरकारों को बचाए रखना है वहीँ दूसरी ओर विपक्षी दलों के शासित राज्यों में अपने दलों या गठबंधन की सरकारों को कायम करना है. गौरतलब है कि इन 5 राज्यों के चुनाव इसलिए भी बहुत अहम हैं, क्योंकि इसके बाद सीधे लोकसभा के आम चुनाव ही होने हैं. इसीलिए, इन विधानसभा के चुनावों को 2019 के लोकसभा के आम चुनाव के सेमीफाइनल के नजरिये की तरह देखा जा रहा है. लेकिन इतना तो स्पष्ट है की दलों के धुरंधर चाहे जो योजनायें बना रहे हों, इन पांच राज्यों के नतीजे लोकसभा के 2019 में होनेवाले आम चुनावों के लिए दलों की रणनीति पर अवश्य ही प्रभाव डालेंगे. केंद्र के साथ-साथ छत्तीसगढ़, राजस्थान और मध्यप्रदेश में सरकार चला रही भाजपा एक ओर जहाँ इन राज्यों में अपनी सरकार बनाए रखने की जी तोड़ कोशिश में लगी हुई है वहीँ दूसरी ओर उसका भी लक्ष्य राज्यों के इन चुनावों के माध्यम से 2019 के आम चुनावों में कम से कम वर्तमान आंकड़ा बनाए रखने के कार्य को एक बड़ी चुनौती के रूप में लेना है. 12 नवम्बर से आरम्भ हुई इन राज्यों के मतदान की प्रक्रिया 7 दिसंबर तक चलेगी और मतगणना 11 दिसंबर को की जायेगी. छत्तीसगढ़ में विधानसभा के चुनावों के मतदान के दूसरे चरण में आज 70 सीटों के लिए मतदान की प्रक्रिया चल रही है व मध्यप्रदेश, राजस्थान, तेलंगाना और मिजोरम आदि शेष राज्यों में 28 नवम्बर और 7 दिसंबर को संपन्न होगी. लोकसभा की कुल 83 लोकसभा की सीटोंवाले इन राज्यों की अहमियत इसलिए भी अधिक है क्यूंकि भाजपा शासित मध्यप्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ आदि लोकसभा की 65 सीटों वाले राज्यों में ही भाजपा और अन्य विपक्षी दलों में कड़ा मुकाबला होने की आशंका जताई जा रही है. जबकि लोकसभा की एक सीट वाले मिजोरम व 17 सीटों वाले तेलंगाना राज्य में मुकाबला अनुमानतः दो ही दलों या त्रिकोणीय ही रहने की सम्भावना है. 2013 में संपन्न हुए इन राज्यों के चुनावी नतीजों पर यदि राज्यवार नजर दौडाएं तो छत्तीसगढ़ जहाँ आज दूसरे चरण के चुनाव हो रहे हैं, में भाजपा की सरकार निरंतर 2003 से ही सत्ता पर काबिज है. 90 सीटों वाले छत्तीसगढ़ में 2013 के चुनाव में 41.18 प्रतिशत मत प्राप्त कर भाजपा को 49 सीटों पर विजय मिली थी. मत प्रतिशत में कांग्रेस ने भाजपा को कड़ी टक्कर देते हुए जहाँ 40.43 प्राप्त किये वहीँ सीटों की दौड़ में पिछड़ते उसे 39 सीटों पर ही संतोष करना पड़ा था. अब बात मध्यप्रदेश की करते हैं जहाँ कांग्रेस विगत 3 चुनावों से ही भाजपा से पिछड़ती रही है. नवंबर 2013 में विधानसभा के संपन्न हुए चुनाव में कांग्रेस को 58 सीटों पर धकेलते हुए भाजपा ने 165 सीटों पर विजय प्राप्त कर तीसरी बार पूर्ण बहुमत की सरकार बनाई थी. यदि मत प्रतिशत का अंतर देखें तो भाजपा ने जहाँ 45.19 प्राप्त किये थे वहीँ कोंग्रेस को 36.79 प्रतिशत पर ही संतोष करना पड़ा था. विधानसभा की 200 सीटों वाले राज्य राजस्थान की बात करें तो यहां पर भी पिछली बार साल 2013 में चुनाव हुए थे. भाजपा ने यहाँ भी कोंग्रेस को मात्र 21 पर समेटते हुए 163 सीटें प्राप्त कर यहाँ अपना झंडा गाड़ा था. पूर्वोत्तर राज्य मिजोरम की बात करें तो 40 सीटों वाले मिजोरम में कांग्रेस की पूर्ण बहुमत की सरकार है. पिछले विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को 34 सीटों पर विजय मिली थी. जबकि 5 सीटें मिजो नेशनल फ्रंट के खाते में और एक सीट पर मिजोरम पीपुल्स कांफ्रेंस को जीत हासिल हुई थी. भाजपा यहाँ अपना खाता खोलने में भी विफल रही थी. अंत में बात करते हैं विधानसभा के 119 सीटों वाले दक्षिण के राज्य तेलंगाना की. पिछले चुनाव में जहाँ सत्तारूढ़ टीआरएस को 63 सीटों पर जीत हासिल हुई थी, वहीँ कांग्रेस को 21, तेलुगु देशम पार्टी 15, एआईएमआईएम को 7, बीजेपी को 5 और अन्य को 8 सीटें मिली थीँ. गौरतलब है की इस बार वहां सत्तारूढ़ दल टीआरएस हराने के लिए गैर भाजपाई महागठबंधन बनाया गया है और नतीजे ही बताएँगे कि वहन ऊंट किस करवट बैठेगा. उपरोक्त आंकड़ों से इतना तो स्पष्ट है कि पनघट की डगर सभी के लिए बहुत ही कठिन सिद्ध होगी. एक ओर जहाँ भाजपा के लिए केंद्र की सत्ता पर पुनः काबिज होना है तो चूंकि उसका मार्ग मध्यप्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ से होकर ही गुजरता है तो ऐसे में उसे इन राज्यों में अपना 2013 का प्रदर्शन दुहराना ही होगा. वहीँ दूसरी ओर कांग्रेस सहित सभी विपक्षी दलों के लिए 2019 के महा समर के लिए भाजपा के इन किलों को ध्वस्त करना अति आवश्यक है. क्यूंकि इससे जहाँ एक ओर भाजपा की शक्ति कम होगी वहीँ दूसरी ओर विपक्षी दलों का मनोबल भी सातवें आसमान पर होगा और वह दुगनी शक्ति से 2019 के चुनावी समर में कूद सकेंगे. अब यक्ष प्रश्न यही है कि क्या ऐसा संभव होगा ? चुनावों में सबसे पहले दलों का गठबंधन, टिकटों का बंटवारा और बागी उम्मीदवारों की उपस्थितिआदि समस्यायों से झूझना पड़ता है जिनका असर चुनावों के नतीजों पर अवश्य ही पड़ता है. उसके पश्चात् चुनावी मुद्दों का मतदाताओं पर असर व मतों का स्थानांतर और फिर अंत में निर्णायक भूमिका निभानेवाले तटस्थ मतदाताओं का झुकावचुनावों के नतीजों को बहुत ही प्रभावित करता है. कुछ भी आंकलन करने से पूर्व हमें भारतीय मतदाताओं की सोच का एक गहन अध्ययन करना होगा कि भारतीय मतदाता स्थानीय, प्रादेशिक और राष्ट्रिय मुद्दों में अंतर करना भलीभांति समझते हैं. ऐसे में राज्यों के चुनाव का असर लोकसभा के आम चुनावों पर कितना पड़ता है इसका तो महज कयास ही लगाया जा सकता है.

 

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