राहुल गाँधी चाहें तो छह घंटे में दे सकते हैं कांगेस को नया अध्यक्ष

पार्टी के आग्रह को मानते हुए सोनिया जी ने अगले छह माह तक कांग्रेस की कार्यवाहक अध्यक्ष बने रहना स्वीकार कर लिया है  | अब प्रश्न यह है कि छह माह में कांग्रेस क्या कोई नया अध्यक्ष ढूँढ पाएगी ? कांग्रेस पार्टी का इतिहास बताता है कि वहाँ पिछले सौ वर्षों से गाँधी-नेहरू परिवार के  सदस्य या उनके  प्रतिनिधि स्थाई अध्यक्ष के रूप में स्वीकार किये जाते रहे हैं | यद्यपि परिवार की सहमति के बिना भी कुछ प्रभावशाली लोग अध्यक्ष बने, किन्तु वे अधिक समय तक टिक नहीं पाए  | पार्टी संगठन के भीतर भी परिवार का अपना संगठन है जो सभी को नियंत्रित करता है | गाँधी परिवार पर मुखर होने वाले के लिए पार्टी में बाहर जाने का मार्ग खोल दिया जाता है | अब तक कांग्रेस में  शीर्ष नेतृत्व को प्रश्नाकिंत करने वाले को अंततःपार्टी छोड़नी  पड़ी है | स्वयं नेताजी सुभाष चन्द्र बोस को भी कांग्रेस छोड़नी पड़ी थी तथापि वे कांग्रेस के दुबारा अध्यक्ष भी बन गए थे और अत्यंत लोकप्रिय भी थे | ठीक इसी प्रकार सन 1950 में राजर्षि पुरुषोत्तम दास टंडन जी नेहरू जी के चहेते प्रत्याशी आचार्य जे.बी.कृपलानी को पराजित कर कांग्रेस के अध्यक्ष तो बन गए, किन्तु उन्हें पग-पग पर असहयोग और आलोचना का सामना करना पड़ा | सरदार पटेल समर्थित टंडन जी को 1306 वोट मिले थे जबकि नेहरू समर्थित कृपलानी जी को 1092 |  इतने बड़े अंतर से जीतने वाले टंडन जी को भी अंततः विवश होकर अध्यक्ष पद छोड़ना पड़ा |  इंदिरा जी के समय की घटनाएँ तो सब को पता ही हैं | उन्होंने तो कांग्रेस को तोड़कर इंदिरा कांग्रेस ही  बना ली, आज वही कांग्रेस मूल कांग्रेस मानी जाती है | कांग्रेस में वह काल-खण्ड  भी आया जब किसी भी नेता को शीर्ष नेतृत्व के समक्ष बोलने की हिम्मत नहीं होती थी | इंदिरा जी के बेटे संजय गाँधी के सामने स्यात् ही कोई कांग्रेसी नेता खुलकर अपनी बात कह पता हो ! राजीव जी अवश्य सौम्य और सज्जन माने जाते रहे | उनके बाद जब तक परिवार नेतृत्व के लिए तैयार हुआ उस काल में कुछ अगाँधी अध्यक्ष बन गए |  किन्तु अंतिम अगाँधी अध्यक्ष सीताराम केसरी को सर्वाधिक अपमानजनक रूप से पद त्यागना पड़ा | श्रीमती सोनिया जी के विरुद्ध चुनाव लड़ने वाले जितेन्द्र प्रसाद के बेटे को अभी भी उनके पिता के कार्य के लिए उलाहने दिए जाते हैं | अब उसी अध्यक्ष पद को लेकर पार्टी के भीतर से वरिष्ठ नेताओं का एक समूह गाँधी परिवार से प्रार्थना कर रहा है कि उसे एक स्थाई अध्यक्ष दे दिया जाए | चूँकि इस माँग में किसी योग्य अगाँधी को पार्टी अध्यक्ष बनाए जाने का आग्रह भी छिपा है इसीलिये इसे परिवार और पार्टी के प्रति विश्वासघात के रूप में देखा जा रहा है | अब इन नेताओं का भी पार्टी के भीतर-बाहर  असहयोग एवं विरोध  किया जा रहा है  |

कार्यकारी अध्यक्ष श्रीमती सोनियाँ गाँधी को चिठ्ठी लिखने वाले 23 नेताओं के पर  कतरने का अभियान जोर पकड़ने लगा है | यद्यपि सोनिया जी ने व्यक्तिगत रूप से इन नेताओं को फ़ोन करने अपने मन में कोई वैर-भाव न होने का सन्देश दिया है | किन्तु उनके सुपुत्र राहुल गाँधी ने जिस आक्रामकता के साथ उनपर भजपा से मिले होने का आरोप लगाया और बाद में उसका कोई खंडन भी नहीं किया इससे कांग्रेस के भीतर अब इन्हें गाँधी परिवार का विरोधी घोषित करने की प्रतियोगिता चल पड़ी है | इन नेताओं के लिए भी ‘इनको और न उनको ठौर’ वाली स्थिति निर्मित हो गई है | ग़ुलाम नबी आज़ाद  को अल्पसंख्यक होने के कारण राज्य सभा में पद से वंचित नहीं किया जाएगा किन्तु कपिल सिब्बल,मनीष तिवारी और शशि थरूर को पार्टी ने लोकसभा एवं राज्यसभा में नव-गठित कमेटियों में कोई स्थान नहीं दिया | पार्टी के भीतर अब तक ये लोग गाँधी परिवार के  प्रति निष्ठावान होने के कारण महत्वपूर्ण माने जाते थे किन्तु अब इन पर निष्ठा परिवर्तन का आरोप लगने  के कारण इन्हें धीरे-धीरे किनारे लगा दिया जाएगा | चिठ्ठी पर हस्ताक्षर करने वाले युवा नेता जतिन प्रसाद के विरुद्ध यूपी के लखीमपुर खीरी में विरोध प्रदर्शन और नारेबाजी हुई, उन्हें पार्टी से निष्कासित किये जाने की माँग भी की जारही है | शशि थरूर तो राहुल गाँधी को अनावश्यक विरोध से बचने का सुझाव देने के कारण  पहले से ही विरोध का सामना कर रहे हैं | यद्यपि कपिल सिब्बल ने इस लड़ाई के लम्बे खिंचने के संकेत दिए हैं किन्तु अब अधिकांश के स्वर बदलते हुए दीख रहे हैं | ग़ुलाम नबी आज़ाद  और शशि थरूर निरंतर स्वयं को गाँधी परिवार का अनन्य सेवक बता रहे हैं, तो जतिन प्रसाद भी बार-बार अपनी आस्थाओं का प्रकटीकरण कर रहे हैं | विरोधी नेता जानते हैं कि यदि किसी भी अगाँधी को अध्यक्ष पद पर पदाभिषिक्त कर भी दिया जाए तो वह गाँधी परिवार के सहयोग के बिना टिक नहीं पाएगा | कांग्रेस के इस संकट का हल राहुल गाँधी के पास ही है | वे या तो अध्यक्ष न बनने की अपनी प्रतिज्ञा वापस लें और स्वयं अध्यक्ष पद स्वीकार करें या अपनी बहिन प्रियंका गाँधी को आगे लायें | इसके अतिरिक्त केवल एक मार्ग और है वह यह कि परिवार के तीनों सदस्य एक साथ मिल-बैठ कर परिवार के किसी निष्ठावान सेवक को अध्यक्ष पद पर बिठाकर राहुल जी को संरक्षक घोषित कर बची-खुची कांग्रेस को पुनः खड़ा करना आरंभ करें  | अनिर्णय की स्थिति से कांग्रेस पार्टी का रहा-बचा जनाधार भी लुप्त हो जाएगा और जो दो-चार प्रभाव शाली युवा नेता बचे हैं वे भी इधर-उधर चले जाएँगे |

डॉ.रामकिशोर उपाध्याय

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