महाराष्ट्र में सरकार में देरी के निहितार्थ

सुरेश हिन्दुस्थानी
महाराष्ट्र का राजनीतिक परिदृश्य बारिश के बादलों की तर्ज पर परिवर्तित होता जा रहा है। चुनाव परिणाम के बाद जैसे-जैसे दिन व्यतीत हो रहे हैं, ठीक वैसे ही सरकार बनाने की प्रक्रिया उलझती जा रही है। राजनीतिक नफा नुकसान की बेहतर समझ रखने वाले राकांपा के शरद पवार शतरंज के माहिर खिलाड़ी की भांति ही अपनी राजनीति करते दिखाई दे रहे हैं। कोई माने या माने लेकिन यह महाराष्ट्र की राजनीति में सर्वथा स्वीकार करने वाली बात है कि पूरे प्रदेश में शरद पवार की हैसियत वाला दूसरा राजनेता वर्तमान में नहीं है। इसलिए स्वाभाविक रुप से यही कहा जाएगा कि शरद पवार पूरी तरह से ठोक बजाकर ही शिवसेना को समर्थन देंगे। हालांकि कुछ समय पूर्व इस प्रकार का दृश्य दिखाई दे रहा था कि शिवसेना अपना मुख्यमंत्री पूरे पांच साल के लिए बना लेगी, लेकिन अब ऐसा होना असंभव ही दिखाई दे रहा है। शिवसेना के पाले से मुख्यमंत्री की कुर्सी लगातार खिसकती ही जा रही है, जिससे उसका जल्दी मुख्यमंत्री बनाने का सपना भी धूमिल होता दिखाई देने लगा है। ऐसे में यह भी लग रहा है कि शिवसेना ने सरकार बनाने की जल्दी में अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मारने का काम ही किया है। जो देर सवेर उसकी समझ में आएगा ही।
शिवसेना इस बात को लेकर पूरी तरह से आश्वस्त थी कि 17 नवम्बर तक कांग्रेस और राकांपा अपनी ओर से शिवसेना के पक्ष में समर्थन पत्र सौंप देंगे। इसके लिए शिवसेना की ओर से खुले रुप में अपील भी की गई थी, लेकिन यहां शिवसेना की महत्वाकांक्षा उस समय काफूर हो गई, जब इन दोनों की ओर से किसी भी प्रकार की कोई प्रतिक्रिया नहीं आई। समझा जा रहा है कि इस बेमेल गठबंधन में अगर कोई बात आड़े आ रही है, तो वह वैचारिक असमानता ही है। जाहिर है कि शिवसेना बाला साहेब ठाकरे के समय से ही हिन्दुत्व को केन्द्र मानकर अपनी राजनीति करती आई है। अब ऐसा लग रहा है कि शिवसेना की यही छवि उसकी सरकार बनाने की राह का रोड़ा बन रही है। ऐसे में शिवसेना अगर अपने सिद्धांतों का त्याग करती है तो स्वाभाविक रुप से यही कहा जाएगा कि शिवसेना को सत्ता मोह हो गया है। उल्लेखनीय है कि मोह कोई भी हो, वह खतरनाक ही होता है। इस मोह के चलते शिवसेना के सामने महाराष्ट्र की राजनीति में लगातार भ्रम की स्थिति निर्मित होती जा रही है।
कांग्रेस और राकांपा तेल देखो और तेल की धार देखो, वाली उक्ति को ही चरितार्थ कर रहे हैं। यह दोनों दल यह समझ चुके हैं कि शिवसेना येनकेन प्रकारेण अपना मुख्यमंत्री बनाने की ही राजनीति करने पर उतारु हो गई है। ऐसे में यह भी कहा जा रहा है कि राकांपा और कांग्रेस की ओर से एक बड़ी राजनीतिक चाल भी चली गई है, वह यही कि राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन को कमजोर किया जाए। जिसके लिए उन्होंने शिवसेना को राजग से दूर होने की भी राजनीति की है। हालांकि केन्द्र की मोदी सरकार में शिवसेना के एक मात्र मंत्री के रुप शामिल रहे अरविन्द सावंत से यह कहकर त्याग पत्र दिलवा दिया कि शिवसेना अब राजग का हिस्सा नहीं है, लेकिन राकांपा की ओर से कहा जा रहा है कि शिवसेना की ओर से इसकी अधिकारिक घोषणा नहीं की गई है। ऐसा सवाल इसलिए भी उठ रहा है, क्योंकि अभी हाल ही में शिवसेना की ओर से ही ऐसा सवाल उठाया गया है कि शिवसेना को राजग से निकालने वाली भाजपा कौन होती है। इसका आशय यही निकाला जा रहा है कि शिवसेना खुद अभी अपने आपको राजग का हिस्सा ही मान रही है।
वर्तमान में महाराष्ट्र की राजनीति में जिस प्रकार की ऊहापोह की स्थिति बनी है, उसको देखकर यही लग रहा है कि कांग्रेस और राकांपा दोनों ही दल शिवसेना के विचार से भिन्न विचार रखते हैं, इसलिए शिवसेना पर एकाएक विश्वास करना टेड़ी खीर ही साबित हो रहा है। वहीं दूसरी तरफ यह भी दिखाई दे रहा है कि शिवसेना के विधायक भी इन दोनों दलों पर पूरा भरोसा करने की स्थिति में नहीं दिख रहे हैं। भाजपा से अलग होकर शिवसेना को जो सावधानी बरतनी चाहिए थी, वह उसकी तरफ से नहीं बरती जा रही है। कमोवेश ऐसा ही लग रहा है कि शिवसेना के सभी विधायक अपने नेतृत्व के निर्णय के साथ नहीं हैं। शिवसेना के कई विधायक अपनी हिन्दुत्व की छवि को अलग करना नहीं चाहते। इसलिए अब शिवसेना के समक्ष लगभग ऐसी स्थिति निर्मित होती जा रही है जिसमें एक तरफ कुआ तो दूसरी तरफ खाई है।
राकांपा और कांग्रेस की तरफ से समर्थन की स्थिति साफ नहीं होने के बाद अब तो यह भी कहा जाने लगा है कि हो सकता है महाराष्ट्र में फिर से पांच साल पहले की स्थिति ही निर्मित हो जाए। ऐसा इसलिए भी कहा जाने लगा है कि शिवसेना के अधिकांश विधायक भाजपा के साथ ही सरकार बनाने की मानसिकता रखते हैं। राजनीतिक दृष्टिकोण से शिवसेना के लिए यही ठीक माना जा रहा है। वहीं राजग के एक घटक दल के नेता रामदास आठवले ने यह कहकर इस बात को हवा दी है कि भाजपा तीन वर्ष और शिवसेना दो वर्ष अपना मुख्यमंत्री बनाए, लेकिन इस प्रस्ताव पर भाजपा और शिवसेना दोनों दल किस प्रकार तैयार होते हैं, यह पता नहीं है। लेकिन यह संभव लग रहा है।
महाराष्ट्र में सबसे बड़ा पेच राकांपा के शरद पवार के बयानों के कारण भी निर्मित हुआ है। उन्होंने अभी हाल ही में कहा है कि न्यूनतम साझा कार्यक्रम नहीं बन पाने की स्थिति में ही देर हो रही है। दूसरी तरफ शिवसेना संबंधी सवाल पर वे यह भी कह रहे हैं कि शिवसेना के बारे में उन्हें कुछ नहीं मालूम। इसलिए यही कहा जा रहा है कि अभी मामला पूरी तरह से खटाई में ही है। अभी सरकार बनने की किसी भी प्रकार की कोई स्थिति दिखाई नहीं दे रही है। यह सवाल इसलिए भी खड़ा हो रहा है कि शिवसेना की ओर से स्पष्ट रुप से कहा जा रहा है कि दिसम्बर तक सरकार बन जाएगी। इसका मतलब यही है कि तीनों दलों में बहुत बड़ा राजनीतिक पेच फंसा हुआ है। इसका हल कैसे निकलता है, अब यही देखना बाकी है।

Leave a Reply

%d bloggers like this: