लेखक परिचय

पंकज झा

पंकज झा

मधुबनी (बिहार) में जन्म। माखनलाल चतुर्वेदी राष्‍ट्रीय पत्रकारिता विश्वविद्यालय, भोपाल से पत्रकारिता में स्नातकोत्तर की उपाधि। अनेक प्रतिष्ठित समाचार-पत्रों में राजनीतिक व सामाजिक मुद्दों पर सतत् लेखन से विशिष्‍ट पहचान। कुलदीप निगम पत्रकारिता पुरस्‍कार से सम्‍मानित। संप्रति रायपुर (छत्तीसगढ़) में 'दीपकमल' मासिक पत्रिका के समाचार संपादक।

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आ. संजीव जी.

जैसा कि आप जानते हैं कि प्रवक्ता से अपना भी जुड़ाव इसके शुरुआती दौर से ही रहा है. कुछ अपवादों को छोड़ दें तो वेब पर नियमित लेखन अपना प्रवक्ता से ही शुरू हुआ था. तो मिळकियत ये भले ही आपका या भारत जी का रहा हो लेकिन मुझे भी यह हमेशा अपना ही लगा. जब कई बार आपने अपने उचित सरोकारों के कारण मेरा लेख पोस्ट करने से इनकार भी किया तो भी आपका संपादकीय विशेषाधिकार समझ, फैसले को शिरोधार्य किया. लेकिन इस बार आपसे चाहे गए फैसले को सीधे तौर पर आपने फासीवाद और सामंतवाद कह दिया. हम फ़िर इस बात को दुहरा रहे हैं कि अगर इस बहस का कुछ सार नहीं निकला तो लोग इसे ‘प्रोपगंडा’ ही समझेंगे, क्योंकि हमारे लिए विश्वसनीय ‘होने’ के अलावा ‘दिखना’ भी ज़रूरी है. तो आपसे उम्मीद खत्म हो जाने पर मैं अपनी तरफ से एक पहल कर रहा हूँ. यह मेरे और प्रवक्ता की विश्वसनीयता कायम रखने के लिए शायद उपयोगी हो.

आज से मैं एक लेखक और टिप्पणीकार के रूप में इस साईट से स्वयं को निर्वासित करता हूँ. यह साबित करने के लिए कि यह बहस महज़ बुद्धिविलास या सस्ती लोकप्रियता प्राप्त करने का उपक्रम नहीं था, मेरे लिए यह ज़रूरी है. निश्चित ही मुझे प्रवक्ता से काफी प्यार है, अपने आ. टिप्पणीकारों,पाठकों, मार्गदर्शकों के प्रति अत्यधिक अनुग्रहित भी महसूस करता हूँ. निश्चित ही मैं अपने रूटीन की तरह प्रावाका पर आता भी रहूँगा. अपने प्रिय लेखकों, आ. टिप्पणीकारों को पढता भी रहूँगा. लेकिन जब-तक आप इस बहस का कोई निष्कर्ष सार्वजनिक नहीं करेंगे (हालांकि आप नहीं करेंगे यह आपने बता दिया है) तब-तक एक लेखक के रूप में अब इस साईट से खुद को निकाला दे रहा हूँ. सदा की तरह प्रवक्ता के लिए अनन्य-अशेश शुभकामना….आपको धन्यवाद.

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संजीव सिन्‍हा, संपादक, प्रवक्‍ता डॉट कॉम की टिप्‍पणी:

पंकजजी, असहमति के बगैर लोकतंत्र निष्‍प्राण हो जाएगा। इतना स्‍पेस तो आप देंगे ही कि मैं अपनी समझ मुताबिक आपकी आलोचना कर सकूं।

  1. गत 6 वर्षों से आपको जानता हूं। आप बड़े भावुक हैं। बताइए, ज़रा सी बात पर कोई अपना घर छोड़ कर जाता है क्या?प्रवक्‍ता के हमसफर, प्रवक्‍ता की नैया मझधार में छोड़कर नहीं जा सकते, यह हमारा अटूट विश्‍वास है।

29 Responses to “मैं ‘प्रवक्‍ता’ से स्वयं को निर्वासित करता हूँ: पंकज झा”

  1. इक़बाल हिंदुस्तानी

    iqbal hindustani

    कोई सेह्मत हो य नअ हो अप्ना लेखन जारी रअख्ना १ लेखक कअ क्अर्त्व्ये है

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  2. Jeet Bhargava

    तेरे बिन सूना-सूना लागे…
    पंकज जी आपको पढने के लिए हम बेताब हैं.
    संजीव जी, आवेश ठंडा हो गया हो तो थोड़े अपनेपन से पंकज जी को आवाज दो, वो जरूर आयेंगे..

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  3. डॉ. मधुसूदन

    डॉ. मधुसूदन उवाच

    26 abhishek1502 Says:
    November 28th, 2010 at 9:58 pm
    पंकजजी के लिए— “आप का कोइ लेख काफी दिन से नहीं पढ़ा .अब आप, या तो लौट आये या इस पोस्ट पर अपने नए लेखो का पता बतादे।” अभिषेक जी के इस कथन से सहमति व्यक्त करता हूं।
    पर समस्या का हल भी इतना सरल नहीं।कुछ और बिंदुओंको प्रस्तुत करता हूं।
    समझ सकता हूं, कि, अपमानित अनुभूत होनेकी स्थिति, इसमें बहुत बडी बाधा लगती है। इसमें एक ही उपाय संभव प्रतीत होता है।
    कोई मध्यस्थी की भूमिका निभाने के लिए तैय्यार हो। मध्यस्थ के, संपादक, और दोनो विवादकों के साथ अच्छे संबंध, या कमसे कम (न्यूट्रल, अर्थात) उदासीन संबध होना पूर्वावश्यकता है।वह किसी का भी पक्ष लेनेवाला, या शत्रु प्रतीत ना हो।
    इस भांति मध्यस्थी की भूमिका का निर्वहण करते हुए इस समस्या को प्रवक्ता के और पाठकों के हितमें, सुलझानेका यही एकमेव उपाय मुझे दिखाई देता है।
    यह प्रवक्ता के भी दूरगामी हितमें मुझे प्रतीत होता है।
    आगे के लिए सभीने इसे ध्यान रखने की आवश्यकता भी नकारी नहीं जा सकती। पर,प्रवक्ता की सफलता के लिए यह हल आवश्यक है।
    हर “प्रामाणिक” लेखक का प्रवक्ता में योगदान होना भी आवश्यक है। वाद विवाद नहीं, पर सच्चाई ढूंढने में संवाद हो। कुछ विचारधाराएं विवादपटुता में निपुण होती है। जानिए कि विवादसे समस्याएं हल नहीं होती, कटुता ही बढती है।
    क्या, संपादक मंडल (कमसे कम ३ सदस्य) रख पाना संभव है, जिससे ऐसी स्थिति दुबारा ना खडी हो? लेखों को समय लेकर/देकर, संपादित किया जाएं, समस्या को जडसे अल्प-संभवित किया जाए। ।प्रिह्वेंशन इज़ बेट्टर दॅन क्युअर।
    ॥वादे वादे जायते शास्त्रबोधः॥ मैं कुछ अंतर कर के कहूंगा।
    ॥ संवादे संवादे जायते दिशाबोधः॥ प्रवक्ता सुसंवादी भव॥

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  4. abhishek1502

    आप का कोइ लेख काफी दिन से नहीं पढ़ा .अब आप या तो लौट आये या इस पोस्ट पर अपने नए लेखो का पता बतादे .

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  5. Mayank Verma

    पंकज जी आपको अपने आनलाइन पाठकों से दुबारा जुड़ने के लिए प्रवक्ता जैसे किसी नयी वेबसाइट का शुभारम्भ करना चाहिए |

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  6. rajkumar

    vicharo se bhagna achchi baat nahi, aur sampadak par dabav dalna galat hai, pankaj ko rajniti se bahar aana chahiye, aur ye koi pritishtha ka sawal nahi hai.

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  7. shishir chandra

    यह दुर्भाग्य पूर्ण है की संजीव ने अपनी टिपण्णी वापस नहीं लिया बल्कि यह अब तक प्रवक्ता की शान बढ़ा रहा है. संजीव का यह व्यव्हार प्रवक्ता के लिए घातक होगा.
    अज्ञानी और पंकज जी के साथ प्रवक्ता को पूर्ण विराम देता हूँ. सिर्फ पंकज जी की वापसी ही मुझे प्रवक्ता की ओर वापिस मोड़ सकती है. प्रवक्ता के लिए शुभकामनाएं.
    मेरी खुद की भाषा में भी काफी उतार चढाव आये हैं मैं उसके लिए क्षमा प्रार्थी हूँ.
    प्रवक्ता, सारे टिपण्णीकारों और लेखकों को मैं काफी मिस करूँगा, लेकिन कोई उपाय नहीं है.
    जय हिंद

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  8. RAJ SINH

    पंकज जी ,
    मैं चाहूँगा की राजीव दुबे की बात पर गौर करें .

    ‘ न दैन्यं न पलायनम ‘ !

    और संजीव सहित हम सब ‘ बहुजनों ‘ की इच्छा का आप सम्मान कैसे नहीं करेंगे ?
    निष्कर्ष तो आ भी गया है .क्या सार्वजनिक होना बाकी बचा है ? अब किस निष्कर्ष का इंतजार है ?

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  9. श्रीराम तिवारी

    shriram tiwari

    लौट के आ …आ …लौट के आ जा मेरे मीत …..
    तुझे मेरे गीत बुलाते हैं …..सूना पड़ा संगीत …अब तो सजन घर आ जा ….

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  10. Agyaani

    सब प्रवक्ता जनों को दीपावली की हार्दिक शुभकामनाएं!

    आदरणीय पंकज जी,
    आज पांच दिन के बाद प्रवक्ता पर आया तो ये दुखद समाचार सुनने को मिला! कुछ अन्दर की बातें भी उजागर हो रही हैं!
    मैं भी अपनी तरफ से प्रवक्ता से अघोषित संन्यास की घोषणा करता हूँ हालांकि मेरा योगदान एक नियमित पाठक और चंद टिप्पणीयों से ज्यादा नहीं है!

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  11. sunil patel

    श्री पंकज जी, आप एक पत्रकार है. आप अपना नेतिक कर्त्तव्य कैसे छोड़ सकते है. बड़ा दुःख हुआ आपका निर्णय जानकर.
    स्वतंत्र भारत में एक मात्र प्रवक्ता ही तो ऐसे मंच है जहाँ पर आप जैसे रचनात्मक एवं राष्ट्रवादी लेखको के लेख और सार गर्भारित टिप्पड़ी पढने को मिलती है. आशा है आप पुनर्विचार करेंगे.

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  12. डॉ. महेश सिन्‍हा

    डॉ महेश सिन्हा

    वामपंथ के आगे एक राष्ट्रवादी की आत्महत्या । पंकज अपने निर्णय पर पुनर्विचार करें और न छोड़े मैदान।
    ऐसा लगता है कुछ लोगों ने एक दबाव प्रवक्ता पर बना रखा है और प्रवक्ता उनके दबाव में आ रहा है । यह प्रवक्ता के लिए भी सही नहीं है । ऐसे लोग बीच बीच में प्रवक्ता को भी खुले आम धमकाते हैं की अगर उन्हे जगह नहीं मिली तो वे प्रवक्ता पर इल्जाम लगा देंगे ।

    Reply
  13. Santosh Kr. Madhup

    आपसी असहमति संघर्ष का रूप न ले इस बात का ध्यान हम सभी राष्ट्रवादियों को रखना चाहिए. पंकज जी से निवेदन है की आप प्रवक्ता को अपनी लेखनी से वंचित न करें, संजीव जी आप भी अपने रुख को कुछ नरम कर पंकज जी के साथ अपनी मित्रता कायम रखें. भगवान आपको सदबुद्धि दें.

    Reply
  14. श्रीराम तिवारी

    shriram tiwari

    शैले -शैले न मानिंक्यम,मोक्तिक्म न गजे-गजे …..
    पंकजम न प्रवक्ताकाम ,चंदनम न बने -बने ……..

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  15. प्रभात कुमार रॉय

    प्रभात कुमार रॉय

    पंकज झा एक अत्‍यंत प्रबुद्ध शख्‍स हैं। वह अपने फैसले पर पुन: विचार अवश्‍य करेगें। प्रवक्‍ता के संपादक पंकज झा को प्रवक्‍ता से नाता नहीं तोड़ने देगें। आपसी बहस मुबाहिसों में कुछ तक़रार हो ही जाता है। इसका मतलब यह नहीं कि हम अपने संबंधों को ही तिलांजली दे दें।
    अकबर इलाहबादी का एक शेर पेश है
    बहसें फिजूल रहीं खुला कुछ हाल देर में
    अफसोस उम्र कट गई लफ्जों के फेर में

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  16. Awadhesh

    पंकज जी, आपका निर्णय किसी के लिए सुखद नहीं, बस यह गीत आपको याद दिलाना चाहता हूँ.
    जीवन मे कुछ करना है तो, मन को मारे मत बैठो,
    आगे-आगे बढना है तो, हिम्मत हारे मत बैठो!
    चलने वाला मन्जिल पाता, बैठा पीछे रहता है,
    ठहरा पानी सडने लगता, बहता निर्मल होता है,
    पांव मिले चलने की खातिर,पांव पसारे मत बैठो! …
    तेज दौडने वाला खरहा, दो पल चल कर हार गया,
    धीरे-धीरे चल कर कछुआ, देखो बाजी मार गया,
    चलो कदम से कदम मिला कर, दूर किनारे मत बैठो!
    आगे-आगे बढना है तो, हिम्मत हारे मत बैठो!

    Reply
  17. अहतशाम "अकेला"

    प्रवक्ता एक अच्छा मंच है, अच्छे विचारों और लेखकों का संगमस्थल
    प्रवक्ता का हरेक स्तम्ब मजबूत हैं और संतुलित भी
    पंकज जी!
    आप स्वयं को निर्वासित कर रहे हो या प्रवक्ता को धमकी दे रहे हो ये तो आप ही जाने
    खैर! में भी प्रवक्ता से जड़ा हुआ हूँ काफी लेख आपके पढ़े
    सब कुछ पढ़ कर ऐसा लगा
    “आप करें तो डिस्को, चतुर्वेदी जी करे तो मुजरा”
    आपकी हर बात सही चतुर्वेदी जी की गलत क्यू
    प्रवक्ता ने आपके झूट को झूट कहा इसलिए नाराज़ हो?
    “एक नया ‘बुखारी’ पैदा कर रहा है ‘प्रवक्ता’”
    जो कुछ इसमें आपने उल्टा सीधा लिखा प्रवक्ता ने उसे नाकारा इसलिए?
    मुझे एक कहावत याद आ रही है—–
    अक्सर मेने गाव में देखा है
    “कुतिया बैलगाड़ी के नीचे नीचे चलती और सोचती है की में बैलगाड़ी खीच रही हूँ, में रुक गई तो गाड़ी आगे नहीं बढ़ेगी ”
    आपका शुभचिंतक
    अहतशाम “अकेला”

    Reply
  18. दिवस दिनेश गौड़

    Er. Diwas Dinesh Gaur

    आदरणीय पंकज भाई इस दीपावली पर यह हमारे लिए एक दुखद समाचार है| आप जैसे राष्ट्रवादी लेखकों को पढ़ कर ही हम जैसे लोगों में राष्ट्र वाद की भावना पनपती है| ऐसे में आप ही हमारा साथ छोड़ देंगे तो हमें हमारे प्रश्नों के उत्तर कौन देगा?
    राजिव दुबे जी की बात से सहमत हूँ| आप भी लिखिए दिन में दो लेख| और कीजिए वामपंथ का विरोध अपनी टिप्पणियों से| अब जहर को जहर से मारने का समय आ गया है| हम आप जैसे राष्ट्र भक्त को नहीं खो सकते|
    आदरणीय संजीव जी, हमें चतुर्वेदी जी से कोई घृणा नहीं है| किन्तु पंकज जी की कीमत पर हमें चतुर्वेदी नहीं चाहिए|

    Reply
  19. shishir chandra

    यक्ष प्रश्न पर अभी मंथन की आवश्यकता है. मुझको लगता है कि आ. चतुर्वेदी जी को अनावश्यक महिमामंडित किया जा रहा है. वो भी पंकज जी जैसे उदार लेखक की कीमत पर.
    पंकज जी का जाना प्रवक्ता के लिए झटका होगा. मैं इस पुरे मसले पर पंकज जी के साथ खड़ा हूँ.
    ऐसा उदार ह्रदय, ऐसी सोच दुर्लभ है. उनके शब्दों का चयन और भाव बेजोड़ है. पंकज जी उच्च कोटि के लेखक हैं. उन पर लगाये गए आक्षेप नीचले स्तर के हैं और इससे उनका उद्वेलित होना अस्वाभाविक नहीं हैं.
    मैं चाहूँगा कि ससम्मान पंकज जी को प्रवक्ता में स्थान दिया जाये और उनके द्वारा उठाये गए मसले का निराकरण किया जाये.
    जो व्यक्ति प्रवक्ता के टिप्पणीकारों पर ऐसी फब्तियां कस रहा है उसके साथ कड़ाई से पेश आने की जरुरत है. ये कहना सही नहीं होगा की प्रवक्ता में अधिकतर लकीर के फ़कीर लोग हैं. हमारे कुछ वामपंथी मित्रों को वहम है और इसी सोच पर पंकज जी का हमला था जो उनका अकेले का नहीं बल्कि हम सब की जुबान थे. मुझको भी उनके लेख का नैतिक दायित्व लेने से मत रोकिये. यदि पंकज जी गलत हैं तो मैं भी अपने आप को गलत महसूस करता हूँ. मैं चाहूँगा की प्रवक्ता में लेखों का संतुलन बनाया जाए.
    मेरी स्पष्ट मांग है कि असभ्य वामपंथी लेखों को प्रवक्ता में स्थान न दिया जाए. जो सिर्फ जहर से बुझे हुए हैं और राष्ट्रवाद पर हमला करते हों. यदि वामपंथी लेख को शामिल करना है तो लेखन कि स्तरीयता पर गौर किया जाए.
    अंत में पंकज जी की अनुपस्थिति में मुझे प्रवक्ता में कोई रूचि नहीं रह जायेगी.

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  20. गिरीश पंकज

    girish pankaj

    संजीव, पंकज झा की भावनाए समझनी होंगी. पंकज के कारण मै ”प्रवक्ता” से जुडा. ”प्रवक्ता” एक सार्थक बौद्धिक-प्रयास है. पंकज झा का अलग होना दुर्भाग्यजनक होगा. मेरा भी यही विश्वास है कि ”प्रवक्‍ता के हमसफर प्रवक्‍ता की नैया मझधार में छोड़कर नहीं जा सकते”। रिश्ता कायम रहे. ”मतभेद” होते रहते हैं, ”मनभेद” न हो. संजीव्,पंकज झा की बातों पर गौर करो. उन्होंने कोई गलत बात भी नहीं की है. पंकज झा जैसे रचनात्मक एवं राष्ट्रवादी लेखक से ”प्रवक्ता” का वंचित होना दुर्भाग्यजनक होगा. घटिया लेखको की बहुलता होती जा रही है. अच्छे लेखक कम हैं. पंकज, संजीव सिन्हा की बात भी ठीक है, कि ”असहमति के बगैर लोकतंत्र निष्‍प्राण हो जाएगा। इतना स्‍पेस तो आप देंगे ही कि मैं अपनी समझ मुताबिक आपकी आलोचना कर सकूं”। कुल मिला कर मैं संजीव और पंकज की दोस्ती को बरक़रार देखना चाहता हूँ…वरना मुझे भूख-हड़ताल करनी पड़ेगी. संजीव, तुम्हे पंकज झा को मनाना ही पडेगा. हमें जोड़ना है, तोड़ना नहीं. टूटे तो बुरे लोग टूट कर अलग हो. अच्छे लोगो की दो बातें सहनी ही पड़ेंगी. ..लो, दो शेर दे रहा हूँ…
    गर अपने ही रूठ गए तो उन्हें मनाना सीखें हम
    यही फ़र्ज़ है यारी का तो उसे निभाना सीखें हम
    होती रहती हैं दो बातें यह जीवन की रीत सदा
    लेकिन ऐसी हर बात को अब बिसराना सीखें हम
    शुभ दीपावली………………

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  21. Rajeev Dubey

    पंकज जी ,
    बहस का निष्कर्ष तो निकल चुका है … आप लिखिए रोज दो लेख या जितना उचित लगे आपको, करिए विरोध वाम पंथ का , या लिखिए समर्थन में राष्ट्रवाद के, या कि कर डालिए विवेचनाएँ चतुर्वेदी जी के लिखों की, या कि लिखिए संपादक महोदय की नीतियों के विरुद्ध . आपका स्व – निर्वासन रद्द करिए और लड़िये वैचारिक युद्ध . यही तो है निष्कर्ष . मुझे लगता है सभी सहमत होंगे इससे, मुद्दे बहुत बड़े-बड़े खड़े हैं सामने – करिए योगदान और जोरशोर से …

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  22. abhishek1502

    पंकज जी ,
    आप के लेख मुझे बहुत पसंद है और मैं यहाँ आप के लेख पढने ही आता हू . आप मुझे और मेरे जैसे अन्य पाठको के साथ ये अन्याय मत कीजिये .

    Reply
  23. डॉ. मधुसूदन

    मधुसूदन

    सर्व प्रिय– पंकज भाई, यह आपका प्रवक्ता, छोडनेका निर्णय अच्छा समाचार नहीं है। आपके लेखोंको पढकर ही मैं प्रवक्ता से प्राथमिक परिचय कर पाया था। आपही ने कुछ २-४ दिन पहले टिप्पणी में इच्छा व्यक्त की, कि मुझे लेखन में आप देखना चाहते हैं। तो अभी कल/परसों ही कुछ लिखके भेजा भी।
    आपके सम्मान और असम्मान में हमारा भी सम्मान-असम्मान है।
    भगवान कृष्ण ने अर्जुन को महाभारत के युद्ध के प्रारंभ समय जो उपदेश दिया था, उसे तो आप जानते ही है। भ. गीता खोलकर उसे पहले फिरसे पढ लीजिए।(पहले भी पढा होगा, फिर भी और पढने से उर्जा का संचार………..दूसरा है, थॉट्स ऑफ़ पॉवर–विवेकानंद…………
    आप के पास यदि है? तो उर्जाका बम है।
    आप जानते ही है। यह प्रेम और आग्रहपूर्ण सुझाव है।
    दीपावली के ऐसे शुभ अवसर पर संस्कृति के रखवालों से भगवान ऐसी अपेक्षा नहीं करते।
    मैं संजीव जी का कठिन उत्तरदायित्व भी समझता हूं।अतिथि की अधिक चिंता करनी होती है, अपनो की कुछ कम—-ऐसा ही इसका अर्थ मैं ने लगाया था।
    आप का निर्णय भी अकेले आप का नहीं होना चाहिए।निर्णय में, और सारे मेरे जैसे पाठकों की राय महत्व रखती है।
    उत्तिष्ठत जाग्रत प्राप्य वरान निबोधत ॥
    उठो पार्थ गांडीव संभालो॥
    मनुज की आत्मन राई के दाने से भी छोटी पर कर्मॊ से वह जड ब्रह्मांड से भी बहुत शक्तिशाली होती है।
    ॥अणोरणियान महतोऽमहियान॥
    कमसे कम ऐसा निर्णय कुछ सप्ताह बाद लीजिए।
    ॥शुभस्य शीघ्रं पर अशुभस्य विलंबनम्‌ ॥
    केवल
    मधुसूदन

    Reply
  24. डॉ. राजेश कपूर

    dr.rajesh kapoor

    क्षमा करें, पंकज जी को संबोधित किये बिना बात अधूरी रह जायेगी.
    – पंकज जी मेरी दृष्टी में आप से शोभा है प्रवक्ता की. प्रवक्ता को जो नए आयाम मिल रहे हैं, उस में आपका उल्लेखनीय योगदान नज़र आ रहा है. आपके बिना सूना लगाने लगेगा हमें प्रवक्ता. आशा करता हूँ की आप दोनों मित्र कोई सम्मानजनक रास्ता निकाल कर एक सुखद आदर्श प्रस्तुत करेंगे. व्यग्रता से दीपावली पर आप दोनों बंधुओं की ओर से इस भेंट की अपेक्षा कर रहा हूँ.

    Reply
  25. डॉ. राजेश कपूर

    dr.rajesh kapoor

    संजीव जी विश्वास है की आप अपने मित्र पंकज जी को प्रवक्ता से जाने नहीं देंगे. यदि ऐसा हुआ तो एक आघात होगा पुनरराष्ट्र निर्माण के प्रवक्ता पर चल रहे प्रयासों के लिए. एक ऐसी परिपाटी होगी जिसका सन्देश अछा नहीं जाएगा. देश विरोधियों को इससे बल मिल सकता है. हमारी दरारें वे सदा तलाशते रहते हैं. मैं चिंतित और व्यथित हूँ इस प्रसंग से.
    -निवेदन को उचित मान मिलेगा इस आशा सहित आपका,

    Reply
  26. deepak.mystical

    deepak dudeja

    सब कुछ दुखद हो रहा है……
    पंकज झा जी ………..
    हम आप जैसे कुछ लेखकों के लिए प्रवक्ता से जुड़े हैं…
    संजीव जी, जो भी कदम उठाएं ….. सोच समझ कर उठाएं ……

    Reply
  27. Anil Sehgal

    मैं ‘प्रवक्‍ता’ से स्वयं को निर्वासित करता हूँ: पंकज झा

    Pankaj loss – whose gain ? Sanjeevji !

    – अनिल सहगल –

    Reply
  28. शैलेन्‍द्र कुमार

    शैलेन्द्र कुमार

    पंकज जी के लेख को पढ़ कर अत्यंत दुःख हुआ आखिर वामपंथी अपनी चालों में सफल हो ही गए और संजीव जी आपकी जिद का तो मुझे कोई कारण नहीं समझ आता अगर आप चतुर्वेदी जी के लेखों पर आने वालें पाठकों और उनपर किये जाने वाले टिप्पणियों की संख्या से प्रभावित है तो ये जान ले कि ज्यादातर टिप्पणिया उनके विरोध में ही आती है क्योंकि उनकी लेखो का शीर्षक और उसमे लिखी गयी अनर्गल बातें राष्ट्रवादियों को उत्तेजित कर देती है और उनके लेखो कि टीआरपी बढ़ जाती है और सामान्य विषयों पर उनके लिखे गए लेखों पर कोई टिप्पणी भी नहीं करता मैंने तो पहले ही करना छोड़ दिया था
    सभी राष्ट्रवादियों से हार्दिक अनुरोध है कि कोलगेट टूथपेस्ट का विरोध करने से उसकी बिक्री रुक नहीं जाएगी दुकानदार अपने हितों को ध्यान में रखकर ये हमेशा ही कहता रहेगा कि जब तक बाज़ार में मांग है उसे सभी तरह के उत्पादों को रखना ही पड़ेगा इसलिए जरूरत है कोलगेट का बहिष्कार करने की न की केवल विरोध

    Reply
  29. संजीव कुमार सिन्‍हा

    संजीव, संपादक, प्रवक्‍ता

    पंकजजी, असहमति के बगैर लोकतंत्र निष्‍प्राण हो जाएगा। इतना स्‍पेस तो आप देंगे ही कि मैं अपनी समझ मुताबिक आपकी आलोचना कर सकूं।

    गत 6 वर्षों से आपको जानता हूं। आप बड़े भावुक हैं। बताइए, ज़रा सी बात पर कोई अपना घर छोड़ कर जाता है क्या?

    प्रवक्‍ता के हमसफर प्रवक्‍ता की नैया मझधार में छोड़कर नहीं जा सकते, यह हमारा अटूट विश्‍वास है।

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