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    Homeसाहित्‍यलेखघरेलू कामगारों की अहमियत कब समझेंगे हम?

    घरेलू कामगारों की अहमियत कब समझेंगे हम?

    प्रियंका सौरभ 

    घरेलू कामगारों की बात करते ही मन विचलित हो उठता है और सीने में दर्द भर जाता है कि वो बेचारे कैसे और तरह-तरह के के निम्न स्तर के काम पेट की आग बुझाने के लिए करते है। हर समय गाली-गलौज सहकर भी कम पैसों में ज्यादा कार्य करते रहते है। हमारे देश में घरेलू कामगारों की संख्या करोड़ों में है। एक सर्वे के अनुसार ‘भारत में 4.75 मिलियन घरेलू कामगार हैं, जिनमें से शहरी क्षेत्रों में तीन मिलियन महिलाएँ हैं। भारत में लगभग पाँच करोड़ से अधिक घरेलू कामगार हैं, जिनमें से अधिकांश महिलाएँ हैं। बड़े-बड़े और कस्बों में प्रायः हर पाँचवें घर में कामवाली ‘बाई’ बहुत ही सस्ते दरों में आपको काम करते हुए दिख जाएँगी।

    हमारे रोज़मर्रे के जीवन में आस-पास एक ऐसी महिला ज़रूर होती है जो अदृश्य होती है जो हमारे घरों में सुबह-सुबह अचानक से आती हैं, झांड़ू-पोछा करती हैं, कपड़े धोती हैं, खाना बनाती हैं और दिन भर बच्चे-बूढ़ों को भी देखती हैं। मगर वो इतना सब करने के बावजूद हमारे जीवन में रोजमर्रा के कार्यों में होते हुए भी इस तरह से गायब रहती है कि हम उनके बारे में कुछ जानते ही नहीं। या हम उसको कोई खास स्थान नहीं देते?  हम नहीं जानते कि वे शहरों में कहां से आई हैं, कहां रहती हैं, वे और कितने घरों में काम करती हैं, कितना कमाती हैं और कैसा जीवन जीती हैं?

    पिछले दशक में भारत में घरेलू कामगारों की संख्या में लगभग 120% की वृद्धि हुई, जिनमें से 26 लाख महिला घरेलू कामगार हैं। जिनके दम पर भारत के अधिकांश घरों में साफ़-सफाई होती है और खाना मिलता है, मगर आज महामारी के दौरान घरेलू कामगारों को चुनौती का सामना करना पड़ रहा है और भारत सरकार और राज्य सरकारें भी इनके लिए कुछ विशेष नहीं कर रही है?

    आज के दिन दिल्ली और मुंबई में लगभग 80% -90% घरेलू कामगार अपनी नौकरी खो चुके हैं। सरकारी कल्याणकारी योजनाओं की कमी और  सहायता ने उनके संकट को और बढ़ा कर दिया है। दिल्ली में घरेलू कामगारों के लिए सामाजिक सुरक्षा की कमी ने उन पर जोरदार प्रहार किया है। हालांकि महाराष्ट्र और तमिलनाडु जैसे राज्यों में घरेलू श्रमिकों के लिए कल्याण बोर्ड हैं और कई अन्य असंगठित श्रमिकों के कल्याण बोर्ड हैं जो इस समय आगे आये है मगर देश भर के बाकी कामगारों का क्या ?

    सबसे बड़ी बात ये कि  राष्ट्रीय राजधानी ने भी घरेलू श्रमिकों के लिए वो न्यूनतम मजदूरी भी तय नहीं की है, जैसा कि अन्य राज्यों जैसे केरल, कर्नाटक और तमिलनाडु द्वारा किया गया है। जो पूरे देश भर के कामगारों के लिए निराशा भरा है।  इसके पीछे कारण ये है कि  घरेलू कामगारों को आमतौर पर नौकरों और नौकरानियों के रूप में जाना जाता है। जिसके परिणामस्वरूप उनकी असुरक्षा और हीनता की भावनाएँ किसी के लिए मानवीय दृष्टिकोण वाली नहीं रही अन्यथा तो ये राजीनीति का विशेष मुद्दा होता। अगर घर में कुछ भी गायब है, तो उन्हें धमकियों, शारीरिक हिंसा, पुलिस पूछताछ, दोषसिद्धि और यहां तक काम से निकल दिया जाता है और कुछ नहीं कह पाते या कर पाते।

    घरेलू महिला कामगारों के शोषण की संभावना घर की दहलीज के अंदर और बाहर समान रूप से एक जैसी होती है। घर के मालिक द्वारा घरेलू कामगार महिलाओं के साथ तरह-तरह से क्रूरता, अत्याचार और शोषण किया जाता है। अधिकांश घरेलू कामगार कमजोर समुदायों – आदिवासी, दलित या भूमिहीन अन्य पिछड़ा वर्ग से हैं । इनमे से भी लगभग सभी प्रवासी श्रमिक हैं। और एक भारी संख्या में महिलाएं हैं। यही कारण है की इनका शोषण करना और जब चाहे बदलना बहुत ही आसान है।

    कानूनों में भी इनको कोई विशेष अधिकार नहीं दिए गए है, घरेलू काम पर न तो मातृत्व लाभ अधिनियम और न ही न्यूनतम मजदूरी अधिनियम या कोई अन्य श्रम कानून लागू होते हैं। घरेलू श्रमिकों को काम पर रखा जाता है और निकाल दिया जाता है। साप्ताहिक छुट्टियों, मातृत्व अवकाश और स्वास्थ्य लाभ के लिए कोई प्रावधान नहीं है।  ऐसे में उनके के पास कानूनी रूप से बाध्यकारीअधिकार नहीं हैं। घरेलू कामगार महिलाओं के साथ गाली-गलौज, मानसिक, शारीरिक एवं यौन शोषण, चोरी का आरोप, घर के अंदर शौचालय आदि का प्रयोग न करने, इनके साथ छुआछूत करना जैसे चाय के लिए अलग कप एक सामान्य सी बात है।

    भारत के घरेलू कामगारों से कदम-कदम पर दुर्व्यवहार किया जाता है। मगर इनके अत्याचार, मारपीट, यौन शोषण और उत्पीड़न मामले कभी न तो पुलिस स्टेशन पहुँचते है। और न ही अखबारों व् टीवी की सुर्खिया बन पाते हैं। इसके लिए मुख्य कारण ये है कि घरेलू कामगारों को संगठित करना एक बड़ी चुनौती रही है। क्योंकि उनके कार्य स्थल दुर्गम और बिखरे हुए हैं। तभी ये यूनियन बनकर आगे नहीं आ पाए और अपने अधिकारों से वंचित होते रहे है।

    घरेलू कामगार (डॉमेस्टिक वर्कर्स) आज देश भर में  न्यूनतम वेतन, काम करने की स्थितियों, सेवा शर्तों, सामाजिक सुरक्षा आदि से वंचित है। हाड़तोड़ मेहनत करने ये मज़दूर, आबादी, घोर ग़रीबी, ग़ुलामी, अपमान, असुरक्षा, उपेक्षा, उत्पीड़न और अनिश्चितता की जि़ंदगी बिताने के लिए मजबूर है। अब तक तमाम सुझावों और दबावों के बावजूद केंद्र सरकार ने केंद्रीय स्तर पर घरेलू मज़दूरों के लिए क़ानून बनाने की दिशा में अब तक कोई क़दम नहीं उठाया है।

    सरकार को अब कानून बनाकर उन्हें आर्थिक और सामाजिक सुरक्षा क़ानूनी तौर पर प्रदान करनी चाहिए और पूरे देश के राज्यों तथा केंद्र की सरकारों के सामने एक नज़ीर पेश करनी चाहिए। घरेलू श्रमिकों पर एक राष्ट्रीय नीति का मसौदा केंद्र सरकार जल्द से जल्द लागू करें जिसमें न्यूनतम मजदूरी, तयशुदा काम के घंटे, छुट्टी, सामाजिक सुरक्षा, मातृत्व अवकाश, पालनाघर, काम करने के माहौल, वेतन और बाकी सुविधाओं से जुड़े सभी  दिशा-निर्देश हो। घरों में काम करने वाली बाई जैसे घरेलू कामगारों के लिए को न्यूनतम मजदूरी समेत कई अन्य सुविधाएँ उपलब्ध कराने के लिए सरकार एक राष्ट्रीय नीति लेकर आये।  

    न्यूनतम मजदूरी के प्रावधान सबसे कमजोर और सबसे कम वेतन वाले श्रमिकों की रक्षा करने के लिए महत्वपूर्ण साधन हैं जिससे घरेलू कामगार को अनचाहे कम वेतन से छुटकारा मिल सके और वो स्वाभिमान से कार्य कर सके। शासनादेश द्वारा घरेलू कामगारों को आधिकारिक तौर पर असंगठित मज़दूर का दर्जा दिया जाए, ताकि असंगठित मज़दूरों के अन्य हिस्सों को जो भी सीमित क़ानूनी अधिकार प्राप्त हैं, घरेलू कामगार भी उन्हें पाने के हक़दार हो सकें।

    घरेलू मज़दूरों से संबंधित सभी क़ानूनों और शासनादेशों पर प्रभावी अमल सुनिश्चित करने के लिए सभी श्रम कार्यालयों में विशेष निरीक्षकों की नियुक्ति की जाए। साथ ही, ऐसी विशेष निगरानी समितियां बनाई जाएं जिनमें घरेलू मज़दूरों के प्रतिनिधि, मज़दूर संगठनों के प्रतिनिधि, स्त्री संगठनों के प्रतिनिधि, नागरिक अधिकार कर्मी और नियोक्ताओं के प्रतिनिधि शामिल हों। कार्यस्थल पर यौन-उत्पीड़न या किसी भी प्रकार के उत्पीड़न पर कठोर निगरानी और त्वरित कार्रवाई के लिए पुलिस थानों पर विशेष सेल स्थापित किए जाएं।

    इनको काम पर रखने वाले ये भी समझें कि औरों की तरह उनके भी अधिकार हैं जो उनको मिलना ही चाहिए, जो अब तक उनको मिले नहीं है।  साथ-साथ घरेलू कामगारों के अस्तित्व, अस्मिता एंव पहचान को जानने समझने की हम सबको भी ज़रूरत है। इसके लिए राष्ट्रीय वृद्धावस्था पेंशन योजना,राष्ट्रीय पारिवारिक लाभ योजना,जननी सुरक्षा योजना,आयुष्मान भारत प्रधानमंत्री जीवन ज्योति बीमा योजना, और प्रधानमंत्री सुरक्षा बीमा योजना  के साथ आम आदमी बीमा योजना में इन कामगारों को विशेष कवरेज प्रदान करने की योजना होनी चाहिए। 

    प्रियंका सौरभ
    प्रियंका सौरभ
    रिसर्च स्कॉलर इन पोलिटिकल साइंस, कवयित्री, स्वतंत्र पत्रकार एवं स्तंभकार

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