बुंदेली विरासत से रूबरू होना चाहते हैं तो कालिंजर मेले में आइए

-अनिल अनूप

 ऐतिहासिक कालिंजर में ऐतिहासिक महोत्सव का आयोजन

बांदा के ऐतिहासिक कालिंजर दुर्ग का नज़ारा देखने के लिए यूं तो हर रोज हज़ारों लोग आते हैं, लेकिन कालिंजर महोत्सव ने इस नज़ारे को इतना खूबसूरत बना दिया है कि यहां जन सैलाब उमड़ पड़ा है। कालिंजर दुर्ग और उसके आस पास भव्य मेला लगा हुआ है ।

सैकड़ों की संख्या में पंडाल सजे हैं और उन पंडालों को दुर्लभ वस्तुओं को सजाया गया है जिसे देखने के लिए लोग बेताब नज़र आ रहे हैं। जिसकी वजह से ये कालिंजर महोत्सव और भी ऐतिहासिक बन गया है ।

बांदा मंडल मुख्यालय से 60 किलोमीटर के फासले पर स्थित ऐतिहासिक कालिंजर दुर्ग में जिलाधिकारी हीरालाल के निदेशन में 5 दिवसीय कालिंजर महोत्सव का आयोजन किया गया है।

इस महोत्सव का उद्घाटन ब्रहस्पतिवार की शाम नरैनी विधायक राजकरन कबीर ने किया। चारो तरफ पहाड़ियों से घिरे मैदान में सैकड़ों की संख्या में पंडाल सजाए गए हैं। सरकरीं विभागों ने अपने पंडाल अपने विभाग में चल रही जन कल्याणकारी योजनाओं की जानकारी दे रहे हैं।

वहीं कई पंडालों में दुर्लभ तस्वीरें मूर्तियां, सिक्के, शैल चित्र आदि सजाए गए हैं बहुत से पंडाल घरेलू उपयोग के सामानों से सजे हैं स्वास्थ्य विभाग ने स्वास्थ्य गैलरी बनाई है जिसमे हर पैथी के डाक्टर व दवाइयां उपलब्ध हैं ।

मनोरंजन के लिए तरह तरह के झूले लगाए गए हैं लोगों में सबसे ज्यादा आकर्षण का केंद्र एयर बैलून बना हुआ है जो लोगों को आसमान की सैर करा रहा है।

मुख्य पंडाल में सजे मंच पर तरह तरह के कलाकार अपनी कला का प्रदर्शन कर रहे हैं ।

मेले में आस पास के गाँव के अलावा पूरे प्रदेश और मध्य प्रदेश से लोग इस उत्सव को देखने आ रहे हैं ।

कालिंजर दुर्ग जिस पर्वत पर निर्मित है वह दक्षिण पूर्वी विन्ध्याचल पर्वत श्रेणी का भाग है। यह समुद्र तल से १२०३ फी॰(३६७ मी॰) की ऊंचाई पर कुल २१,३३६ वर्ग मी॰ के क्षेत्रफल में बना है। पर्वत का यह भाग १,१५० मी॰ चौड़ा है तथा ६-८ कि॰मी॰ में फैला हुआ है। इसके पूर्वी ओर कालिंजरी पहाड़ी है जो आकार में छोटी किंतु ऊंचाई में इसके बराबर है।

कालिंजर दुर्ग की भूमितल से ऊंचाई लगभग ६० मी॰ है। यह विंध्याचल पर्वतमाला के अन्य पर्वत जैसे मईफ़ा पर्वत, फ़तेहगंज पर्वत, पाथर कछार पर्वत, रसिन पर्वत, बृहस्पति कुण्ड पर्वत, आदि के बीच बना हुआ है। ये पर्वत बड़ी चट्टानों से युक्त हैं।

यहाँ ग्रीष्म काल में भयंकर गर्मी पड़ती है और लू चलती है। शीतकाल में सुबह सूर्योदय के २-३ घंटे एवं सांय सूर्यास्त के बाद से अधिक सर्दी होती है। दिसंबर और जनवरी के महीने में यहाँ सर्वाधिक ठंड रहती है। अगस्त और सितंबर का महीना वर्षा ऋतु का होता है। यहाँ मानसून से अच्छी वर्षा होती है।

यहाँ की मुख्य नदी बागै है, जो वर्षाकाल में उफनती हुई बहती है। यह पर्वत से लगभग १ मील की दूरी पर स्थित है। यह पन्ना जिले में कौहारी के निकट बृहस्पति कुण्ड से निकलती है और दक्षिण-पश्चिम दिशा से उत्तर-पूर्व की ओर बहते हुए कमासिन में यमुना नदी में मिल जाती है। इसमें मिलने वाली एक अन्य छोटी नदी बाणगंगा है।

कालिंजर अर्थात जिसने समय पर भी विजय पा ली हो – काल: अर्थात समय, एवं जय : अर्थात विजय। हिन्दू मान्यताओं के अनुसार सागर मन्थन उपरान्त भगवान शिव ने सागर से उत्पन्न हलाहल विष का पान कर लिया था एवं अपने कण्ठ में ही रोक लिया था, जिससे उनका कण्ठ नीला हो गया था, अतः वे नीलकण्ठ कहलाये। तब वे कालिंजर आये व यहाँ काल पर विजय प्राप्त की। इसी कारण से कालिंजर स्थित शिव मन्दिर को नीलकण्ठ भी कहते हैं। तभी से ही इस पहाड़ी को पवित्र तीर्थ माना जाता है। पद्म पुराण में इस क्षेत्र को “नवऊखल” बताया गया है।इसे विश्व का सबसे प्राचीन स्थल बताया गया है।

इस पर्वत पर अनेक प्रकार की वनस्पति एवं औषधियां मिलती हैं। यहाँ उगने वाले सीताफल की पत्तियां व बीज भी औषधि के काम आते हैं। यहाँ के गुमाय के बीज एवं हरड़ का उपयोग ज्वर नियंत्रण के लिए किया जाता है। मदनमस्त एवं कंधी की पत्तियां भी उबाल कर पी जाती है। गोरख इमली का प्रयोग राजयक्ष्मा के लिए तथा मारोफली का प्रयोग उदर रोग के लिए किया जाता है। कुरियाबेल आंव रोग में तथा घुंचू की पत्तियां प्रदर रोग में लाभकारी होती हैं। इसके अलावा फल्दू, कूटा, सिंदूरी, नरगुंडी, रूसो, सहसमूसली, पथरचटा , गूमा, लटजीरा, दुधई व शिखा आदि औषधियां भी यहाँ उपलब्ध है।

इस कालिंजर महोत्सव का उल्लेख सर्वप्रथम परिमर्दिदेव के मंत्री एवं नाटककार वत्सराज रचित नाटक रूपक षटकम में मिलता है। उनके शासनकाल में हर वर्ष मंत्री वत्सराज के दो नाटकों का मंचन इसी महोत्सव के अवसर पर किया जाता था। कालांतर में मदनवर्मन के समय एक पद्मावती नामक नर्तकी के नृत्य कार्यक्रमों का उल्लेख भी कालिंजर के इतिहास में मिलता है। उसका नृत्य उस समय महोत्सव का मुख्य आकर्षण हुआ करता था। एक हजार साल की यह परंपरा कतकी मेले के रूप में चलती चली आ रही है। इसमें लोग यहाँ के विभिन्न सरोवरों में स्नान कर नीलकंठेश्वर महादेव के दर्शन करते हैं। अनेक तीर्थयात्री तीन दिन का कल्पवास भी करते हैं। यहाँ ऊपर पहाड़ के बीचों-बीच गुफानुमा तीन खंड का नलकुंठ है जो सरग्वाह के नाम से प्रसिद्ध है।वहां भी श्रद्धालुओं की भीड़ जुटती है।!

भगवान शिव की तपोस्थली रही बुंदेलखंड के कालिंजर किले में गुरुवार से 5 दिन का मेला शुरू हो रहा है। पाषाणकालीन भित्ति चित्रों और गुप्तकालीन शिल्प के लिए मशहूर, चंदेल-बुंदेला राजाओं का मान रहे इस विश्वप्रसिद्ध दुर्ग में हो रहा मेला लोगों को बुंदेलखंड की विरासत के साथ ही बुंदेली खान-पान और संस्कृति के अनूठे रंगों से रूबरू कराएगा। देश-विदेश से यहां पहुंच रहे टूरिस्ट इस महोत्सव में पहली बार हॉट एयर बैलून के जरिए आस-पास के दुर्लभ और दुर्गम नजारों का लुत्फ भी उठा सकेंगे।

मुगलों के समय भी लगभग अजेय रहे कालिंजर किले में महोत्सव को भव्य बनाने और इसे वर्ल्ड टूरिज्म में शुमार कराने के लिए यूपी का बांदा जिला प्रशासन जी-जान से जुटा है। कालिंजर फोर्ट विकास समिति के अध्यक्ष और जिले के डीएम हीरा लाल कहते हैं कि इस मेले में 100 से ज्यादा दुकानें और गैलरियां आध्यात्मिक, (ललित कलाओं से जुड़ी) सांस्कृतिक, सेहत, शिक्षा, खेल-कूद और ग्रामीण विकास जैसी विभिन्न थीम पर आधारित होंगी। हर गैलरी में लोगों को कुछ न कुछ नया सीखने को मिले, यही मकसद है। आम लोगों के लिए चल रही सरकारी योजनाओं की जानकारी यहां मिलेगी ही, सेहत की मुफ्त जांच भी होगी।

महोत्सव की संयोजक सचिव और नरैनी की एसडीएम वंदिता श्रीवास्तव ने बताया कि बुंदेली गीत-संगीत के कार्यक्रमों के साथ ही अवधी-भोजपुरी समेत देश के कोने-कोने से आ रहे कलाकारों के कार्यक्रम भी होंगे। चारकूला नृत्य, ब्रज की होली के रंग देखने को मिलेंगे। बुंदेली खान-पान जैसे माहेरी, लाटा के साथ अन्य सभी स्वादिष्ट व्यंजनों के स्टॉल भी होंगे। मेले को इको-फ्रेंडली यानी प्लास्टिक फ्री रखने के लिए खान-पान में पत्तों से बने दोने-पत्तल इस्तेमाल होंगे।

नीलकंठ मंदिर के नीचे उकेरी गई काल भैरव की विशाल प्रतिमा 

20 से 24 फरवरी के बीच कालिंजर महोत्सव

1200 फीट की ऊंचाई पर विंध्य पर्वतमाला पर बना है किला, 90 डिग्री पर पहाड़ पर सीधी खड़ी दीवारें लोगों को अचंभे में डालती हैं, रॉक क्लाइंबिंग के लिए उपयुक्त है। पश्चिमी हिस्से पर नीलकंठ मंदिर, पहाड़ काटकर मंदिर के ऊपर बने दो जलकुंड, नीचे उकेरी गई कालभैरव की विशाल प्रतिमा ध्यान खींचती हैं। राजा-रानी महल, चर्म रोगों को ठीक करने के लिए मशहूर बुड्ढ़ा-बढ़िया तालाब, पातालगंगा, पांडवकुंड, कल्पवृक्ष अन्य दर्शनीय स्थल हैं। मान्यता है, समुद्रमंथन से निकले विष का पान कर जब शिव का कंठ नीला पड़ा, तो कालिंजर में विश्राम कर उन्होंने यहां मौजूद औषधियों से काल पर विजय प्राप्त की थी, इसलिए जगह का नाम कालिंजर पड़ा।

कैसे पहुंचें

कालिंजर किले तक पहुंचना बेहद आसान यहां। अगर आप हवाई मार्ग से आना चाहते हैं, तो आपको सबसे नजदीकी एयरपोर्ट खजुराहो और कानपुर उतरना पड़ेगा। जहां से आप रेल मार्ग अथवा सड़क मार्ग से आप कालिंजर तक पहुंच सकते हैं। रेल मार्ग से कालिंजर आने के लिए आपको बांदा रेलवे स्टेशन (58 किमी) या सतना रेलवे स्टेशन (85 किमी) उतरना होगा। दोनों ही स्टेशनों से बस और टैक्सी की विशेष सुविधा मौजूद है।

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