मुंबईकरों के कैसे दिल में बसे बाला साहेब ठाकरे

विवेक कुमार पाठक

मुंबई में मराठीभाषियों के हक के लिए रौबदार आवाज कहे जाने वाले बालासाहेब ठाकरे पर फिल्म आ गयी है। बाला साहेब का जितना मजबूत व्यक्तित्व था फिल्म भी उसी तरह वजनदार बतायी जा रही है। कड़क आवाज, केसरिया कुर्ते में विशाल जनसमूह के सामने हाथ जोड़ते नवाजुद्दीन सिद्की वास्तव में गजब अभिनय करते दिखे हैं। महाराष्ट्र की राजनीति में बालासाहेब ठाकरे के कद का अनुमान इस बात से लगाया जा सकता है कि उनके निधन पर कांग्रेस के बुर्जुर्ग व देश के तत्कालीन प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह ने कहा था कि महाराष्ट्र की राजनीति में बाला साहेब का योगदान अतुलनीय था जो भुलाया नहीं जा सकता। बेशक अपने राजनैतिक जीवन में उन पर भड़काउ भाषण देने के आरोप लगे हों, कई बार उनके शब्द विपक्षियों के हृदय में तीर की तरह रहे हों या मुंबई  में रहने वाले तमाम गैर हिन्दू उनकी पार्टी को वोट न देते हों मगर वे बाला साहेब की शख्सियत को कभी नकार नहीं सकते। बाला साहेब ठाकरे ने अगर मुंबइकरों और मराठीभाषियों के हक के लिए गरजना शुरु किया तो ये इसके एक नहीं तमाम कारण रहे होंगे। महाराष्ट्र का अपना एक समृद्ध और वैभवशाली इतिहास रहा है। वीर शिवाजी महाराज की भूमि पर तमाम संतों से लेकर बालगंगाधर तिलक जैसे स्वाधीनता संग्राम के योद्धा हुए हैं जिन्होंने अंग्रेजी हुकुमत का नरम नहीं गरम विचारों के साथ विरोध किया। देश में गणपति महोत्सव महाराष्ट्र से शुरु हुए गणपति उत्सव का ही बड़ा रुप है। जय शिवाजी और जय भवानी के वीर भाव में रहने वाले मराठीभाषियों ने भी मुंबई में तुष्टिकरण और उसके परिणाम भुगते हैं। बाला साहेब ठाकरे जैसे प्रखर हिन्दूवादी मराठी मानुषों की इसी प्रतिक्रिया के कारण हिन्दू सम्राट बन पाए। ठाकरे की दृढ़ता, अन्याय पर प्रहार के नारे ने उन्हें मराठीभाषियों के हक की आवाज बना दिया। वे काटूर्निस्ट से संपादक और फिर सामना से गरजने वाले मुंबई की आवाज बन गए। बाला साहेब ठाकरे शिवसेना को 1995 में महाराष्ट्र की सत्ता में ला पाए क्योंकि वे महाराष्ट्र के करोड़ों लोगों द्वारा पसंद किए गए। हर सत्ता की अपनी जवाबदारी होती हैं और उस पर अंकुश न रख पाने वाले सत्ता को खो देते हैं। महाराष्ट्र में केसरिया लहराने वाले ठाकरे के शिवसैनिक भी कई दफा गैर अनुशासित हुए। मुंबईकरों के हक के लिए लड़ते लड़ते शिवसैनिक बाकियों को बेगाना भी समझने लगे। वे भूल गए कि बाला साहेब ठाकरे की गर्जना मुंबइकरों के हक के लिए थी मुंबईकरों को बदनाम करने के लिए नहीं। वे भूल गए कि बालासाहेब भी जय महाराष्ट्र से पहले जय हिन्द बोलते थे। संजय राउत की ये फिल्म बाला साहेब ठाकरे के उग्र हिन्दुत्व पर यही बहस शुरु करती है। हर व्यक्ति जीवन में लगातार बदलता है। मराठीभाषियों के लिए बोलने वाले बाला साहेब आगे पूरे महाराष्ट्र और देश के लिए लगातार बोले मगर उनकी प्रखर हिन्दुत्व छवि में वो सब ओझल हो गया। सीमा पर भारतीय सैनिकों पर हमले के दौरान पाकिस्तान से क्रिकेट खेलने का उन्होंने विरोध किया जो एक राष्ट्रवादी कदम था। बाला साहेब यूपी वाले अभिनेता अमिताभ बच्चन के जीवन को बचाने सबसे पहले तब आए जब वे जिंदगी और मौत के बीच खड़े थे। वे मराठी के प्रति भले ही आग्रही रहे हों मगर उन्होंने सामना का हिन्दी संस्करण दोपहर का सामना शुरु कराया। मुंबई सिने जगत में उनके प्रति श्रद्धा आए दिन मातोश्री में सितारों की उपस्थिति के कारण दिखती थी।फिल्मों के लिए कुछ किरदार होते ही ऐसे हैं जो स्वयंभू सुपरहिट ब्लॉक बस्टर हैं। सचिन तेंन्दुलकर, लता मंगेशकर , अमिताभ बच्चन कई नाम हैं।नवाजुद्दीन सिद्दकी को भी बाला साहेब ठाकरे की बायोपिक में केन्द्रीय भूमिका के जरिए यही अवसर है। उनकी अब तक की फिल्मों में जीवंत अदाकारी के कारण वे इसका हक भी रखते थे। रहा सहा आशीर्वाद उनके बाला साहेब के इकहरे चेहरे मोहरे के कारण मिला।भारतीय राजनीति में 1960 से शुरुआत करके पांच दशक तक चर्चित रहना ठाकरे की बड़ी उपलब्धि थी। वे खरा खरा, साफ सपाट और हर बार आवेश में बोलने के कारण मीडिया के चहेते बने रहे। ठाकरे की धमक महाराष्ट्र ही नहीं देश के दूसरे राज्यों में भी थी। वे उग्र हिन्दुत्व के बाद अगर सौम्य हिन्दुत्व और सबको साधना जानते तो हो सकता था कि शिवसेना का विस्तार महाराष्ट्र से बाहर हो जाता। वो देश के दूसरे राज्यों में भी मजबूत हो जाती। बाला साहेब के प्रति विपक्षी और उदार हो जाते मगर ठाकरे नहीं बदले। ये उनका अपना अंदाज और जीवन दर्शन था। पहले मुस्लिमों और बाद में गैर मराठियों और उनके प्रति शिवसैनिकों की उग्रता बड़ा विषय रहा है जिस पर जिम्मेदारी से बड़ी बहसों और सोच में हर तरफ से बदलाव की जरुरत है। क्रिया और प्रतिक्रिया का सिद्धांत चाहकर भी नहीं झुठलाया जा सकता। निर्देशक व सांसद संजय राउत ने नवाजुद्दीन को केन्द्रीय भूमिका में रखकर बड़ा संदेश दिया है तो नवाजुद्दीन का किरदार और उनके ठाकरे के प्रति विचार अपने आप में ही संदेश है। अमित पांसे की यह फिल्म भारतीय राजनीति के बड़े किरदार को फिल्मांकित करती है सो भारत को जानने समझने के लिए सिनेमा से यह अच्छा अवसर है। फिल्म में अमृता राव मीना ताई के संजीजा किरदार में हैं जिसे देखकर जानना दिलचस्प होगा। देश की वो पीड़ी जिसने शिवसेना के नाम पर सिर्फ उद्धव ठाकरे को देखा है उसे हिन्दू हृदय सम्राट बाला साहेब ठाकरे को देखने का यह अच्छा मौका है। 

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