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    Homeसाहित्‍यकवितामैं हाथरस की बेटी हूँ

    मैं हाथरस की बेटी हूँ

    कोख में मरती और , हाथरस का परिहास हूँ !
    जिस्म नोचते भेडियों, का मै एक अवसाद हूँ ! !

    सत्ता के नारों की बस , मैं गढ़ी एक तस्वीर हूँ !
    अखबारों की सुर्ख़ियों की, मैं एक लकीर हूँ ! !

    मैं माँ, बहन और बेटी का, बस एक इश्तहार हूँ !
    चौघट से बाहर घुरती , निगाहों की मैं शिकार हूँ ! !

    बहन निर्भया की शहादत का, मैं सिर्फ़ उपहास हूँ !
    भेडिये समाज का मैं , एक वर्तमान इतिहास हूँ ! !

    गिद्धों की घुरती निगाहों में, मैं चुभती शिकार हूँ !
    गिरती नैतिकता और , पतन की मैं प्रमाण हूँ ! !

    बोटी- बोटी नोचों गिद्धों, मैं तो बस एक बेटी हूँ !
    हवस के गर्म तवे पर पकती , मैं तो एक रोटी हूँ ! !

    आँखों में आँसू, चीख आह की , मैं तो एक पीड़ा हूँ !
    हर स्वर में मेरे कंपन, मैं तो मौन दर्द की वीणा हूँ ! !

    घर- घर में बैठा रावण , मैं तो बस एक सीता हूँ !
    मौन हुआ गांडीव जब , फ़िर मैं कैसी गीता हूँ ! !

    प्रभुनाथ शुक्ल
    प्रभुनाथ शुक्ल
    लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं

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