लौहपुरुष वल्लभभाई पटेल, सरदार पटेल कैसे बने

31 अक्टूबर को सरदार पटेल जयंती पर विशेष,
19 वीं शताब्दी के मध्य भारत में अंग्रेजों के खिलाफ 1857 की क्रांति की प्रतिध्वनियां सुनाई दे रही थी, इसी काल में 1875 में स्वामी दयानंद ने आर्य समाज की स्थापना कर भारत में सर्वप्रथम स्वराज की मांग का नारा बुलंद किया। इसी समय 31 अक्टूबर 1875 को गुजरात के खेड़ा जिले में करमसद गांव में झवेरभाई पटेल के घर वल्लभभाई पटेल का जन्म हुआ था। झवेरभाई 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के सिपाहियों की मदद के कारण अंग्रेजों की निगाह में थे, अतः उन्होंने 3 साल गांव छोड़ दिया था, परंतु स्वतंत्रता के सिपाहियों के साथ रहने के कारण इंदौर में इन्हें गिरफ्तार कर जेल में डाल दिया। कुछ समय बाद इंदौर नरेश ने इन्हें जेल से रिहा कर दिया। अतः वल्लभभाई पटेल की धमनियों में स्वराज व स्वाधीनता का रक्त वंशानुगत प्रावाहित हो रहा था। प्रारंभिक शिक्षा गांव में ही हुई, अंग्रेजी पढ़ाई के लिए गांव से सात मील दूर पेटलाद प्रतिदिन पैदल पढ़ने जाते थे, हाईस्कूल की पढ़ाई नड़ीयाद में की। इसी समय से सरदार बनने के पद पर चल पढ़े तथा निर्भिकता, दंबगता, स्पष्टवादिता, सत्यता का जामा उन्होंने पहन लिया था। एक दिन की बात है, ये कक्षा में नियमित जाते थे, लेकिन शिक्षक पिरीयड के बाद भी ऑफिस में बातें किया करते थे, एक दिन कक्षा का एक छात्र गाना गाने लगा, क्योंकि शिक्षक क्लास रुम में नही आए थे, उस छात्र के साथ सभी छात्र गाना, गाने लगे। शोर सुनकर शिक्षक कक्षा में आए और उस छात्र को डांटने लगे। वल्लभभाई ने शिक्षक से कहा आप इस छात्र को क्यों डांट रहे हो, आप तो कक्षा में नही आए, इस पर शिक्षक ने वल्लभभाई को कक्षा से निकल जाने की कहा तो वल्लभभाई ने सभी छात्रों की ओर देखा सभी छात्र वल्लभभाई के साथ क्लास से निकल गए। शिक्षक ने प्रधानाध्यापक भरुचा से इस बात की शिकायत की तो वल्लभभाई ने निडरता से सच्चाई से सारी बात प्रधानाध्यापक को बताई तो प्रधानाध्यापक समझ गए कि छात्रों के गलती नही है, उन्होंने सभी छात्रों को कक्षा में बैठने की कहा। इस पर शिक्षक चुपचाप सब देखते रहे। यह उदाहरण वल्लभाई के नेतृत्व एवं निर्भिकता के गुणों को प्रकट करता हैै। पटेल नड़ियाद से बड़ौदा पढ़ने गए यहां डिस्टीक प्लीडर की परीक्षा पास की इस परीक्षा के बाद बेरिस्टर की पढ़ाई कर सकते है। पटेल के पास विलायत जाने के लिए धन नही था, उन्होंने वकालात कर धन व यश दोनों कमाया। वकालात के समय वल्लभाई का दबदबा था। मजिस्टेªट भी सावधान होकर जिरह करते थे। सरदार पटेल ने विलायत जाने के लिए जिस कंपनी से पत्र व्यवहार किया था, उसके प्रति उत्तर में जो पत्र मिला वह वीजे पटेल के नाम से था। पत्र उनके बड़े भाई विट्ठलभाई को मिल गया (अंग्रेजी में दोनों भाई वी.जे.) पटेल के नाम से जाने जाते थे। विट्ठलभाई ने सरदार पटेल से कहा मैं बड़ा हंू, मुझे बरिस्टरी पढ़ाई के लिए जाने दो, सरदार पटेल ने बड़े भाई की बात स्वीकार कर ली। यह त्याग, भाईयों का प्रेम था। वल्लभाई बाद में ब्रिटेन में बेरिस्टरी की पढ़ाई करने गए, वहां मीडिल टेंपल पुस्तकॉलय घर से 11 मिल दूर था। प्रतिदिन वे पैदल ही जाकर पुस्तकालय जाते थे। बेरिस्टरी की परीक्षा उत्तीर्ण कर आए पटेल ने अहमदाबाद में वकालात शुरु की। उस समय राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने अहमदाबाद में साबरमती आश्रम की स्थापना कर दी थी। प्रारंभ में वल्लभभाई पटेल गांधीजी के संपर्क में नही थे। लेकिन 1917 में गोधरा में गुजरात राजनैतिक परिषद् का अधिवेशन हुआ, उसमें जो प्रस्ताव पारित हुए, जैसे हरिजन आश्रम खोलना, बैगार प्रथा का विरोध, इन बातों से वल्लभभाई गांधीजी से प्रभावित हुए। उस समय खेड़ा जिले में कम वर्षा के कारण चार आना फसल भी नही हुई। लेकिन सरकार ने लगान वसूल करने में शक्ति का प्रयोग किया। नियम यह था, चार आने से कम फसल होने पर लगान वसूल नही कर सकते थे। गांधीजी व वल्लभभाई गांवों में घूमे और किसानों से लगान नही देने की कहा और सत्याग्रह किया। इसके बाद वल्लभभाई गांधी से प्रभावित हुए और उनके अनुयायी हो गए। गांधीजी ने कहा था कि खेड़ा जिले के सत्याग्रह मुझे अमूल्य वस्तु प्राप्त हुई है, वह वल्लभभाई है। पहले तो गांधीजी भी वल्लभाई को अक्खड़ पुरुष समझते थे, लेकिन संपर्क में आए तो उन्होेंने कहा कि मुझे उप सेनापति मिल गया। जिस प्रकार रामकृष्ण परमहंस ने विवेकानंद को पहचान लिया था। एसे ही गांधीजी ने वल्लभभाई को पहचान लिया। असहयोग आंदोलन के समय से वल्लभाई ने वकालात छोड़ दी तथा जनसेवा में जीवन समर्पित कर दिया और वल्लभभाई, सरदार पटेल बनने के मार्ग पर चल पड़े। इसी समय वल्लभभाई अहमदाबाद म्यूनसीपार्टी में सेनटरी कमेटी के सभापति थे, अहमदाबाद में पानी की परेशानी को उन्होंने दूर किया। 1923 में नागपुर में राष्ट्रध्वज लेकर चलने के संघर्ष का नेतृत्व किया तथा सत्याग्रहियों को छुड़ाया। बोरसद तालुके में गोरेल नामक गांव था, यहां जरायपेशा जाति के लोगों पर चाहे (अपराधी हो या न हो) सभी पर ढ़ाई रुपया मंुड कर लगाया। इसी प्रकार बाहर जाने पर पुलिस से हाजिरी देना इत्यादी निरंकुश नियमों का 1924 में वल्लभभाई ने कड़ा विरोध किया। आखिरकार अंग्रेजों को यह कर हटाना पड़ा। 1927 में गुजरात में भंयकर वर्षा हुई, कुछ इलाकों में तीन दिन में 41 इंच वर्षा हो गई। उस समय वल्लभभाई अहमदाबाद म्युन्सिपार्टी के अध्यक्ष थे। अतः उन्होंने स्वयं के प्रयास एवं जनजागृति से इस कठिन समय में लोगों की मदद की। जनता वल्लभभाई को अपना तारणहार मानने लगी। इसी समय खेड़ा जिले के कलेक्टर के बंगले के चारों और वात्रक नदी का पानी फैल गया। एसे समय वल्लभभाई सिर पर तैयार भोजन लेकर कमर-कमर पानी में कलेक्टर एवं अन्य व्यक्तियों तक पहंुचे। लार्ड इरवीन से मिलकर एक करोड़ की सहायता लेकर लोगों का पुर्नवास कराया। 1928 में बारडोली में जमीन का रिविजनल सेटलमेंट हुआ। इससे लगान में 22 प्रतिशत की वृद्धि हो गई। किसान वल्लभभाई के पास गए तो वल्लभभाई ने कहा कि तुम जुल्म के खिलाफ लड़ने के लिए तैयार हो तो मैं तुम्हारी मदद करने को तैयार हंू। किसान हाथ उठाकर इस लड़ाई को लड़ने के लिए तैयार हो गए। वल्लभभाई, गांधीजी से मिले और कहा अंग्रेजों से लड़ाई लड़नी है, 4 फरवरी 1928 को वारडोली में 80 गांवों के लोग एकत्रित हुए। वल्लभभाई ने उनसे कहा तुम, मरने-खपने के लिए तैयार हो तो सभी ने हां कर दी, वारडोली में सत्याग्रह शुरु हो गया। वल्लभभाई ने किसानों से कहा अंग्रेज तुम्हारी जमीन छिन रहे, पशु ले जा रहे है, इनसे डरने की जरुरत नही है। यह जमीन हमारे बाप-दादाओं की थी और रहेगी। बारड़ोली की जनता सत्याग्रह की भट्टी में जोश के साथ तप रही थी। निराश नही थी। क्योंकि वल्लभभाई उनके साथ थे, गांधीजी भी बारडोली आए लोगों ने गांधीजी से भाषण देने की कहा, गांधीजी ने कहा बारडोली के सरदार की आज्ञा है कि मेरे सिवाय कोई भाषण न दे। मैं सरदार की आज्ञा का उल्लंघन नही कर सकता। वे एक शब्द भी नही बोले और आंदोलन को हृदय से आशीर्वाद देकर चले गए। लोगों के जोश व वल्लभभाई के प्रभाव से गांधीजी काफी खुश हुए। उसी दिन से वल्लभभाई को सरदार की उपाधि मिली। गुजरात के सरदार संपूर्ण भारत के सरदार बन गए। बंबई के टाइम्स ऑफ इंडिया के प्रतिनिधि ने सारे दृश्य को देखकर कहा, बारडोली में वोलशेजियम चल रहा है। वल्लभभाई उसके लेनिन है। वल्लभभाई का जीवन तूफानों में बीता, 30 वर्ष की उम्र में पत्नी का देहांत हो गया, उसके बाद उन्होंने दूसरी शादी नही की। उनके एक पुत्र डाहाभाई व पुत्री मणिबहन थी। मणिबहन पिता के कदमों पर चली। आजीवन कोमार्यव्रत का पालन किया और पिता की सेवा की। शादी के नाम पर राष्ट्र से शादी की और जीवनभर राष्ट्र की सेवा की। राष्ट्र की बनकर ही रही। सरदार पटेल गांधीजी के हर कार्य में प्रमुखता से भाग लेते थे, अंग्रेज सरदार पटेल से खौफ खाते थे, इसलिए नमक सत्याग्रह 12 मार्च 1930 को साबरमती आश्रम से प्रारंभ होना था, लेकिन पटेल को 7 मार्च को ही गिरफ्तार कर लिया। बाद में सभी नेताओं को गिरफ्तार कर लिया। मणिबहन पटेल को भी गिरफ्तार कर लिया। उनके ठोस इरादों व दृढ़ प्रतिज्ञा के कारण उन्हें सरदार की उपाधि मिली। 1932 में वल्लभाई पटेल की माताजी का निधन हुआ। उस समय वल्लभभाई 16 माह की सजा गांधीजी के साथ यवरदा जेल में थे। अंग्रेज उन्हें कुछ शर्तों के साथ उनकी माताजी के अंतिम संस्कार में जाने की छूट देने को तैयार थे, लेकिन सरदार उनकी शर्तों को मानने को तैयार नही हुए। अंतिम संस्कार में भी नही गए। बड़े भाई विट्ठलभाई के अंतिम संस्कार में भी इन्हीं शर्तों के कारण शामिल नही हो पाए। यही कुछ एसे कार्य वल्लभाई के थे जो सरदार उपाधि की शोभा बढ़ाते है। देश 15 अगस्त 1947 को आजाद हो गया। लेकिन अंग्रेजों ने देश के विभाजन के साथ-साथ एक और बात यह कही कि 565 देशी राजा स्वतंत्र है, वो चाहे तो भारतीय संघ में मिले या पाकिस्तान में मिले। उस समय जवाहरलाल नेहरु प्रधानमंत्री थे और सरदार पटेल गृहमंत्री थे। सरदार पटेल ने कुशलता, कूटनीतिज्ञता, दूरदर्शिता से रियासतों का भारतीय संघ में विलीनीकरण कराया। वहीं हैदराबाद  और जूनागढ़ की रियासतों को कठोरतापूर्वक सैनिक कार्रवाई का भय बताकर विलीनीकरण कराया। 15 दिसम्बर 1950 को सरदार पटेल का मुम्बई में निधन हुआ। 5 लाख लोगों ने अपने लाड़ले सरदार को बिदाई दी। वल्लभभाई ने सरदार शब्द का मान-सम्मान बढ़ाया, यह उपाधि कठोर, श्रम, तपस्या करने वालों को ही मिलती है। उपाधि के लिए धन, सम्पन्नता और वैभवता की आवश्यकता नही है। यह वल्लभभाई ने अपने जीवनकाल में सिद्ध किया।

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