स्वीकार्यता का महत्व

    हमारे जीवन की बहुत सी बाधाओं और समस्याओं का कारण स्वीकार्यता का अभाव है । स्वीकार ना कर पाने के कारण हम जीवन में ठहराव, गतिहीनता, अनावश्यक घर्षण को आमंत्रण देते हैं । हम प्रत्येक वस्तु, ब्यक्ति, विचार अथवा परिस्थिति को बिना आवश्यक सोच विचार के अस्वीकार कर देते हैं । विचार आया नहीं की ‘नकार’ की ध्वनि आनी शुरू हो जाती है, कमियां दिखाई देने लगती है । हम न तो अपनी अच्छाइयों को सहर्ष स्वीकार कर पाते हैं और न ही त्रुटियों को । दोनों ही मामलों में हमारा ब्यवहार अतिशयोक्तिपूर्ण होता है । अस्वीकार्यता का यह गुण मौलिकता, सर्जनात्मकता तथा विकास विरोधी होता है ।

   हम अपनी कमियां स्वीकार करने के स्थान पर उसे ढंककर या फिर बदरंग करके उसके सुधार का मार्ग बन्द कर देते हैं । एक अकर्मन्य ब्यक्ति ब्यापार में असफल होने पर अपने भाग्य को, परिवारजनों को, कर्मचारियों को अथवा अपने प्रतिद्वन्दी को दोष देता है जबकि मूलभूत कारण उसकी स्वयं की अकर्मन्यता होती है, पर वह इसे स्वीकार नहीं कर पाता है । इसी प्रकार एक विद्यार्थी परीक्षा में असफल होने के पश्चात परीक्षक, परीक्षा-प्रणाली, अध्यापक, विद्यालय, शिक्षा-ब्यवस्था, खराब स्वास्थ्य अथवा संसाधनों को दोष देकर अपनी जिम्मेदारी और मानसिक तनाव से बचने का रास्ता ढूंढता है । पारिवारिक सम्बन्धों में जहाँ स्वीकार्यता का भाव नहीं होता, लोग एक दूसरे पर दोषारोपण करके उन्हें परिवर्तित करने के उपाय ढूंढते रहते हैं, नित नवीन कमियाँ निकालते रहते हैं जिनका न तो आदि होता है और न ही अन्त । सास-बहू, पिता-पुत्र, कर्मचारी-नियोक्ता, पुरानी पीढी-नई पीढी, समुदाय, जाति, धर्म आदि के संघर्षो का मूल कारण स्वीकार्यता का अभाव है ।

      जीवन में नकारात्मक परिस्थियों से सामना होने पर हमारी प्रथम प्रतिक्रिया उसे अस्वीकार करने की ही होती है । शुतुमुर्गी रवैया अपनाते हुए वास्तविक स्थिति को स्वीकार करने और सामना करने के स्थान पर हम समस्या से छुपने, बचने, दूर भागने या फिर अन्य कम महत्व के कारकों को दोषारोपित करने में अपनी उर्जा नष्ट करते रहते है । परिणामस्वरूप तात्कालिक रूप से हमें समस्या का आभास नहीं होता और हमें समस्या के तात्कालिक प्रभाव से मुक्ति मिल जाती है । किन्तु धीरे धीरे वह समस्या गंभीर रूप धारण कर लेती है और असमाधेय बन जाती है ।

      कुछ लोगों के लिए विगत जीवन के कटु अनुभव, अथवा दुखदायी क्षण जैसे प्रियजनों का विछोह, पद-प्रतिष्ठा अथवा सम्पत्ति का क्षय, आत्मीय जनों से धोखा मिलना आदि इतने प्रबल होते हैं कि उनके जाल से निकलने में तथा वर्तमान को स्वीकार करने में ब्यक्ति स्वयं को असमर्थ पाता है । यह असमर्थता जीवन को निराशा तथा अवसाद के गर्त में ले जाती है । ऐसे लोगों के जीवन का केन्द्र भूतकाल के वही नकारात्मक क्षण होते हैं जो जीवन पर्यन्त इनके ब्यवहार को निर्देशित करते रहते हैं । ऐसे लोग भूतकाल के कैदी के रूप में जीवन यापन करते रहते हैं ।

       परन्तु स्थितियों को स्वीकार करना इतना कठिन क्यों है ? वस्तुत हम अपने ब्यक्तित्व, जीवन, पारिवारिक-सामाजिक सम्बन्धों, धारणाओं और भविष्य की घटनाओं के विषय में एक मानसिक प्रतिमा बना लेते हैं । मानसिक प्रतिमा के निर्धारण की यह प्रक्रिया चेतन तथा अचेतन दोनो ही स्तरों पर चलती है । हमारे दिन प्रतिदिन के अनुभवों का भी इसमें योगदान होता है । उम्र के साथ ही यह मानसिक प्रतिमा दृढ होती जाती हैं और हम अपने ही विचारों और धारणाओं के प्रति इतने आसक्त हो जाते हैं कि असंगत विचार तथा घटनाओं को स्वीकार ही नही कर पाते अथवा अनावश्यक समय लगा देते हैं । फिर, स्वीकार करने का गुण जिम्मेदारी के भाव से भी जुडा़ होता है । अक्सर हम अपनी जिम्मेदारियों और जवाबदेहियों से बचने के लिए वस्तुस्थिति को स्वीकार करने से बचते हैं ।

      चीजों को उनके वास्तविक रूप में स्वीकार करना एक सदगुण है, जीवन की एक कला है । यह समस्याओं का सामना करने और बहुत सारे प्रत्यक्ष, अप्रत्यक्ष, तथा अनावश्यक संघर्षो से बचने में मदत करता है । स्वीकार्यता का अर्थ संतुष्ट होना, सहमत होना, नतमस्तक होना अथवा समस्या से भागना कदापि नहीं है । बस जो जैसा है उसे उसी रूप में बिना किसी प्रतिरोध के स्वीकार करना है । जीवन के अवश्यमभावी प्राकृतिक क्षरण, परिवर्तन, विकास, विनाश को स्वीकार कर उसे जीवन में स्थान देना है । यहाँ तक कि अगर हम अपनी कमियों, नकारात्मक सम्बन्धों, अथवा आदतों में परिवर्तन अथवा परिमार्जन करना चाहते हैं तब भी पहले हमें उसे स्वीकार करना होता है । अगर हम अस्वस्थ हैं तो हमें इसे स्वीकार करना होता है तभी हम उपचार हेतु शारीरिक और मानसिक रूप से तैयार हो पाते हैं अन्यथा उपचार भी निष्प्रभावी हो जाता है।

      विगत की कड़वी, दुखदायी यादों से बाहर आने और जीवन में गतिशीलता बनाए रखने में भी स्वीकार्यता का महत्वपूर्ण स्थान है । अच्छाई-बुराई, लाभ-हानि, यश-अपयश, जन्म-मृत्यु आदि द्वन्द्वों से प्रभावित होना स्वाभाविक है, किन्तु किन्हीं एक के साथ जीवन ठहरता नहीं है । निरन्तर गतिशील होना ही जीवन का धर्म है और इसे स्वीकार करना ही मानव का सामंजस्य ।

डा. प्रदीप श्याम रंजन

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