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    भारतीय एकता के प्रतीक राम, नेपाल के कैसे हो गए?

    कोरोना संक्रमण का तूफान थमने का नाम नही ले रहा है। सम्पूर्ण विश्व इस महामारी की मार से जूझ रहा है। तो वही कुछ देश इस महामारी की मार में भी अपने गुप्त मनोरथ को पूर्ण करने में लगें है। चीन अपनी विस्तारवादी नीति से वैश्विक पटल का सरदार बन जाना चाहता तो उसी के  समकक्ष एक नाम नेपाल का उभर रहा, जो चीन की गोदी में बैठने को इस कदर लालायित है कि वह वर्षों पुराने मित्र भारत से कई अर्थों में बगावत कर रहा। वह पहले नेपाल में कोरोना फैलने का जिम्मेदार भारत को ठहराता। उसके बाद तो उसकी हिमाक़त इतनी बढ़ जाती कि जो मर्यादा पुरुषोत्तम राम हर भारतवासी के दिलोदिमाग में बसते, उन पर अपना अधिकार जताते में बाज नहीं आता। नेपाल के प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली राम को नेपाल का बेटा बताने लगते हैं। उसके बाद बात यहां तक बढ़ जाती कि नेपाल के विदेशमंत्री प्रदीप ज्ञवली ने कहा कि हम केवल विश्‍वास के आधार पर सभी बातों को मान रहे, रिसर्च से इतिहास बदल जाएगा। अब ओली राम को किस कारण से और क्यों नेपाली बताते यह तो वही जानें, लेकिन मर्यादा पुरुषोत्तम राम और उनकी अयोध्या सिर्फ़ भारत की है। मनाने के लिहाज़ से सबके अपने-अपने राम हो सकते, क्योंकि कबीरदास जी ने कहा है कि, “घट बिन कहूँ ना देखिये राम रहा भरपूर,जिन जाना तिन पास है दूर कहा उन दूर।।” अब जब राम रूपी ईश्वर सभी के शरीर के भीतर ही वास करता हो, फ़िर राम तो सभी के हैं लेकिन वास्तविकता तो यह है कि साक्षात राम अयोध्या के राजा थे और अयोध्या सरयू नदी के तट पर भारत में ही है। 
          वैसे भारत के गौरवशाली इतिहास को कमतर आंकने या उसे छोटा करने की साजिश कोई नई नहीं। ऐसे में हो सकता ओली भी शायद उसी मानसिकता से राम को अपना बता रहें हो। लेकिन यहां ओली को पता होना चाहिए कि भारत की सभ्यता व संस्कृति को धूमिल करने का प्रयास सदियों से होता रहा है। सदियों से देश को बांटने की गंदी राजनीति होती रही है, लेकिन कुछ नही बदला तो वह है इस देश की सनातनी संस्कृति। फ़िर केपी शर्मा ओली का बयान कि अयोध्या भारत में नहीं है। इससे न नेपाल के कोई मंसूबे पूरे होने वाले और न ही उसके आका चीन के मनोरथ। ओली कितना भी कह लें कि असली अयोध्या नेपाल के बीरगंज के गांव में है। भारत की अयोध्या नकली है। कहने से इतिहास नहीं बदल जाता। हां बशर्ते वे अयोध्या और राम को अपना बताते हुए यह भूल गए कि इतिहास में जिस अयोध्या का जिक्र किया गया है जहां भगवान राम जी ने जन्म लिया था वह सरयू नदी के तट पर बसी है। अब ओली जी सरयू नदी कहाँ से लाओगे नेपाल में कुछ इस विषय में भी ज्ञान दे दिया होता तो ज्यादा बेहतर रहता। ऐसे में लगता तो यही कि नेपाल के प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली का इतिहास बहुत कमजोर है। उन्हें इतिहास के पन्नो को उलट कर देख लेना चाहिए था। भारत की प्राचीन सप्तपुरियों में अयोध्या का नाम सबसे पहले आता है। अयोध्या को अथर्ववेद में ईश्वर के नगर के रूप में बताया गया है। स्कन्दपुराण के अनुसार अयोध्या भगवान विष्णु के चक्र पर विराजमान हैं। बेंटली एवं पार्जिटर विद्वानों ने भी ‘ग्रह मंजरी’  में प्राचीन भारतीय ग्रंथो के आधार पर अयोध्या की स्थापना का काल 2200 ई. पू. माना है। इस वंश में राजा रामजी पिता दशरथ के 63वें शासक के रूप में उल्लेख किया गया है। अयोध्या बृहदत के कई कालो के बाद मगध के मौर्य से कन्नौज के शासकों के अधीन रहा। महमूद गजनी  के भांजे सैय्यद सालार ने तुर्क शासन की स्थापना की। 1526 में बाबर ने मुगल राज्य की स्थापना की और उसके सेनापति ने 1528 में मस्जिद का निर्माण करवाया। अयोध्या हिंदुओ के साथ ही जैन तथा बौद्ध धर्म की भी तीर्थ नगरी रही है। यह तो प्राचीन इतिहास की बात हुई। अब नेपाल के प्रधानमंत्री को इतना प्राचीन इतिहास मालूम हो, इस पर तो संशय ही है, क्योंकि वह वामी समूह से ठहरे जिनका ईश्वर और ईश्वरीय रूप से नजदीकियां तो रही नहीं। लेकिन वह इस बात को कैसे भूल गए कि जिस देश में अयोध्या और राम जन्मभूमि को लेकर करीब 491 वर्ष तक विवाद चला हो। जिसका 9 नवम्बर 2019 को ऐतिहासिक फैसला आया हो। जिसमें अयोध्या को रामजन्मभूमि के रूप में न केवल मुस्लिम पक्ष ने भी स्वीकार किया हो बल्कि सम्पूर्ण विश्व इस ऐतिहासिक फैसले को स्वर्णिम दिवस के रूप में स्वीकार किया है। फिर कैसे अयोध्या को लेकर इस तरह से विवादित बयान दिया है यह सोचने वाली बात है। इतना ही नहीं नेपाल के विदेशमंत्री किस अनुसंधान की बात करते। इतने सारे प्रमाण तो हैं जो अयोध्या को भारत का और राम को अयोध्या का साबित करते हैं।
      ऐसे में नेपाल के प्रधानमंत्री यह बेशक भूल गए हो कि राम भगवान जन-जन के है । वे विश्व के हर इंसान के अंदर रचे बसे है। के पी ओली रामजी को अपना आदर्श मानते तो उनके मन मे ये विचार कभी नही पनपते। लेकिन जब शब्द किसी ओर के और दिमाग कोई और देश चलाये तो ऐसी गलतियां हो ही जाती है। अब ये बात तो ओली ही जाने की वे इस बयान को देकर चीन से अपने किन मंसूबो को पूरा कराना चाहते है। लेकिन नेपाल ने न केवल इस तरह का बयान जारी कर भारतीय जनमानस को आहत किया है, अपितु ठेस तो नेपाली अवाम को भी पहुँचाई है। राम हिंदुस्तान की सांस्कृतिक विरासत है। राम हिन्दुओ की एकता और अखंडता के प्रतीक हैं। राम मानव की चेतना का प्रमाण है। डॉ राममनोहर लोहिया कहते है, कि जब भी महात्मा गांधी ने किसी का नाम लिया तो राम ही क्यों कहा? क्योंकि राम देश की एकता के प्रतीक हैं। दिल्ली में स्थित संस्था इंस्टीट्यूट ऑफ साइंटिफिक रिसर्च ऑन वेदा आई सर्व ने आधुनिक विज्ञान से जुड़ी 9 विधाओं, आंतरिक्ष विज्ञान, जेनेटिक्स, जियोलॉजी, आर्कियोलॉजी और इमेजरी आधारित रिसर्च में दावा किया है कि भारत में सभ्यता पिछले 10 हजार साल से विकसित हो रही है। वेद और रामायण में भी जिन खगोलीय स्थितियों का वर्णन है उन्हें आज भी विज्ञान की कसौटी पर प्रमाणित किया जा सकता है। इन सारे प्रमाणों के बाद भी राम और अयोध्या को लेकर विवादित बयान देना मूर्खतापूर्ण कार्य है। लेकिन ओली को कौन समझाए वह तो चीन की गोदी में बैठकर ही नेपाल के सुनहरे भविष्य का खाका खींचना चाहते।

    सोनम लववंशी

    सोनम लववंशी
    सोनम लववंशी
    स्वतंत्र लेखिका

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