लेखक परिचय

आर.एल. फ्रांसिस

आर.एल. फ्रांसिस

(लेखक पुअर क्रिश्वियन लिबरेशन मूवमेंट के अध्‍यक्ष हैं)

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हमारे देश में यह पहली बार नहीं है कि किसी तथाकथित बाबा पर लोगों को गुमराह करके पैसे ऐंठनें का इल्जाम लगा है। मेरे ख्याल से जितने पुराने हमारे विभिन्न धर्म है लगभग उतना ही पुराना धर्म को धंधा बनाकर पैसे या अन्य कीमती वस्तुओं को हड़पने वाले असितत्व में रहे है। निर्मल बाबा बड़ी तेजी से उभरने वाले एक बाबा है जिन्होने कुछ ही समय में सभी नये-पुराने मोक्ष, मुक्ति, छुटकारा दिलाने वाले कृपामयी लोगों को पीछे छोड़ दिया था। यह इतनी जल्दी देश-विदेश में शायद न छा पाते यदि इन्होनें अपनी प्रसिद्धि के लिए मीडिया का सहारा नही लिया होता। सवेरे उठते ही किसी भी अधार्मिक चैनल को आन कीजिए, आप इनके दर्शन प्राप्त कर लेंगे। इनके कृपा देने का तरीका भी एकदम हट के फिल्मों की तरह होते है। किसी के लिए रूपयों का दान, किसी के लिए किसी खास पूजास्थल को जाने का आदेश, काम बन गया तो ठीक नही तो जो नही कर पाये उसी की कमी बता दी।

इसमें कोर्इ शक की गुंजाइश नही रह गर्इ है कि धर्म को एक धंधे के रूप में कर्इ लोगों ने विकसित कर लिया है। जिस प्रकार एक गंभीर बीमारी से पीडि़त व्यक्ति इलाज की हर पद्धति अपना लेता है, ठीक उसी तरह दु:खी और निराश व्यक्ति भी किसी भी तरह के सान्त्वना और रास्ते दिखाने वाले व्यक्ति की शरण में चला जाता है। कभी बच्चों की बलियों के नाम पर या कभी उनके दु:ख हरने के नाम पर, ये लोग जनता की अंध भकित या अति भकित का समुचित दोहन करना जानते है। इस प्रकार के लोगों की पैठ गाँव, कस्बो, मुहल्लों से लेकर चकाचौंध करने वाले शहरों और विदेशों तक में है। संगठित और असंगठित हर रूप में इस प्रकार के लोग आपको मिल जाऐंगे। सवाल यह उठता है कि कैसे और कब से लोगों ने ऊपरवाले का सहारा छोड़ इन नीचे वालों को अपनाना शुरू कर दिया? कब से वे लोग जो पहलें केवल अपने धर्मानुसार पूजास्थलों पर जाकर अपने आराध्य को प्रणाम किया करते थे, आजकल इन बाबाओं को प्रणाम करने लग गये?

यह एकता की अखंडता है, जी हाँ, एकता कुछ लोगों की, जो संगठनात्मक रूप ले लेती है और फिर खेल शुरू होता है चकाचौंध और ग्लैमर रूपी दीपक का जिसमें आम जनता, जिनके कदम-कदम पर दु:ख, तकलीफें बिछी हुर्इ है, पतंगे की तरह खीचती चली आती है। इस खेल में मीडिया, नेताओ, उधोगपतियों और कुबेरपतियों का भी समय-समय पर इस्तेमाल किया जाता है। जहाँ ये कुबेरपति अपने काले धन को धर्म के रास्तें सफेद बना लेते है, वही टीवी पर इन काले धन की महिमा की चकाचौंध से आम आदमी की आँखें भी चौंधिया जाती है।

दु:ख तो इस बात का है कि जहाँ हम 21वी सदी में रहते हुए भी इन चक्करों से निकल नही पाये है, वही कुछ मीडिया के समझदार और जिम्मेदार लोग भी जानबूझकर ऐसे लोगों का महिमामंडन कर न केवल उनके कारोबार को चार चाँद लगवा रहे है, बलिक अपनी उस सामाजिक जिम्मेदारी से भी मुँह मोड़ रहे है जो केवल इंसान के तौर पर ही नहीं बलिक उनके पेशे की भी अनिवार्यता है। केवल वे ही नही बलिक ऐसे समय में उन धर्म का झंडा बुलंद करने वाले लोगों की जबान भी शांत रहती है जो अपने आप को देश और धर्म का एकमात्र हितैषी समझते है। आशा है कि वे भी इन बाबाओ के खिलाफ भी अपना सफार्इ अभियान चलायेगें जो न केवल देश की जनता की आस्था के साथ खेल रहे है बलिक जिस धर्म का वे झंडा उठाये रहते है उस को भी कलंकित कर रहे है।

अन्त में उन बच्चों कों बधार्इयाँ जिन्होनें इस ओर लोगों का ध्यानाकर्षण कराया। हालांकि अब तक बाबाजी पर काफी कृपाऐं बरस चुकी है, लेकिन यही कहा जा सकता है कि –देर आयद दुरूस्त आयद

4 Responses to “कितने निर्मल, कितने बाबा”

  1. tapas

    बाबाजी आप लोगो पर कृपा कर के उनसे फायदे का १०% लेते हो … जिसे आप ” दसवंद ” कहते हो …
    तो आप पर जो संकट के बदल छाये है यानि की जो ऊपर वाले की कृपा रुकी हुयी है उसके समाधान के लिए आप भी दसवंद या हो सके तो तिसवंद , पचासवंद नेताओ और ईन मीडिया वालो को दान कर दो … रुकी हुई कृपा शुरू हो जाएगी 🙂

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  2. rtyagi

    मानव प्रवृत्ति होती है की वह शॉर्ट कट ही ढूँढता है.. ताकि महनत न या कम करनी पड़े एवं फल भी उत्तम मिल जाये! एवं उस शॉर्ट कट को बताने वाले या शोर्ट कट का भ्रम पैदा करने वाले को इंसान पूजने लगता है… इसी से तथाकथित पैसा बनाने वाले बाबाओं/पुजारियों की दुकान चल रही हैं. यह हाल लगभग सभी मुख्य धर्मों का है…

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  3. suresh goyal

    आज देस में एक नहीं अनेक निर्मल बाबा हें हमारे देस में भोले भले लोगो के अतरिक्त समझदार पढ़े लिखे लोग भी इन सातिरो के सिकार हो रहे ह

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  4. vedvibhu

    यहां आपने जो जानकारियां दी हैं इनसे यह कहीं साबित नहीं होता कि निर्मल बाबा के पास आया धन अवैध है या यह ठगी द्वारा अर्जित किया गया है। आज के समय में जब अरबपतियों की लंबी शृंखला है तथा हसन अली जैसे लोगों के हजारों लाखों करोड़ आय कर के शेष बताए जा रहे हैं तथा वोडाफोन व भारत सरकार के बीच कर को लेकर बहुत से नामचीन लोगों के प्रभाव से हजारों लाखों करोड़ की बेईमानियां हो रही हैं वहां पर कुछ करोड़ कमाना तथा हजारों लोगों को भक्तों की श्रेणी में लाना सहज नहीं है। किसी भी समय में ईश कृपा के नाम पर व्यक्ति, संस्था, स्थान का महत्त्व हो जाता है व आनन फानन में लोगों का वहां जाना व चढ़ावा मन्नत का कार्यक्रम आरंभ हो जाता है।
    पत्रकारिता का धर्म तो यह है कि हम समाज को जागृत करते हुए तथ्य सम्मत कार्य करें न कि व्यक्तिगत विश्वास के आधार को बनाने या बिगाड़ने का अभियान चलाएं। ईसाईयों द्वारा विभिन्न चैनलों पर छूकर, क्रॉस दिखाकर, पानी छिड़क कर विश्वास विश्वास की चिल्लपौं के बीच जो चमत्कार दिखाकर लोगों को अपने समाज अपने विश्वास अपनी परंपराओं तथा देशज संस्कृति से दूर करने के प्रयास हो रहे हैं उन पर न तो बुद्धिजीवी बोले हैं न आपत्तियां कतिपय सुधारकों की हैं। खुले आम मूर्तिपूजकों को समाप्त करने वाली अललाह की सत्ता के पैगंबर ने न तो कोई फरिश्ता दिखाया न यहूदियों व ईसाईयों को उनकी पैगंबर परंपरा के तर्क संगत उत्तर दिए अपितु उन्हें भी समाप्त करने की बातें कहीं। न तो यह दर्शन सहिष्णु है न किसी को सम्मान दे सकता है समान मानना तो दूर की बात है। फिर भी ये अवैध चैनल विदेशों से चलाकर भारत में कुप्रचार कर रहे हैं तो भी कोई आवाज नहीं उठ रही। कम से कम निर्मल बाबा पर इस तरह के पक्षपात की स्थिति नहीं है तो उनको विश्वास के आधार पर भारी भक्त संख्या होने पर खारिज करने का तर्क भी तो चाहिए।
    निर्मल बाबा ज्योतिष की लाल किताब के उपायों से प्रभावित होकर स्व प्रेरित पैगंबरी यदि कर रहे हैं तो भी यह आपत्तिजनक नहीं है क्योंकि आस्था पंथ उपासना की स्वतंत्रता है। सरल उपाय यदि प्रार्थना या चिल्ल पों वाली अरबी या कुरबानी हो सकती है तो कुछ भी हो सकता है। + नुमा क्रॉस से मुक्ति मिल सकती है तो स्वास्तिक से या अन्य प्रतीकों में बुराई नहीं है। इस विषय पर तुलनात्मक अध्ययन के साथ बात करें तो बेहतर होगा क्योंकि ये तो अंतर्राष्ट्रीय शक्तियां बन गए हैं बाबा की तो औकात ही क्या है पर विरोध उनका यह कहकर हो रहा है कि उनके पास करोड़ों रुपए आ गए हैं। जिसने अगोरा फिल्म देखी है या मध्यकाल की पोपलीला पर पुस्तकें पढ़ी हैं तथा पूरा अमेरिका आस्ट्रेलिया अफ्रीका की मूल जातियों को मारकर कब्जे का मानवीय इतिहास पढ़ा है वह इन ईसाईयों व वेटिकन के खूनी खेल को जान सकता है। यहां तक कि एशियाई देशों में यह खूनी खेल आज भी खेला जा रहा है बाबा पर यह आरोप लगाने वाले दर्पण स्वयं देखें।

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