शरीर में भी होता है, सौरमंडल – क्या आप जानते है

हमारे शरीर में भी एक ब्रह्मांड स्थित है। या यूं कहिए कि हमारा शरीर भी एक सूक्ष्म ब्रह्मांड है। विज्ञान कहता है की ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति कार्य कारण सिद्धांत पर आधारित है। इसका सरल अर्थ यह हुआ कि किसी भी कार्य के लिए उससे संबंधित कारण का होना आवश्यक है। जिस प्रकार हम भोजन इसलिए खाते है कि हमें भूख लगती है। अर्थात यहां भोजन और भूख का कार्य कारण सिद्धांत कार्य कर रहा है। ठीक इसी प्रकार इस संपूर्ण ब्रह्मांड की उत्पत्ति का कारण कार्य था, और इस ब्रह्मांड पर नियंत्रण बनाए रखने के लिए ईश्वरीय सत्ता को स्वीकार किया गया। यहां ईश्वर और ब्रह्मांड एक दूसरे के कार्य कारण सिद्धांत पर आधारित है। ईश्वरीय शक्ति हम सभी के जीवन और जीवन की घटनाओं को संचालित करने का कार्य करते है। यह सर्वविदित है कि मानवीय जीवन, प्रकृति और सभी सजीव वस्तुओं का जीवन और जीवन की घटनाएं ग्रहों के द्वारा नियंत्रित होती है।

हम सभी के जीवन को ग्रह प्रत्यक्ष रुप से प्रभावित करते है। आकाश में सौरमंडल विद्यमान है, यह हम सभी जानते है, इसी प्रकार हम सभी के शरीर में भी एक गतिमान सौरमंडल विद्यमान है और निरंतर कार्य कर रहा है। जिसमें सूर्य, चंद्र, मंगल से लेकर शनि तक है। सौरमंडल में नवग्रहों को स्वीकार किया गया है और मानव शरीर में स्थित ग्रहों में पृथ्वी को भी सम्मिलित किया गया है। इस प्रकार शरीर में 10 ग्रहों का होना माना गया है। आगे बढ़ने से पूर्व आईये इन ग्रहों के नाम जान लेते हैं- सूर्य, चन्द्रमा, मंगल, राहु, केतु, बुध, वृहस्पति, शनि, शुक्र और पृथ्वी ग्रह। 12 राशियां, 27 नक्षत्र और नवग्रह जीवन के चक्र को संचालित करते है।

ग्रह किस प्रकार राशियों को संचालित करती है, यह निम्न जाना जा सकता हैं। सिंह राशि पर सूर्य का स्वामित्व है। कर्क राशि चंद्र ग्रह की राशि है। बुध ग्रह मिथुन और कन्या राशियों पर अपना अधिकार रखते हैं। शुक्र के पास वॄष और तुला राशियां है। मंगल ग्रह मेष और वॄश्चिक का स्वामित्व रखते है। गुरु ग्रह की धनु और मीन राशियां है एवं मकर व कुंभ राशियों का स्वामित्व शनि ग्रह को दिया गया है। ग्रह और राशियों के बाद आईये अब हम ग्रह और नक्षत्रों की संबंध की बात करते हैं। २७ नक्षत्रों पर भी नवग्रह अधिकार रखते है। सूर्य ग्रह को कृतिका, उतरा फाल्गुनी, उतराषाढा। चन्द्र ग्रह को रोहिणी, हस्त, श्रवण। बुध ग्रह को आश्लेषा, ज्येष्ठा, रेवती। गुरु ग्रह को पुनर्वसु, विशाखा, पूर्वाभाद्रपद। शुक्र ग्रह को भरणी, पूर्वाफाल्गुनी, पूर्वाषाढा। मंगल ग्रह के पास मृगशिरा, चित्रा, धनिष्ठा। शनि ग्रह को पुष्य, अनुराधा, उतरा भाद्रपद नक्षत्र का स्वामित्व प्राप्त है। राहु ग्रह आर्द्रा, स्वाति, शतभिषा नक्षत्र के स्वामी है। केतु ग्रह अश्विनी, मघा, मूल नक्षत्र पर अधिकार रखते है। 

आईये अब देखते है कि किस प्रकार मानव शरीर में एक संपूर्ण ब्रह्मांड कार्य करता है। हमारे सिर से लेकर पैरों तक शरीर के प्रत्येक भाग को 12 राशियों, नवग्रहों और 27 नक्षत्रों में बांटा गया है। यही वजह है कि जन्मकुंडली को कालपुरुष का रुप भी दिया गया है। मेष राशि सिर अंग पर, वृषभ राशि को मुख, मिथुन राशि को दोनों भुजाओं में, कर्क राशि को दोनों फेफड़ों में, सिंह राशि को हृदय में, कन्या राशि को पाचन तंत्र में, तुला राशि को जननेन्द्रियों में, वृश्चिक राशि को गुदा, धनु राशि को दोनों जाँघों में, मकर राशि को दोनों घुटनों में, कुम्भ राशि को दोनों पैरों की पिंडलियों में और मीन राशि दोनों पैरों में स्थित है। 

अब शरीर में ग्रहों की स्थिति का विचार भी कर लेते हैं- सिर में सूर्य का स्थान है, मस्तिष्क का प्रतिनिधित्व सूर्य ग्रह करता है। हम सभी चिंतन और मनन इसी अंग से करते है। मस्तिष्क से एक अंगुल  नीचे के स्थान को चंद्र ग्रह का स्थान माना गया है। ज्योतिष शास्त्र में सूर्य और चंद्र दोनों को प्रकाशवान ग्रह माना गया है। एक के बिना दूसरे का अस्तित्व नहीं रहता है। और चंद्र का स्वयं का प्रकाश ना होने के कारण वह प्रकाश के लिए सूर्य ग्रह पर निर्भर है। इसीलिए सूर्य के मस्तिष्क स्थान से ठीक नीचे का स्थान चंद्र ग्रह को दिया गया है। हम सभी की भावनाओं, चंचलता और कल्पनाशक्ति का अधिकार चंद्र ग्रह के पास है। दोनों नेत्रों का अधिकार मंगल ग्रह के पास है। मंगल ग्रह मानव शरीर में शारीरिक, मानसिक, मनोबल और शक्ति के प्रतिनिधित्व ग्रह है। शरीर में बहने वाला रक्त मंगल ग्रह के स्वामित्व में आता है। व्यक्ति के नेत्र उसके शारीरिक और मानसिक शक्ति की व्याख्या करते है। कोई व्यक्ति कितना मजबूत है यह व्यक्ति के नेत्रों से जाना जा सकता है। बुध ग्रह वाणी और बौद्धिक योग्यता दर्शाता है। व्यक्ति का व्यवहार, स्वभाव और वाकशक्ति बुध ग्रह की स्थिति से समझी जा सकती है। गुरु ग्रह को नाभि अंग का स्वामित्व दिया जाता है। शुक्र ग्रह इच्छा शक्ति, काम वासना का ग्रह है। शनि ग्रह को नाभि के गोलक में स्थान दिया गया है। यह व्यक्ति को चिंतन शक्ति देता है। राहु मुख में स्त्थान रखते है, केतु कंठ से ह्रदय के मध्य स्थित होता है। सबसे महत्वपूर्ण पृथ्वी ग्रह को मल उत्सर्जन का कार्य दिया गया है। शरीर में स्थित १० ग्रहों पर भी ईश्वर का पूर्ण नियंत्रण होता है। सभी ग्रह अपने अपने रुप से शरीर पर प्रभाव डालते है। हमारे शरीर के ह्रदय में ईश्वर वास करता है। शरीर का यह अंग स्वर्ग के समान माना गया है। यही वजह है कि शरीर का यह अंग बिना थके, बिना रुके निरंतर धड़कता रहता है। संपूर्ण शरीर इसकी शक्ति और क्रिया पर निर्भर करता है। अनेकोनेक जन्म इसी से जुड़े होते है।

गहन अध्ययन यह कहता है कि हमारे शरीर में एक विराट विश्व समाहित है। सभी के साथ व्यवहारिक रहना, लेन-देन करते रहना, सामाजिक जीवन का यापन करना और पारिवारिक जिम्मेदारियों को पूरा करना हमारे जीवन के दायित्वों के अंतर्गत आता है। हम सभी जीवन में जो भी कर रहे है, और भविष्य में जो कर सकते हैं, यह सभी हमारे शरीर में स्थिति इस सूक्ष्म विश्व की स्थिति पर निर्भर करता है। हमारे जीवन की क्रियाएं, गतिविधियां चाहे वो सही हो या गलत हो, हर प्रकार की क्रियाएं इसी सूक्ष्म ब्रह्मांड के द्वारा क्रियांवित होती है। वास्तव में हमारी चेतन शक्ति इस पर नियंत्रण रखती है। शरीर में स्थित इस सूक्ष्म विश्व जिसे सूक्ष्म ब्रह्मांड या सौरमंड्ल भी कहना अतिश्योक्ति नहीं कहा जाएगा। इसका दर्शन करने के लिए ज्योतिष विद्या महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है। या यूं कहिए कि इसे देखने के लिए हमें ज्योतिष रुपी चश्में का सहारा लेना जरुरी हो जाता है। बाहरी सौरमंडल के दर्शन  प्रत्येक व्यक्ति कर सकता है, परन्तु आंतरिक ब्रह्मांड के दर्शन करने के लिए स्वयं के अंदर झांकने की शक्ति, क्षमता और छ्ठी इंद्री का जागृत होना आवश्यक है। स्वयं के अंदर झाकने, स्वयं के भीतरी ब्रह्मांड का दर्शन करने का मार्ग योग और साधना से होकर जाता है। स्वयं को जानकर विश्व को सरलता से जाना जा सकता है। सूक्ष्मरुप में स्थित यह ब्रह्मांड हमारे शरीर में सात चक्रों के रुप में है। हम जो कर रहे हैं, वह सही है या गलत है यह इन चक्रों को सक्रिय कर जाना जा सकता है। ये सात चक्र निम्न हैं-

1 मूलाधार-चक्र, 2 स्वाधिष्ठान-चक्र, 3 मणिपूरक-चक्र, 4 अनाहत-चक्र, 5 विशुद्ध-चक्र, 6 आज्ञा-चक्र और 7 सहस्त्रार-चक्र। सौरमंडल में नवग्रहों को मान्यता प्राप्त हैं, परन्तु शरीर में क्योंकि सात चक्र ही माने गए हैं अत: यहां केवल सूर्य से लेकर शनि ग्रह को ही स्थान दिया गया है। राहु और केतु को इस चक्र में सम्मिलित नहीं किया गया है। यहां इन्हें छाया ग्रह मान कर छोड़ दिया गया है।    

चक्र और स्वामी ग्रह  

मूलाधार-चक्र – मंगल

स्वाधिष्ठान-चक्र – बुध

मणिपूरक-चक्र – सूर्य

अनाहत -चक्र – गुरु

विशुद्ध-चक्र – शुक्र

आज्ञा-चक्र – चंद्र 

सूर्यसहस्त्रार-चक्र – शनि

आईये अब संक्षेप में चक्रों को जानते हैं-

चक्र नाम – अंग नाम – विषय

  1. मूलाधार चक्र – मेरुदंड, गुदाद्वार और गुप्ताँग के मध्य – मल त्याग, काम-वासना, मानसिक स्थायित्व, भावनात्मक लालसा व इन्द्रिय सुख, काम, क्रोध, लोभ और मोह से संबंधित चक्र है। सर्वप्रथम इसी चक्र को योग साधना के माध्यम से भेदकर व्यक्ति को ईश्वर में सम्माहित होने का प्रयास करना होगा है। इस चक्र को सक्रिय कर व्यक्ति आत्मसंयम को प्राप्त करता है, इसके लिए व्यक्ति को व्यायाम, योग, चिंतन, मनन, तप, त्याग और आध्यात्मिक मार्ग का पालन करना होगा। यह चक्र जीवन का आधार और चेतन मन का प्रतीक है।
  • स्वाधिष्ठान चक्र – मूत्र तंत्र, प्रजनन तंत्र – आलस्य, क्रूरता, घमण्ड, प्रमाद, अवज्ञा और अविश्वास से संबंधित चक्र है। इस चक्र को सक्रिय कर पाने के बाद व्यक्ति में रचनात्मक, भावनात्मक  और आध्यात्मिक शक्ति का स्वत; विकास हो जाता है। यह सृजनशीलता एवं स्वाभाविकता देता है। इससे अवचेतन मन जागृत हो प्रसन्नता देता है। इस चक्र पर शुक्र ग्रह का स्वामित्व माना  गया है। जिस व्यक्ति की जन्मकुंडली में शुक्र ग्रह पीड़ित हो, उस व्यक्ति को स्वाधिष्ठान चक्र से संबंधित अंगों में रोग और संबंधित विषयों का प्रभाव अधिक होता है। 
  • मणिपुर चक्र – पेट, कमर, पाचन- तंत्र और चयापचय – तृष्णा, ईर्ष्या, भय, घृणा, लिप्सा, छल-कपट, हिंसा, कुतर्क, चिंता, दंभ, अविवेक और अहंकार। इस चक्र के जागृत होने पर इन विषयों में कमी संभावित है। जो व्यक्ति इस चक्र को जाग्रत कर लेता है, उस व्यक्ति का पाचन तंत्र मजबूत, मानसिक रूप बल, भावनात्मक रूप से व्यापकता और आध्यात्मिक रूप से मजबूती देता है। ऐसे व्यक्ति में प्राकृतिक, सामाजिक और आध्यात्मिक मर्यादाएँ जाग्रत हो जाती है और व्यक्ति ईमानदार व योग्य व्यक्ति के रुप में सम्मानित होता है। इस चक्र का स्वामित्व शनि और गुरु दो ग्रहों को दिया गया है। 
  • अनाहत चक्र – छाती का मध्य भाग, शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता – ह्रदय में स्थित जीवात्मा, करुणा, सहृदयता, समर्पित प्रेम, वैचारिक सन्तुलन और जन कल्याण जैसे गुणों का कारक यह चक्र है। इस चक्र के जाग्रित होने पर व्यक्ति उत्तम चरित्र, मन और भावनात्मक रुप से संतुलित, समर्पित, सर्वप्रिय होता है। इस चक्र पर बुध ग्रह का नियंत्रन है।   
  • विशुद्ध चक्र – हार्मोन, आंतरिक श्वसन क्रिया – सम्प्रेषण, भावनात्मक रूप से स्वतंत्रता, मानसिक रूप से उन्मुक्तता जैसे गुण देता है। यह चक्र जिस व्यक्ति में सक्रिय हो जाता है वह व्यक्ति सत्यनिष्ठ, कुशल, मधुर और अहंकार का नाश कर अहंकार से मुक्त जीवनयापन करता है। इसके अतिरिक्त वह व्यक्ति अपनी भूख, प्यास और मौसम के प्रभाव से प्रभावित नहीं होता है। एक पौराणिक कथा में वर्णन आता है कि भगवान श्रीकॄष्ण सोलह कलाओं से युक्त थे, यहां सोलह कलाओं से अभिप्राय: 1) धन संपदा (2) अचल संपत्ति (3) प्रसिद्धि (4) सम्मोहक वाणी ।(5) आनन्दोत्सव (6) सौंदर्य (7) विद्या (8) पारदर्शिता (9) प्रेरणा और नियोजन (10) उच्च स्तरीय विवेक (11) कर्मण्यणता (12) ज्ञानेन्द्रियों पर मन का और मन पर आत्मा का पूर्ण नियंत्रण (13) विनयशीलता (14) यथार्थता (15) प्रभुत्व (16) परोपकार से है। यह चक्र इन्हीं सोलह कलाओं से युक्त बनाने का सामर्थ्य देता है।
  • आज्ञा चक्र – तृतीय नेत्र, भौंहौं के मध्य – आज्ञा चक्र उच्च व निम्न अहम् को सन्तुलित कर अंतस्थ मार्गदर्शन करता है। जिस व्यक्ति में यह चक्र सक्रिय हो जाता है वह व्यक्ति बौद्धिक स्तर पर संतुलित हो, पूर्णत: शांति प्राप्त कर स्थिरता ग्रहण करता है। जीवन की किसी भी परिस्थिति से वह प्रभावित नहीं होता है। यह चक्र व्यक्ति को स्वर्ग का द्वार खोलता है। ऐसा व्यक्ति ईश्वरीय भक्ति में लीन हो जाता है।
  • सहस्त्रार /शीर्ष चक्र – सिर पर सबसे ऊपर, मानवीय चेतना, मस्तिष्कीय तंत्रिकाओं का चक्र – इस चक्र का संचालन सूर्य और चंद्र ग्रह को दिया गया है। सभी इंद्रियां यहां से सक्रिय और संतुलित होती है। इस चक्र को सक्रिय करने पर व्यक्ति अपने – श्वसन, पाचन, निद्रा, मोटापा ,लैंगिक व्यवहार, शारीरिक मुद्राएँ, बुद्धि ,विवेक, इच्छा, ताप, दाब, हृदय गति, प्रजनन, उत्सर्जन, प्रतिरक्षा, कंकाल, तंत्रिका नियमन, तथा सुख-दुःख से मुक्त रहता है। 

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