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    Homeसाहित्‍यकवितामैं पागल हूं, रहने दो।।

    मैं पागल हूं, रहने दो।।

    कुछ कहता हूँ कहने दो , मैं पागल हूं, रहने दो
    आँसू देख तेरे आंखों में मेरे अश्क भी बहने दो
    वो कहती है मैं पागल , मैं पागल हूँ रहने दो।

    उसकी कद्र मैं करता हूं, पीर मैं उसके समझता हूँ
    उसको अपना मानता हूँ, मन की बातें जानता हूँ
    राज खुले तो मैं पागल, मैं पागल हूँ रहने दो।

    उसका सब मुझ पर अर्पित है, मेरे लिए समर्पित है
    उसका समर्पण देखकर सुनकर हृदय ये गर्वित है
    और फिर कहती है मैं पागल, मैं पागल हूं रहने दो।

    मै सोता हूं वो जागती है दुआ मेरे लिए वो मांगती है
    पता नहीं क्या सोचती है, और आसमान में ताकती है
    फिर कहती है मैं पागल, मैं पागल हूँ रहने दो।

    मुसीबतों में वो है साहस, आंसू निकले तो कहती बस
    विचलित जब भी वो होती है,मैं हूं कहकर देता साहस
    खुद विचलित और मैं पागल, मैं पागल हूं रहने दो।

    नादान भी देखो कितनी है, फूलों के बचपन जितनी है
    छोटी सी बात पे रो देती, भावुकता उसमे इतनी है
    और कहती है मुझको पागल, मैं पागल हूँ रहने दो।

    वो मुझको पागल कहती ,मैं उसको कहता हूँ पगली
    गम हम दोनो ही छिपाते हैं मुस्कान भी देते है नकली
    कुछ पूछूं तो मैं पागल , मैं पागल हूँ रहने दो।

    जब भी मुझको होता बुखार, तो उसका ताप भी बढ़ जाये
    दर्द में मैं जब भी होता तो उसके आँसू बह जाये
    और कहती है कि मैं पागल , मैं पागल हूं रहने दो।

    सब कुछ न दे सकता उसको क्यो कि गरीब हूँ
    दूर दूर रहता हूं उससे, फिर भी करीब हूं
    तुमने अपना सुना दिया अब मुझको भी कुछ कहने दो
    वो कहती है कि मैं पागल, मैं पागल हूं रहने दो।

    जुड़े रहेंगे इक दूजे से,जब तक तन में श्वास,
    जिस्म जुदा पर रूह एक है हमको है ‘एहसास’
    खुद ही सारे गम ना लो, कुछ दर्द हमे भी सहने दो,
    हाँ मैं पागल हूं, मुझको पागल रहने दो।।

    • अजय एहसास

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